गुरुवार, 10 मार्च 2022

अध्याय -४

 

“श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये”

 

अध्याय ४


कुरवपुर में वासवाम्बिका के दर्शन

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के जन्म स्थान में होने वाली लीलाएँ


श्री पळनीस्वामी की आज्ञानुसार हमने ध्यान धारणा का संकल्प किया. श्री पळनीस्वामी बोले, “वत्स, माधव! वत्स शंकर! हम तीनों श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की आज्ञानुसार ध्यानमग्न हो जाएँ और तत्पश्चात अपने-अपने अनुभवों की चर्चा करें. इस अवस्था में हमें किसी उत्कृष्ट आध्यात्मिक परिणाम का अनुभव होगा. भविष्य में हूण शक (ईस्वी सन्) का प्रचलन होगा. हूण शकानुसार आज दिनांक २५-५-१३३६ है. शुक्रवार है. आज का दिन हमारे जीवन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण दिन है. मैं अपने स्थूल शरीर को यहीं छोड़ कर सूक्ष्म शरीर से कुरवपुर जाऊँगा. एक ही समय में चार-पाँच स्थानों पर सूक्ष्म शरीर से विहार करना मेरे लिए बाल्य-क्रीडा के सामान है. हम सभी जब श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के ध्यान में मग्न होंगे, तब उनकी आज्ञा होने पर मैं सूक्ष्म शरीर से कुरवपुर में उनके सान्निध्य में जाऊँगा.

 

स्वामी की कृपा प्राप्त करने का विधान (विधि)

श्री पळनीस्वामी का कथन सुनकर मुझे अचम्भा हुआ, अतः मैंने पूछा, “माधव ने श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दिव्य मंगल स्वरूप के दर्शन किये हैं. आप सदा श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के साथ सूक्ष्म रूप में विचरण करते हैं, मगर मुझे तो केवल उनका नाम मात्र ही ज्ञात है. तब मैं ध्यान मग्न किस प्रकार होऊँ?” इस पर श्री पळनीस्वामी मंद हास्य करते हुए बोले, “वत्स! श्रीपाद स्वामी की भक्ति यदि ह्रदय में हो तो सब कुछ सिद्ध होगा. श्रीपाद प्रभु सबसे पहले अपने भक्त का कछुए के पिल्ले के समान पालन करते हैं. कछुआ अपने पिल्ले से चाहे कितना ही दूर रहे फिर भी उसकी विचार तरंगों से ही पिल्लों की रक्षा होती है. थोड़ी उन्नति होने के पश्चात् वे बिल्ली के पिल्ले के समान अपने भक्त का पालन करते हैं. जिस प्रकार बिल्ली अपने पिल्लों को मुख में पकड़कर एक घर से दूसरे घर ले जाती है, जो स्थान नन्हें पिल्लों के लिए सुरक्षित प्रतीत हो, वही उन्हें रखती है. उसके पश्चात् बन्दर के पिल्लों के समान भक्तों का पालन होता है. इस प्रकार के पालन में पिल्ला अति प्रयत्न से अपनी माँ से चिपक कर बैठा रहता है. और अधिक उन्नति होने पर मछली के पिल्लों के समान पालन होता है, जहाँ माँ के साथ स्वेच्छा एवँ आनंद पूर्वक विहार करने वाले मछली के पिल्लों के समान ही भक्त गण भी श्री गुरू के साथ-साथ रहते हैं. जब तुम ध्यानावस्था में जाओगे, तब वे ही दर्शन देंगे. आज दिनांक २५-५-१३३६, शुक्रवार सभी शुभ योगों का संगम हो रहा है. आज का संपूर्ण दिन उत्तम दिन है.

श्रीपाद स्वामी ने अत्यंत महत्वपूर्ण भविष्य निर्णय करने का निश्चय करके मुझे कुरवपुर आने की आज्ञा दी है. ध्यानमग्न अवस्था में जैसे ही उनकी आज्ञा होगी, उसी क्षण मैं कुरवपुर चला जाऊँगा. वहाँ कोई महत्त्वपूर्ण घटना घटने वाली है. श्री दत्त प्रभु की कृपा से उसे अपने नेत्रों से देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त होने वाला है,” ऐसा कहते हुए श्री पळनीस्वामी ध्यानस्थ हो गए. मैं और माधव भी ध्यान मग्न हो गए.

इस प्रकार ध्यानावस्था में दस घंटे बीत गए. ध्यान के पश्चात् श्री पळनीस्वामी अत्यंत उल्हासित प्रतीत हो रहे थे. मैंने और माधव ने उनसे प्रार्थना की कि वे अपनी ध्यानानुभूति के बारे में बताएँ. इस पर स्वामी ने मुस्कुराते हुए कहना आरम्भ किया.               

          

शिव शर्मा की कथा – श्रीपाद श्रीवल्लभ के चिंतन का फल

 

उन्होंने कहा, “इस कलियुग के लोगों का कितना महत् भाग्य है! कुरवपुर गाँव बहुत छोटा था, फिर भी स्वामी की महिमा को जानकर वेद पंडित सद्ब्राह्मण शिवशर्मा अपनी भार्या अंबिका के साथ कुरवपुर में ही रहते थे. कुरवपुर में केवल यही एक ब्राह्मण कुटुंब था. वे प्रतिदिन द्वीप पार करके ब्राह्मणोचित कार्यों से धनार्जन करके कुरवपुर वापस लौटते. वे बड़े भारी विद्वान पंडित थे. वे अनुष्ठानी, काश्यप गोत्र में उत्पन्न यजुर्वेदीय ब्राह्मण थे. शिव शर्मा की सन्तान अल्पकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती थी. जैसे-तैसे एक बालक जीवित रहा, परन्तु दुर्भाग्य से वह मंदबुद्धि था. इस प्रकार की निष्प्रयोजक संतान प्राप्ति से शिव शर्मा दुखी रहते थे.

एक दिन श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के सामने वेदपठन करने के पश्चात् वे मौन खड़े रहे. श्री स्वामी ने उनका मनोगत पहचान कर मंद हास्य करते हुए कहा, “शिव शर्मा! अन्य सभी चिंताएँ छोड़कर निरंतर मेरा ही मनन. -चिंतन करने वालों का मैं दास हूँ . तुम्हारी इच्छा क्या है, कहो.”

इस पर शिव शर्मा बोले, “स्वामी, मेरा पुत्र मुझसे भी बड़ा पंडित वक्ता हो, ऐसी मेरी इच्छा थी. परन्तु वह पूरी तरह मिट्टी में मिल गई. मेरा पुत्र अत्यंत मतिमंद है. सभी चराचरों में, घर-घर में व्याप्त, अत्यंत सामर्थ्यवान आपके लिए उसे पंडित बनाना, निष्ठावान बनाना किंचित भी कठिन नहीं है. मुझ पर इतनी कृपा करें.”   

इस पर श्रीपाद श्रीवल्लभ बोले, “वत्स! कोई चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, पूर्वजन्म के कर्मफल को भोगना उसके लिए अनिवार्य है. समूची सृष्टि भी शासन का उल्लंघन न करते हुए चलती रहती है. स्त्रियों को पूजन के फलस्वरूप पति की प्राप्ति होती है. दान के फलस्वरूप संतान प्राप्ति होती है. दान सदा सत्पात्र को देना चाहिए. यदि दान ग्रहण करने वाला सत्पात्र न हो तो अनिष्ट की आशंका ही संभव है. सद्बुद्धियुक्त व्यक्ति को अन्नदान देने से उसके द्वारा किये गए पूण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले पुण्य का कुछ अंश अन्नदाता को मिलता है. दुर्बुद्ध व्यक्ति को अन्नदान देने से उसके द्वारा किये गए पाप कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त पापों का कुछ अंश अन्नदाता को प्राप्त होता है. दान देते समय अहंकार रहित होकर दान करें, तभी उसका उत्तम फल प्राप्त होगा. पूर्व जन्म के कर्मफलानुसार ही तुम्हें मंदबुद्धि पुत्र की प्राप्ति हुई. तुम दंपत्ति ने अल्पायुषी नहीं, अपितु पूर्णायुषी संतान ही दें, ऐसी विनती की थी. पूर्णायुषी पुत्र तुम्हें दिया गया. उसे पूर्वजन्म के पाप का निवारण करके योग्य पंडित बनाने के लिए, कर्मसूत्र का अनुसरण करते हुए, यदि तुम देह त्याग करने को तैयार हो, तो मैं उसे योग्य पंडित बनाऊँगा.” इस पर शिवशर्मा बोले, “स्वामी, वैसे भी मैं वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुका हूँ. मैं अपना जीवन त्यागने के लिए तैयार हूँ. मेरा बालक यदि बृहस्पति के समान पंडित, वक्ता हो जाए, तो मुझे और क्या चाहिए?” संपूर्ण चराचर में, घटघट में व्याप्त सामर्थ्यवान श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी बोले, “ठीक है, तुम शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होगे. मृत्योपरांत सूक्ष्म देह में धीशिला नगरी (वर्त्तमान शिरडी) में नीम के वृक्ष के नीचे स्थित भूगृह में कुछ काल तक तपश्चर्यारत रहोगे. तत्पश्चात पुण्य भूमि महाराष्ट्र देश में जन्म लोगे. इस विषय की अपनी पत्नी से ज़रा भी चर्चा न करना.”

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के भावी जन्म का निर्धारण

   शीघ्र ही शिव शर्मा की मृत्यु हो गई. अंबिका अपने पुत्र के साथ भिक्षाटन करके काल क्रमण कर रही थी. आसपास के लोग उन पर हँसते, उनका मज़ाक उड़ाते, इस सबका कोई अंत ही नहीं था. जब यह अपमान असह्य हो गया तो वह मतिमंद बालक आत्महत्या करने के लिए नदी की और भागा. उसकी माँ भी असहाय होकर आत्महत्या करने के लिए पुत्र के पीछे भागी. उसके पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से मार्ग में श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दर्शन हुए. उन्होंने इन दोनों को आत्महत्या के प्रयत्न से परावृत्त किया. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने अपने अपार करुणामय कटाक्ष से उस मूर्ख बालक को महापंडित बना दिया. अंबिका को आदेश दिया कि वह अपना शेष जीवन शिव पूजन में व्यतीत करे. शनिप्रदोष व्रत की महिमा बताकर, प्रदोष काल में किये गए शिवपूजन करने से किस प्रकार की फल प्राप्ति होती है, इसकी विस्तृत जानकारी उसे दी. अंबिका को आशीर्वाद दिया कि अगले जन्म में उसे “मेरे जैसा पुत्र प्राप्त होगा.” परन्तु उनके जैसा इन तीनों लोकों में कोई अन्य न होने के कारण श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने अगले जन्म में उसके पुत्र के रूप में जन्म लेने का निश्चय किया.

 

नृसिंह सरस्वति एवं स्वामी समर्थ के जन्म का संकल्प

समस्त कल्याणकारी गुणों से युक्त वासवाम्बिका से श्रीपाद प्रभु ने कहा, “तुम्हारा संकल्प पूर्ण होगा. मैं और चौदह वर्षा तक, अर्थात् जब तक यह शरीर ३० वर्ष की आयु प्राप्त करता है, तब तक श्रीपाद श्रीवल्लभ के ही रूप में रहकर फिर गुप्त हो जाऊंगा. तत्पश्चात् सन्यास धर्म के उद्धार हेतु नृसिंह सरस्वति नाम से अवतार लूंगा. इस अवतार की समाप्ति के पश्चात् कर्दली-वन में ३०० वर्षों तक तपश्चर्यारत रहकर प्रज्ञापुर (अक्कल कोट) में स्वामी समर्थ के नाम से अवतार धारण करूंगा. अवधूत अवस्था में, सिद्ध पुरुषों के रूप में, अपरिमित दिव्य कांति से युक्त होकर, अगाध लीलाएँ दिखाऊँगा. सभी लोगों की धर्मं-कर्म के प्रति आसक्ति बढ़ाऊँगा.

श्री पळनीस्वामी आगे बोले, “जैसे-जैसे युग परिवर्तन होगा, वैसे-वैसे मानव की शक्ति कम होती जायेगी. अतः ऋषीश्वरों की इच्छानुसार मानव कल्याण के लिए परतत्व निचले स्तर पर आयेगा. शरीरधारी प्रभु का अवतार संपूर्ण अनुग्रह का संकेत है, इस प्रकार प्रभु-तत्व निचले स्तर पर आने के फलस्वरूप अल्प श्रम से ही मानव को उत्तम फल प्राप्त होगा. इसीलिये कलियुगीन मानव धन्य है. उसे केवल स्मरण मात्र से ही श्री दत्तप्रभू का अनुग्रह प्राप्त होगा. मानवीय पतन के जितने मार्ग हैं, श्री चरणों का अनुग्रह प्राप्त करने के उससे भी कहीं अधिक, असंख्य मार्ग हैं. यही परम सत्य है. स्मरण, पूजन करने से श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु से संपर्क स्थापित होता है. इसके परिणाम स्वरूप साधक के पापकर्म, दोष, विषय वासना, संस्कार श्रीपाद श्रीवल्लभ के चैतन्य रूप में प्रवेश करते हैं. भक्तों को उनसे शुभस्पन्दनों की प्राप्ति होती है. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी साधकों के चैतन्य में उपस्थित पापों का विनाश पवित्र नदी में स्नान करके करते हैं, अथवा अपनी योगाग्नि से ही उन पापों को भस्म कर देते हैं. वे कर्मसूत्र का अतिक्रमण न करते हुए भक्तों की रक्षा करते हैं. यदि आवश्यकता हो, तो अत्यंत जडस्वरूप कर्मफलों का शोषण करके अपने भक्तों को मुक्ति प्रदान करते हैं. प्रतिक्षण उनके कर्मों का नाश करते हैं. इसीलिये उनके भक्तों की अनजाने में ही कर्म बंधनों से मुक्ति हो जाती है. उन्हें मुक्ति प्राप्त होती है. श्री पळनीस्वामी के इस कथन के बाद भी मेरी शंका का समाधान नहीं हुआ था. मैंने उनसे एक और प्रश्न पूछने का साहस किया, “स्वामी! सुना है कि शनिदेव की साढ़ेसाती के कष्ट से भगवान शंकर भी छूट न पाए. सार्वभौम श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ग्रहों से सम्बंधित कष्टों से किस प्रकार मुक्ति देते हैं, कृपया यह समझाने का कष्ट करें,

इस पर श्री पळनीस्वामी ने कहा, “वत्स! शंकर! खगोल स्थित ग्रहों की जीवमात्र से मित्रता अथवा शत्रुता होती ही नहीं है. अपने जन्म के समय मानव अपने प्रारब्ध कर्म के अनुसार किसी ग्रह की महादशा में जन्म लेता है, उन ग्रहों से संबंधित शुभाशुभ फल की उसे प्राप्ति होती है. यदि ग्रहों से आनेवाले सूक्ष्म किरण अशुभ फल देने वाले हों, और उनके दोष निवारण हेतु मंत्र, तंत्र, यंत्र यदि कोई फल न दें, तो जप, तप, होम का आश्रय लें. इस उपाय से भी यदि शान्ति न हो तो श्री दत्त गुरू की चरण पादुकाओं की शरण में जाए, श्री चरण सर्वशक्ति संपन्न हैं. शक्ति शुभ तथा अशुभ – दोनों प्रकार की होती है. शक्ति के प्रकार के अनुसार, उसमें से विकिरित स्पंदनों के फलस्वरूप शुभ तथा अशुभ घटनाएँ घटित होती है. प्रत्येक ग्रह का मानव शरीर के किसी विशेष अंग पर ही आधिपत्य होता है. ग्रहबाधा होने की स्थिति में, उस ग्रह द्वारा शासित अंग ही पीड़ित होते हैं. विश्व-चैतन्य से प्रवाहित सूक्ष्म स्पंदनों के कारण ही इष्ट अथवा अनिष्ट फल की प्राप्ति होती है. स्पंदनों के बीच आकर्षण अथवा विकर्षण होता है. सज्जनों का सहवास प्राप्त हुआ व्यक्ति यदि दुर्जनों के सहवास में आए, तो अकारण ही कलह, बंधु-वियोग, परिवार के सदस्यों से वाद विवाद होते हैं. यह अनिष्ट आकर्षण शक्ति के कम होने के कारण होता है. विश्व-शक्ति निरंतर स्पंदनों की उत्पत्ति करती रहती है. ये स्पंदन अल्प काल तक मनुष्य पर प्रभाव डालते हैं. काल – शक्ति स्वरूप है. थोड़े समय पश्चात् ये स्पंदन उस मनुष्य को छोड़कर विधि के विधानानुसार प्रभावित होने वाले किसी अन्य मानव के शरीर में प्रवेश करते हैं. काल-चक्र के अनुसार उनका फल प्राप्त होता रहता है. मानव मन में ईश्वर भक्ति जागृत होने पर जब वह जप, तप आदि करता है, तो ग्रहों की तीव्रता कुछ अंशों में कम हो जाती है. महात्माजन लोक एवं विश्व कल्याण की इच्छा से विविध प्रकार के यज्ञ किया करते हैं. अपनी तपस्या का फल भी दान किया करते हैं. इस प्रक्रिया के कारण विश्व में उत्पन्न हुए अनिष्टकारक स्पंदन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को कष्ट न देकर वापस अपने उद्गम स्थान की और चले जाते हैं, इस प्रक्रिया को तिरोधान कहते हैं, थोड़ा-सा ही पुण्य कार्य करने से विशेष शुभ फल की प्राप्ति को अनुग्रह कहते हैं.”

स्वामी आगे बोले, “वत्स! क्रियायोग के सिद्धांत के अनुसार सृष्टि, स्थिति, लय इन तिरोधान अनुग्रहों को मैंने स्पष्ट किया. तुमने ध्यानस्थ अवस्था में यवन प्रतीत हो रहे जिस साधू को देखा, उस साधू के भीतर भविष्य काल में श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की शक्ति विशेष रूप से प्रवाहित होगी. नीम के वृक्ष के पास स्थित भूगृह में प्रज्ज्वलित हो रहे चार नंदादीपों के दर्शन तुम कर सके, यह असाधारण चमत्कार है. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने किसी महान उद्देश्य को दृष्टिगत रखकर ही तुम्हें यह अनुभव प्रदान किया है. उनकी आतंरिक इच्छा को केवल वे ही जानते हैं. उनकी लीलाएं अगम्य हैं, गूढार्थ से परिपूर्ण हैं. उनका अर्थ स्वामी के अतिरिक्त कोई और नहीं जान सकता. इसमें भी कोई दैवी रहस्य छुपा होगा. उनकी अनुमति से ही मैं उसका वर्णन कर सका. समस्त सृष्टि उनकी नज़रों के घेरे में ही रहती है. उनका प्रमाण वे ही हैं. उनमें वे ही श्रेष्ठ हैं. विश्वनियन्ता भी वे ही हैं, योगसिद्ध हैं, अजेय हैं. किन्हीं भी परिमाणों, परिमितियों से परे हैं.”

श्री पळनीस्वामी के इस वर्णन से मेरा ह्रदय आनंद से परिपूर्ण हो गया. मैं उडुपी क्षेत्र से निकला. कुरवपुर की यात्रा करते हुए मार्ग में कितनी चित्र-विचित्र घटनाएं घटती जा रही थीं. इन सब अनुभवों को  ग्रन्थ रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति सर्व व्यापी श्री गुरु से लेने के विचार से मैंने श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दर्शन करने के पश्चात् उनसे इस विषय में विचार विनिमय करने का निश्चय किया.  

श्री पळनीस्वामी मेरे  ह्रदय के भावों को समझ गये और बोले, “तुम्हारे मन के विचार को मैं समझ गया हूँ. भविष्य में भक्तों के कल्याण के लिए तुमने श्री प्रभु के चरित्र को लेखनीबद्ध करने का निश्चय किया है. श्री स्वामी तुम्हारे प्रयत्नों को अवश्य आशीर्वाद देंगे.”

श्री पळनीस्वामी ने माधव से कहा कि वह अपने ध्यानानुभव के बारे में बताए. माधव ने अपने अनुभव सुनाना आरम्भ किया.

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ की जन्म भूमि में श्री की चरण पादुकाओं, श्रीपाद श्री वल्लभ, श्री दत्तात्रेय एवँ श्री नृसिंह सरस्वति की मूर्तियों की स्थापना.     

श्री पळनीस्वामी बोले, “वत्स! माधव, तुमने श्रीपाद श्रीवल्लभ के मातागृह के दर्शन किये, वही श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का जन्म स्थान है, जिसने तुम्हारे भीतर की सभी शक्तियों को आकर्षित किया है. वहाँ स्थापित चरण पादुकाओं के नीचे पाताल लोक में सहस्त्रों वर्षों से तपस्या-रत ऋषि हैं. तुमने श्रीपाद श्रीवल्लभ के जन्म स्थान के दर्शन किये, केवल वहीं श्री की चरण पादुकाओं की स्थापना की जायेगी. चरण पादुकाओं की स्थापना के कुछ वर्षों बाद अति प्रयत्न से श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्र प्रकाशित किया जाएगा. जिस स्थान पर बैठकर तुमने ध्यान किया वहाँ श्रीपाद श्रीवल्लभ उनके पूर्वावतार श्री दत्तात्रेय और उनके भावी अवतार श्री नृसिंह सरस्वति की मूर्तियों की स्थापना की जायेगी. उसके पश्चात् उस क्षेत्र में अनेक लीलाएँ होंगी.”

इसके पश्चात् श्री पळनीस्वामी कुछ देर मौन रहे, फिर उन्होंने हमारी गुफा के निकट से उस नवयुवक का मृत शरीर बाहर निकालने की आज्ञा दी. मृत शरीर को बाहर निकालने के पश्चात् उन्होंने प्रणवोच्चार आरम्भ किया. व्याघ्रेश्वर शर्मा “श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये” का जयघोष कर रहा था. श्री पळनीस्वामी ने नवयुवक के शरीर में प्रवेश किया. शिथिल हो चुके उनके वृद्ध शरीर को व्याघ्रेश्वर शर्मा नदी में प्रवाहित करने के लिए ले गया.

नूतन शरीर में प्रवेश कर चुके श्री पळनीस्वामी ने आज्ञा दी, “तुम दोनों इसी क्षण यहाँ से प्रस्थान करो. वत्स, माधव! तुम अपने विचित्रपुर को जाओ. वत्स, शंकर, तुम तिरुपति महाक्षेत्र की और जाओ. माधव, तुमने अपने सूक्ष्म शरीर से पीठीकापुर के पुण्यवान व्यक्तियों के दर्शन कर लिए हैं, वही तुम्हारे इस जन्म के लिए पर्याप्त है. श्रीपाद श्रीवल्लभ अनुग्रह प्राप्तिरस्तु.”

तभी माधव विचित्रपुर की और चला पड़ा, मैंने तिरुपति की और प्रस्थान किया. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की लीलाओं का कोई अंता नहीं, यही सत्य है.

 

“श्रीपाद श्रीवल्लभ की जय हो.”

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