“श्रीपाद राजं शरणं
प्रपद्ये.”
अध्याय ६
नरसावधानी का
वृत्तांत
दूसरे दिन सबेरे, जप, ध्यान आदि करने के पश्चात तिरुमलदास बोले, “बेटा! श्रीपाद श्रीवल्लभ इस चराचर सृष्टि के मूल हैं. वे वटवृक्ष के समान
हैं. उनके सभी अंशावतार वटवृक्ष की विविध जटाओं के समान हैं. ये ही जटाएँ वापस
भूमि में जाकर स्वतन्त्र तत्व के रूप में प्रकट होती हैं, परन्तु उनका आधार
वटवृक्ष ही रहता है. देवों से, दानवों से लेकर समस्त प्राणियों को उन्हीं का आधार प्राप्त है. समस्त
शक्तियों को आश्रय उन्हीं से प्राप्त होता है. ये शक्तियाँ वापस उन्हीं में विलीन
हो जाती हैं. पर्वत के शिखर पर पहुँचे व्यक्ति को सभी रास्ते एक जैसे ही प्रतीत
होते हैं. उसी प्रकार सभी सम्प्रदायों के लोग दत्त-तत्व में ही समन्वय को प्राप्त
होते हैं.
हर प्राणी के चारों और कांति का एक वलय होता है. जब मैं पीठिकापुर में रहता
था, तो वहाँ एक योगी
आया. वह मूर्तियों के कांति-वलय के बारे में बताया करता था. वह यह बता सकता था कि
किसी व्यक्ति की कांति किस रंग की है और कितनी दूरी तक व्याप्त है. उसने श्री
कुक्कुटेश्वरालय आकर स्वयंभू दत्तात्रेय की कांति कितनी दूरी तक व्याप्त है और वह
किस रंग की है. इस बात की परीक्षा करने का निश्चय किया. उस योगी को स्वयंभू
दत्तात्रेय के स्थान पर श्रीपाद श्रीवल्लभ के दर्शन हुए. उनके मस्तक के चारों ओर
विद्युल्लता के समान अप्रतिम धवल कांति व्याप्त थी. उस धवल कांति के भीतर की ओर
व्याप्त नील वर्ण की कांति के उसे दर्शन हुए. वह मूर्ती उस योगी की ओर देखकर बोली, “वत्स! दूसरे
व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर कितनी दूर तक व्याप्त है, इसे जानने के प्रयत्न में अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ न गँवाओ. पहले अपने हित
के बारे में सोचो. कुछ ही दिनों में तुम्हारी मृत्यु होने वाली है. सद्गति प्राप्त
करने के बारे में विचार करो. सभी सत्यों का, सभी तत्व मूलों का मूल जो है, वह दत्तात्रेय मैं ही हूँ. इस कलियुग में पादगया क्षेत्र में महान सिद्ध
पुरुषों के, महान योगियों के
महान भक्तों के प्रेमपूर्ण आह्वान के कारण ही मैंने यहाँ अवतार धारण किया है.”
श्री स्वामी के इस उपदेश के फलस्वरूप उसके भीतर की पूर्व वासनाओं का विनाश
हो गया. सूक्ष्म शरीर की कांति संबंधी जानकारी प्राप्त करने की उसकी शक्ति
श्रीवल्लभ स्वामी में ही विलीन हो गई. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के उन्हीं के घर
में दर्शन पाकर वह धन्य हो गया. स्वच्छ, धवल कांति युक्त श्रीवल्लभ स्वामी अत्यंत निर्मल है, संपूर्ण योगावतार
हैं. नीले रंग की कांति वाले प्रभु अनंत प्रेम से, अनंत करूणा से परिपूरित है. ये रंग इन गुणों को प्रदर्शित करते हैं.
उस योगी के कुछ देर विश्राम कर लेने के पश्चात श्रद्धापूर्ण चर्चा आरंभ हुई.
क्या चतुर्वर्णों में विभाजित सूक्ष्म शरीर की कांति का भेद की दृष्टि से निर्णय
किया जाए? अथवा कुल-गोत्र की
दृष्टि से विचार किया जाये? किस वर्ण में जन्मे प्राणी का वेदोक्त विधि से उपनयन किया जाए? किस वर्ण में
जन्मे प्राणी का शास्त्रोक्त उपनयन करना चाहिए? उपनयन विधि में भृकुटी के मध्य में स्थित तीसरे नेत्र का क्या कोई संबंध है? यदि ऐसा न हो, तो
क्या कोई अन्य विशेष बात है? मेधावी व्यक्ति से क्या तात्पर्य है? इस प्रकार की चर्चा बड़ी देर तक गरमा-गरमी के साथ चल रही थी, परन्तु पंडितों का
एकमत नहीं हो रहा था.
सत्य ऋषीश्वर के नाम से जाने जाने वाले मल्लादी बापन्नावधानी ‘पीठिकापुर ब्राह्मण
परिषद्’ के अध्यक्ष थे. उन्हें लोग श्रद्धापूर्वक बापन्ना आर्य भी कहते थे. वे
मुख्यतः सूर्य और अग्नि की उपासना किया करते. पीठिकापुर में एक यज्ञ का आधिपत्य
करने की उनसे प्रार्थना की गई. यज्ञ के अंत में कुम्भ वृष्टि हुई. पूरा जन समुदाय
प्रसन्न हो गया. श्री वत्सवाई नरसिंह वर्मा नामक क्षत्रिय व्यक्ति ने विनती की, कि श्री सत्य
ऋषीश्वर इसी गाँव में रह जाएँ, परन्तु श्री बापन्नाचार्य केवल यज्ञ-याग में मिला हुआ सीधा-धन ही ग्रहण
करते थे. यदि वह द्रव्य शुद्ध न हो तो वे उसे स्वीकार न करते. उन्होंने श्री वर्मा
की विनती से इनकार कर दिया.
श्री वर्मा के पास उनकी अत्यंत प्रिय कपिला गाय थी. उसका नाम था गायत्री. वह
खूब दूध देती. वह अत्यंत सुशील एवं साधु स्वभाव की थी. एक दिन गायत्री कहीं दिखाई
नहीं दी. कहीं खो गई. रास्ता भूल गई. श्री वर्मा को जब इस बात की जानकारी प्राप्त
हुई, तो उन्होंने श्री
बापन्ना आर्य से. जो ज्योतिष शास्त्र के पंडित थे, गायत्री के कुशल-क्षेम संबंधी प्रश्न किया. तब बापन्ना आर्य ने बताया कि
“श्यामलाम्बापुर (सामर्ला कोटा) में खान साहब नामक एक कसाई है. गायत्री उसीके पास
है. यदि जल्दी न पहुंचे तो उसका वध होने का भय है.” वर्मा ने श्यामलाम्बापुर की और
एक आदमी को भेजने के प्रयत्न में बापन्ना आर्य के सम्मुख एक शर्त रखी: बापन्ना
आर्य के कथनानुसार यदि गायत्री मिल जाती है, तो वर्मा बापन्ना आर्य के पांडित्य के सम्मान के रूप में उन्हें तीन एकड
भूमि और निवास के लिए घर देंगे. बापन्ना आर्य यदि इसे ग्रहण नहीं करते तो उन्हें
गोहत्या का पातक लगेगा. बापन्ना आर्य बड़ी दुविधा में पड़ गए. यदि वे यह दान स्वीकार
नहीं करते, तो वर्मा गाय की
ह्त्या होने देंगे. फलस्वरूप उन्हें गो ह्त्या का पातक लगेगा. बापन्ना आर्य ने
निर्णय किया कि गो ह्त्या के पातक की अपेक्षा पांडित्य-सम्मान को स्वीकार करना
श्रेयस्कर होगा. इस प्रकार गायत्री की रक्षा हो गई. पीठिकापुर वासियों का भाग्योदय
हो गया. श्री बापन्नावाधानी तीन एकड़ उपजाऊ भूमि के स्वामी हो गए. उनके निवास के
लिए घर की व्यवस्था भी हो गई. श्री बापन्ना आर्य के यहाँ वेंकटावधानी नामक एक
पुत्र तथा सुमति नामक पुत्री का जन्म हुआ. सुमति की जन्म कुण्डली में सभी शुभ लक्षण
उपस्थित थे. उसकी चाल एवं लचक महारानी को भी लज्जित करे इस प्रकार की थी. उसका
नामकरण किया गया – सुमति महारानी.
श्री बापन्ना आर्य की कीर्ति थोड़े ही समय में दसों दिशाओं में फ़ैल गई. घंडिकोटा
उपनाम का भारद्वाज गोत्रोत्पन्न, आपस्तन्भ सूत्र की वैदिक शाखा का एक बालक, जिसका नाम अप्पल
लक्ष्मी नरसिंह राज शर्मा था, पीठिकापुर आया. उनके घर में कालाग्निशमन नाम से प्रख्यात दत्तात्रेय की
मूर्ती थी. वह दत्त मूर्ति पूजा के समय स्पष्ट रूप से बात करती थी. आदेश भी देती
थी.
अप्पल राज शर्मा के माता-पिता का उसकी बाल्यावस्था में ही देहांत हो जाने के
कारण वह अनाथ था. पूजा के समय कालाग्निशमन दत्तात्रेय ने आदेश दिया, “तुम पीठिकापुर
जाकर हरितस गोत्रीय, आपस्तम्भ सूत्र की वैदिक शाखा के
मल्लादी
बापन्नावधानी
के यहाँ विद्याध्ययन करो.” श्री बापन्ना आर्य ने दत्तात्रेय के आदेशानुसार अपने घर
विद्यार्थी के रूप में राज शर्मा को मधुकरी (तैयार भोजन जो ब्राह्मण को दिया जाता
है) न माँगने दी, अपितु अपने ही घर में उनके भोजन की व्यवस्था कर
दी. श्री बापन्ना आर्य शनि-प्रदोष काल में शिवाराधना किया करते. घर की महिलायें भी
शनि-प्रदोष के दिन शिव का व्रत करती थीं. प्राचीन काल में नन्द-यशोदा ने
शनि-प्रदोष शिवाराधना की थी, इसीके फलस्वरूप श्री कृष्ण के
लालन-पालन करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ. बापन्ना आर्य के साथ सुदैव से श्री
नरसिंह वर्मा, श्री वेंकटप्पैया श्रेष्ठी तथा कुछ प्रमुख
वैश्य लोग भी आराधना में सम्मिलित होते.
श्री कुक्कुटेश्वर
स्वामी के मुख से निकली वाणी.
सुमति एवं
अप्पल्रराजू का विवाह
एक बार शनि-प्रदोष शिवाराधना के बाद श्री कुक्कुटेश्वर के शिवलिंग से
विद्युत् कांति प्रकाशित हो रही थी. उस समय उसमें से वाणी निकली, “वत्स!
बापन्नार्या, अपनी बेटी सुमति महारानी का, निःसंदेह, अप्पल्रराजू से विवाह कर दो, इससे लोक कल्याण होगा. यह श्री दत्त प्रभु का निर्णय है. इस महानिर्णय का
उल्लंघन करने का अधिकार इस समूची चराचर सुष्टि में किसी भी व्यक्ति को नहीं है.”
यह देववाणी वहाँ उपस्थित वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी, नरसिंह वर्मा, और पूरे जन समुदाय ने सूनी. सभी आश्चर्यचकित हो गए.
गोदावरी मंडल के अंतर्गत आइनविल्ली ग्राम के राज शर्मा के बंधू मित्रों को, परिवार जनों को
संदेसा भेजा गया. विवाह का निर्णय किया गया. राज शर्मा के पास कोई घर-बार नहीं था.
अतः थोड़ा विचार-विमर्श किया गया.
श्री वेंकटप्पा श्रेष्ठी बोले, “मेरे पास कई घर हैं, उनमें से एक मैं राज शर्मा को दूंगा,” परन्तु राज शर्मा दान लेने के लिए तैयार नहीं थे. श्री श्रेष्ठी ने राज
शर्मा के सगे-सम्बन्धियों के साथ मिलकर राज शर्मा को पैतृक संपत्ति से प्राप्त
होने वाले गृह भाग का मूल्य निश्चित किया. वह एक वराह (प्राचीन काल में प्रचलित
सिक्का) निश्चित किया गया. श्री श्रेष्ठी के घर का मूल्य बारह वराह निश्चित
किया गया. राज शर्मा ने कहा कि शेष ग्यारह वराह देने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं
है. वेंकटप्पा श्रेष्ठी ने उत्तर दिया कि उस परिस्थिति में वे अपने घर का मूल्य एक
वराह ही निश्चित करके उसे बेचने को तैयार है, “यदि आपको दान स्वीकार करने में संकोच है तो मुझे एक वराह देकर यह घर खरीद
लो.” सभी ने श्रेष्ठी के कथन को धर्म सम्मत मना. श्री अप्पल लक्ष्मी नरसिंह राज
शर्मा और सुमति महारानी का विवाह महापंडितों के वेद घोष के बीच, मंगल वाद्यों की
ध्वनी के बीच बड़े ठाठ से सम्पन्न हुआ.
श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का अवतार अज्ञान के अन्धकार को दूर करने के लिए ही
हुआ है. इस हेतु से श्री प्रभु ने काल देवता को और कर्म देवता को शाप दिया. उस शाप
के कारण अज्ञान और अन्धकार के प्रतीक स्वरूप एक जन्मांध शिशु तथा अप्राकृतिक
प्रगति के स्वरूप को दर्शाने वाले एक लंगड़े बालक की राजा शर्मा को प्राप्ति हुई.
अपनी दोनों संतानों के इसा प्रकार से अपांग होने के कारण सुमति और राज शर्मा
अत्यंत दुखी थे.
आइनविल्ली ग्राम में विघ्नेश्वर का प्रसिद्ध मंदिर है. श्री राज शर्मा के
सगे संबंधी उनके दुख का परिहार करने के उद्देश्य से इस मंदिर का महाप्रसाद लेकर
पीठिकापुरम आए. सुमति और राज शर्मा ने अत्यंत आदर पूर्वक वह प्रसाद ग्रहण किया.
उसी रात को सुमति महारानी को ऐरावत ने स्वप्न में दर्शन दिए. उसके उपरांत भी कुछ
दिनों तक उसे स्वप्न में शंख, चक्र, गदा, पद्म, त्रिशूल, विविध
देवता, ऋषि, सिद्ध पुरुष,
योगी दिखाई देते. कुछ दिनों के पश्चात उसे जागृत अवस्था में भी दिव्य दर्शन होने
लगे. आंखें बंद करते ही दिव्य कांति युक्त, तप-समाधि में मग्न योगी, मुनि अद्भुत दर्शन देते.
देवताओं के जन्म नक्षत्र और सुमति के प्रसव समय के
नक्षत्र के बीच संबंध.
सुमति
महारानी ने अपने पिता को अपने दिव्य अनुभवों के बारे में बताया. वे बोले, “ये
सब लक्षण महापुरुष के जन्म के सूचक हैं.” सुमति महारानी के मामा श्रीधर पंडित बोले, “बेटी! सुमति! रवि (सूर्य) के जन्म-नक्षत्र विशाखा और श्री रामचंद्र के
अवतार का संबंध है. कृत्तिका चन्द्रमा का जन्म नक्षत्र है. इसका श्री कृष्णावतार
से संबंध है. पूर्वाषाढा नक्षत्र पर जन्मे अंगारक का श्री लक्ष्मी नरसिंह अवतार से
संबंध है. श्रवण नक्षत्र पर जन्मे बुध का बुद्धावतार से संबंध है. पूर्वा फाल्गुनी
नक्षत्र पर जन्मे गुरू का संबंध विष्णु अंश से है. पुष्य नक्षत्र पर जन्मे शुक्र
का भार्गव राम से संबंध है, रेवती नक्षत्र पर जन्मे शनि का
कूर्मावतार से संबंध है. भरणी नक्षत्र पर जन्मे राहू का वराह अवतार से संबंध है.
आश्लेषा नक्षत्र पर जन्मे केतु का मत्स्यावतार से संबंध है. तुमने जो प्रश्न किया
उसका संबंध देवी रहस्य से है. कोटी-कोटी ग्रहों को,
नक्षत्रों को, ब्रह्मांड की स्थिति एवं गति को निर्देश देने
वाले श्री दत्त प्रभु ही जन्म लेने वाले हैं, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है.”
दत्त प्रभु नित्य
वैभव विभूति हैं
अपने दिव्य अनुभवों और श्रीधर पंडित के विचार के बारे में सुमति महारानी ने
राज शर्मा को बताया. तब राज शर्मा बोले, “मैं पूजा के समय कालाग्निशमन दत्त प्रभु से पूछता हूँ. कालाग्नि शमन दत्त
प्रभु की पूजा को देखने का किसी भी व्यक्ति को अधिकार नहीं है. यह नियम है. पूजा
के उपरांत दत्त प्रभु मानव रूप में सम्मुख बैठकर बोलते हैं. पश्चात उसी मूर्ती में
विलीन हो जाते हैं. यह हमारा प्रतिदिन का नियम है. सामान्य विषय अथवा स्वार्थपूर्ण
समस्या का निवेदन हम दत्त प्रभु से नहीं करते.”
उस दिन पूजा के समय श्री दत्त प्रभु प्रसन्न थे. पूजा के पश्चात वे मानव रूप
में सम्मुख बैठे और बोले, “श्रीधर! आओ!” श्री दत्त मूर्ती में से एक रूप बाहर निकल कर उनके सामने
ध्यान मुद्रा में बैठा. फिर अंगुली निर्देश करके, “श्रीधर! आओ!” ऐसा कहा. तत्काल वह रूप उन्हीं में विलीन हो गया. राज शर्मा
आश्चर्यचकित हो गए. श्री दत्त प्रभु बोले, “अभी जो रूप तुमने देखा वह आगामी शताब्दी में होने वाला एकमेव अंशावतार ही
है. मुझमें लीन हो चुके जीवन मुक्त प्राणियों को भी मेरे बुलाने पर आना पड़ता है,
और मेरी वापस जाने की आज्ञा होने पर पर्दे के पीछे लुप्त होना पड़ता है. मेरी आज्ञा
का पालन उन्हें करना ही पड़ता है. मेरी लीला-विभूति केवल पृथ्वी तक ही सीमित नहीं
है. यह समूचा ब्रह्मांड मेरे हाथ में एक गेंद के समान खिलौना है. मेरे एक लत्ता
प्रहार से वह करोड़ों योजन दूर जाता है. मैं जन्म मृत्यु से परे हूँ.” ऐसा कहते हुए
श्री दत्त प्रभु ने राज शर्मा के भ्रूमध्य को स्पर्श किया. तत्काल राज शर्मा की
पूर्व स्मृति जागृत हो गई. उसने किसी युग में विष्णु दत्त नाम से जन्म लिया था और
उसकी पत्नी सुमति का जन्म सोमदेवम्मा के नाम से हुआ था, ऐसा उसे ज्ञान हुआ. श्री दत्त प्रभु आगे बोले, “मैंने दत्त स्वरूप में दर्शन देकर यह पूछा था कि तुम्हारी क्या इच्छा है. तब
तुम लोगों ने विनती की थी कि पितृ श्राद्ध के दिन तुम्हारे यहाँ भोजन गृहण करूँ.
सूर्य एवं अग्नि के साथ मैंने श्राद्ध का भोजन किया. तुम्हारे पितृ देवों को शाश्वत
ब्रह्म लोक प्रदान किया. मैं श्रीपाद श्रीवल्लभ नाम से अवतरित होकर पिछले ९००
वर्षों से इस भूमि पर योगियों, महापुरुषो को दर्शन दे ही रहा हूँ. पीठिकापुर में भारद्वाज महर्षि ने
त्रेतायुग में सवित्र काठक यज्ञ किया था। तभी से उस यज्ञ का भस्म पर्वत के समान
जमकर स्थिर हो गया है. कालान्तर में वह भस्म द्रोणागिरी पर्वत पर छिड़का गया. जब
हनुमान द्रोणागिरी पर्वत ले जा रहे थे तो उसका एक छोटा अंश गंधर्वपुर (गाणगापुर)
में गिरा. गंधर्वपुर भीमा और अमरजा नामक दो पवित्र नदियों का संगम प्रदेशा है.
श्रीपाद श्रीवल्लभ अवतार की समाप्ति के पश्चात मैं, मीन अंश, मीन लग्न पर करंज नगरी में शुक्ल यजुर्वेदीय वाजसनेय माध्यन्दिन शाखा में
नृसिंह सरस्वति के नाम से जन्म लेकर गंधर्वपुर में अनेक लीलाएँ करूंगा. श्री शैलम
के कर्दलीवन में ३०० वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात स्वामी समर्थ के नाम से
प्रज्ञापुर में निवास करूंगा. जब शनि मीन राशि में प्रवेष करेगा, तब इस शरीर का
त्याग करूंगा.”
दत्त प्रभु का उपरोक्त वक्तव्य राजशर्मा ने अपनी धर्मपत्नी को बताया, तब
सत्य्रऋषिश्वर बापन्ना आर्य बोले, “ बेटा!
राजशर्मा! अपने पूर्व युग के जन्म में श्री दत्तप्रभू को, सूर्य को, अग्नि को श्राद्ध
का भोजन देने वाले तुम पुण्यात्मा हो. इस जन्म में भी श्री दत्त प्रभु किसी भी रूप
में आकर भोजन मांगेंगे. यदि वह दिन पितृश्राद्ध का हो, तो भी बिना किसी संकोच के ब्राह्मणों के भोजन करने से पूर्व ही यदि श्री
दत्तात्रेय ने भोजन माँगा, तो अवश्य देना. पुत्री! सुमति! इस बात को ध्यान में रखना.”
“वत्स! शंकर भट्ट! श्री दत्त प्रभु की लीलाएँ अलौकिक हैं. अब तक कभी न सुनीं, ऐसी अपूर्व हैं .
वह महालय अमावस्या का दिन था. राज शर्मा पितृ श्राद्ध की तैयारी कर रहे थे. द्वार
के सामने “भवति भिक्षां देही!” ऐसी पुकार सुनकर सुमति महारानी ने उस अवधूत को
भिक्षा दी. “कुछ वरदान मांग!” ऐसा कहने वाले उस अवधूत से सुमति महारानी बोली, “बाबा! आप अवधूत
हैं. आपका वचन सिद्ध वचन ही है. विद्वान लोग कहते हैं कि श्रीपाद श्रीवल्लभ का
अवतार शीघ्र ही इस भूमि पर होने वाला है. श्री दत्त प्रभु वर्त्तमान में किस रूप
में संचार कर रहे हैं ? ऐसा ज्ञात होता है कि पिछले सौ वर्षों से श्री दत्त प्रभु
पृथ्वी पर श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में विचरण कर रहे हैं. आपने मुझसे कहा कि “कुछ
वरदान मांग!” श्रीपाद श्रीवल्लभ का रूप देखने की मेरी तीव्र इच्छा है.”
श्रीपाद श्रीवल्लभ का
आविर्भाव
यह सुनकर उस अवधूत ने त्रिभुवन को दहलाने वाला, भूकंप के समान गडगडाहट वाला, विकट हास्य किया.
सुमति महारानी को प्रतीत हुआ कि उसके चारों ओर का विश्व पल भर में अदृश्य हो गया
है. उसके सम्मुख १६ वर्ष का एक सुन्दर बालक यति के रूप में प्रकट हुआ और बोला, “माँ! मैं ही
श्रीपाद श्रीवल्लभ हूँ , मैं ही दत्त हूँ. मेरे अवधूत रूप में तुमने मुझे
श्रीवल्लभ के रूप में देखने की इच्छा प्रकट की. वह इच्छा पूर्ण करने के लिए मैंने
तुम्हें श्रीवल्लभ के रूप में दर्शन दिए. मेरे इस श्रीवल्लभ रूप में तुम मुझसे कुछ
भी माँग सकती हो. तुमने भोजन देकर मुझे तृप्त कर दिया है. जो मांगोगी वह वरदान दूं, ऐसी मेरी इच्छा
है. इस जगत के लोग यदि संकल्प रूप में पाप कर्म करें, तो उन पापों का फल ही प्राप्त होगा. संकल्प से पुण्य कर्म करने पर पुण्य
कर्मों का फल प्राप्त होगा. निष्काम कर्म का आचरण करें तो उसे अकर्म कहते हैं. वह
न तो सुकर्म होता है और न ही दुष्कर्म. अकर्म का पाप अथवा पुण्य, किसी भी प्रकार
का फल नहीं होने से कोई अन्य फल ही देना पड़ता है. वह ईश्वराधीन है. अर्जुन ने
अकर्म किया, इसी कारण
श्रीकृष्ण ने उसे कौरवों को मारने की आज्ञा दी. इस प्रकार, उन्हें मारने से पाप
नहीं पड़ेगा, ऐसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था. कौरवों का संहार करना ईश्वरीय
निर्णय था. तुम दंपत्ति ने भी विशेष अकर्म किया है. इसलिए लोकहितार्थ कुछ प्रतिफल
देना होगा. अपनी इच्छा निःसंकोच होकर कहो, उसे अवश्य पूर्ण करूंगा.”
श्री दत्तात्रेय के दर्शन
के उपरांत सुमति महारानी का संकल्प
उस दिव्य मंगल मूर्ती को देखकर सुमति महारानी ने उनका चरण स्पर्श किया. श्री वल्लभ स्वामी ने सुमति महारानी को
ऊपर उठाकर कहा, “माँ ! पुत्र का चरण स्पर्श करना अयोग्य है. इससे पुत्र की आयु क्षीण होती
है.” तब सुमति बोली, “श्रीवल्लभ प्रभु! माँ कहा है, तो यह आपका सिद्ध वचन है. इसी वचन को सत्य करें. मेरे पुत्र के रूप में
जन्म लें.” इस पर श्री दत्ता प्रभु ने “तथास्तु!” कहा और बोले, “मैं श्रीपाद
श्रीवल्लभ के रूप में तुम्हारे गर्भ में आऊँगा. माँ यदि पुत्र के चरण स्पर्श करे, तो पुत्र की आयु
निश्चय ही क्षीण होती है. अतः मैं धर्मं-कर्मों के सूत्रों के विरुद्ध नहीं
जाऊंगा. पुत्र के रूप में १६ वर्षों तक जीवन व्यतीत करूंगा.” इस पर सुमति बोली, “यह कितना अविचार
है! सिर्फ १६ वर्षों की आयु!” यह कहकर वह विलाप करने लगी. तब श्री प्रभु बोले, “माँ! १६ वर्षों
तक तुम्हारी आज्ञा का पालन करते हुए रहूँगा. ‘प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं
मित्रवदाचरेत्’ ऐसा शास्त्रों में कहा है. १६ वर्ष के पुत्र से मित्र समान व्यवहार
ही करना चाहिए. अपनी इच्छाएँ उस पर थोपना नहीं चाहिए. मुझ पर विवाह करने हेतु दबाव
न डाला जाए. यति होकर स्वेच्छा से भ्रमण करने की अनुमति दी जाए. यदि मेरे इस
संकल्प के विरुद्ध दबाव डाला जाएगा, तो मैं घर में नहीं रहूँगा.” ऐसा कहकर श्री
दत्त प्रभु तत्काल अदृश्य हो गए.
सुमति महारानी अवाक् रह गई. उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था. पूरे वृत्तांत का
उसने अपने पति के सामने वर्णन किया. तब अप्पल राजू बोले, “सुमति, चिंता न करो. श्री
दत्त प्रभु इस प्रकार हमारे घर भिक्षा हेतु आयेंगे, इसके बारे में तुम्हारे पिता ने पहले ही कहा था. श्री दत्त प्रभु करुणा के
महासागर हैं. श्री वल्लभ का जन्म होने दो, बाद में विचार करेंगे.”
अप्पल राजू के घर अवधूत आये थे, यह समाचार पूरे गाँव में फ़ैल गया. पितृदेवों के लिए अत्यंत प्रमुख महालय
अमावस्या के दिन ब्राह्मणों के भोजन करने से पहले अवधूत को भिक्षा दी गई, इस विषय पर चर्चा
की गई. श्री बापन्नावधानी ने कहा, “श्रीपाद श्रीवल्लभ का जन्म होने वाला है, ऐसा सभी कहते हैं! अवधूतों को साष्टांग प्रणाम करना उचित ही है! इसमें
सुमति का कोई दोष नहीं है. पुत्र रूप में जन्म लेने के बाद साष्टांग प्रणाम करने
से उसकी आयु क्षीण होती है, परन्तु अवधूत वेष में होने पर साष्टांग प्रणाम करने में कोई गलती नहीं है.”
इस घटना से पीठिकापुरम के सभी ब्राह्मणो की ईर्ष्या बढ़ गई. विशेषतः
नरसावधानी नामक पंडित की. अमावस्या के दिन सभी पितृ कार्य में मग्न थे. भोक्ताओं
की कमी थी, यह बड़ी समस्या थी.
मगर श्री बापन्ना आर्य ने कहा कि अप्पल राजू के घर में कार्य निर्विघ्न संपन्न
होगा. श्री राज शर्मा कालाग्निशमन दत्त का ध्यान कर रहे थे. तभी तीन अतिथि भोक्ता
के रूप में आये, और पितृ कार्य निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हुआ.
“वत्स! शंकर भट्ट! उस दिन की चर्चा का मुख्य विषय यह था कि वैश्य वर्ण के
लोगों को वेदोक्त उपनयन करने का अधिकार है अथवा नहीं? ब्राह्मणों की परिषद् बैठी. बंगाल देश से नवद्वीप के आशुतोष नामक पंडित
पादगया क्षेत्र में आये हुए थे. उनके पास अत्यंत प्राचीन नाडी ग्रन्थ था. उन्हें
भी परिषद् में आने का निमंत्रण भेजा गया. बापन्नाचार्य ने कहा कि जहाँ तक
नियम-निष्ठा का प्रश्न है, तो ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य एक समान ही होते हैं.”
श्रीपाद स्वामी के जन्म के समय पर दृष्टिगोचर हुआ
अद्भुत दृश्य
तभी मैंने
कहा, “महाराज, श्रीपाद प्रभु की लीला विस्तार पूर्वक
वर्णन करके मुझे धन्य करें.”
“अरे,
शंकर भट्ट! नरसावधानी बापन्ना आर्य पर क्रोधित हो गए और उन्होंने येन-केन प्रकारेण
उनका अपमान करने का निश्चय किया. उनकी (नरसावधानी की) बगुलामुखी साधना विफल होने
का एकमेव कारण बापन्नार्य ही हैं, ऐसा उनका दृढ़ विश्वास था.
उन्होंने यह कुप्रचार करना आरम्भ किया कि बापन्नार्य ने तांत्रिक प्रयोग से उनकी मंत्रसिद्धि
को निष्प्रभ कर दिया है. नाडी-ग्रन्थ में श्रीपाद प्रभु के अवतार के विषय में जो
विवरण था, वह उन्हें विचलित कर रहा था. नाडी-ग्रन्थ मूलतः
अविश्वसनीय है; बापन्नार्य ने मत्स्याहारी ब्राह्मण को भोजन
कराया, यह अनाचार था, ऐसा वाद
नरसावधानी ने प्रस्तुत किया. मनुष्य पूर्णब्रह्म का अवतार कदापि नहीं हो सकता, तो नन्हा बालक श्रीपाद श्रीवल्लभ सर्वान्तर्यामी,
सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान श्री दत्त प्रभु का अवतार किस प्रकार हो सकता है? श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने अत्यंत शैशव अवस्था में किया हुआ
प्रणवोच्चार, झूले में किया हुआ शास्त्र-प्रसंग और अपनी आयु
को शोभा न देने वाला प्रज्ञा (बुद्धि) का प्रदर्शन – नरसावधानी यह सब मानने को तैयार नहीं थे. उन्होंने ऐसा
प्रचार किया कि कोई विद्वान ब्राह्मण श्रीपाद के शरीर में प्रवेश करके यह सब कहता
है. श्री कुक्कुटेश्वर के मंदिर में स्थित स्वयंभू दत्त ही वास्तविक दत्तात्रेय
हैं. वे ही वरदान प्रदान करने वाले हैं. इस बालक को दत्त स्वरूप समझना गलत है. नरसावधानी
सबको यही बात समझाने का प्रयत्न कर रहे थे.
श्रीपाद
स्वामी के जन्म के बाद (जिस स्थान पर उन्हें सुलाया जाता था,
वहाँ) लगातार नौ दिनों तक तीन फनों वाला नाग अपने फन उभार कर बालक पर छाया करता
था. श्रीपाद स्वामी माता के गर्भ से साधारण बालक की भाँति नहीं जन्मे, बल्कि ज्योति स्वरूप से अवतरित हुए थे. उनके जन्म के समय महारानी सुमति
मूर्छित हो गईं. प्रसूति गृह से मंगल वाद्यों की ध्वनि सुनाई देने लगी. थोड़ी ही
देर में आकाशवाणी हुई और सभी को बाहर जाने का आदेश हुआ. श्रीपाद स्वामी के
सान्निध्य में चार वेद, अठारह पुराण और महापुरुष ज्योति रूप
में प्रकट हुए और पवित्र वेद मन्त्रों का घोष बाहर सबको सुनाई दिया. थोड़ी देर के
बाद सब कुछ शांत हो गया. ये अद्भुत घटनाएँ बापन्नार्य को भी अगम्य और आश्चर्यकारक
प्रतीत हुई.
श्रीपाद स्वामी की
बाल लीलाएँ
श्रीपाद अब एक वर्ष के हो गए थे. आठ-दस माह की आयु से ही वे अपने नाना
बापन्नार्य के साथ पंडित-परिषद् में जाया करते. नाना जी अपने पोते को साथ लेकर
जाते.
नरसावधानी अपने घर राजगिरे का साग उगाया करते थे. राजगिरे की भाजी अत्यंत
स्वादिष्ट होती है. गाँव के लोग नरसावधानी से उस साग के लिए विनती करते, परन्तु वे यह साग
किसी को भी नहीं देते. यदि उन्हें किसी से कोई काम करवाना होता, तो उसे साग देकर इच्छित
कार्य करवा लेते. श्रीपाद ने एक बार अपनी माँ से राजगिरे का साग
बनाने को कहा. वह साग भी उन्हें नरसावधानी के घर का ही चाहिए था. परन्तु यह काम
कठिन था. श्रीपाद शैशवावस्था में ही स्वेच्छा से चलकर नरसावधानी के घर जाया करते.
उनके घर में शास्त्रों से संबंधित चर्चा करते, साथ में चित्र-विचित्र लीलाएँ करते.
पीठिकापुर में एक महापंडित की मृत्यु हो गई थी. नरसावधानी सबसे कहते कि उस पंडित
की प्रेतात्मा श्रीपाद से विचित्र कार्य करवा रही है. बापन्नाचार्य और राज शर्मा
उस बालक का योग्य उपचार करवाने के स्थान पर उसे दत्तात्रेय का अवतार समझ रहे हैं.
पीठिकापुर पादगया क्षेत्र होने के कारण पितृ देवताओं का प्रमुख स्थान है..
यहाँ मृत आत्माओं से संपर्क स्थापित कर उनसे संभाषण करने की सामर्थ्य रखने वाले
तत्ववेत्ता रहते है, श्रीपाद के शरीर में किसी महापंडित की आत्मा ही वास कर रही है और वही उनसे
अगम्य लीलाएँ करवा रही है, पीठिकापुर में यही धारणा धीरे-धीरे दृढ़ होती जा रही थी.
तिरुमलदास पर श्रीपाद स्वामी का दिव्य अनुग्रह
तिरुमलदास
आगे बोले, “जब मैं मल्याद्रिपुरम से पीठिकापुर आया तब श्री बापन्नार्य और राजमाम्बा
के घर में रजक था. नरसावधानी के घर का रजक वृद्धावस्था के कारण मृत्यु को प्राप्त
हो चुका था. उस रजक का पुत्र वायसपुर अग्रहार (वर्त्तमान काकीनाडा) चला गया था, इसलिए उनके घर में भी रजक का काम मैं ही करता. बचपन से ही बापन्नाचार्युलु
के सहवास में होने के कारण मेरी सत्प्रवृत्ति जागृत हो गई थी और ह्रदय में
अध्यात्म की ज्योति प्रज्ज्वलित हो गई थी. जिस दिन मैं नरसावधानी को देखता उस दिन
मेरे पेट में विकार उत्पन्न होकर मेरी अवस्था अत्यंत दीन हो जाती, मैं अन्न भी ग्रहण न कर पाता. नरसावधानी के वस्त्र मैं स्वयं न धोता.
मेरा पुत्र रविदास उन्हें धोया करता. मैं सिर्फ सात्विक प्रवृत्ति के लोगों के
वस्त्र ही धोता था.
नरसावधानी
तक यह वार्ता पहुँची कि उनके वस्त्र मैं नहीं, बल्कि मेरा बड़ा पुत्र रविदास धोता
है. उन्होंने आज्ञा दी कि उनके वस्त्र मैं स्वयं धोऊँ. उनकी आज्ञा मानकर मैं
नरसावधानी के वस्त्र स्वयँ धोने लगा. कपडे धोते-धोते मैं श्रीपाद स्वामी का
नाम-स्मरण किया करता. मेरे धोये हुए वस्त्र लेकर रविदास नरसावधानी के घर गया. जब
मेरे धोये हुए वस्त्र और लोगों ने पहने तो किसी को भी कुछ न हुआ,
परन्तु जब नरसावधानी ने वस्त्र पहने तो उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो बदन पर बिच्छू
और कनखजूरे चल रहे हैं. उन वस्त्रों में उनका शरीर यूँ जलने लगा, मानो अग्नि पर
रखा हो. नरसावधानी ने मुझे बुलाया और क्रोधित होकर बोले कि मैंने किसी क्षुद्र विद्या का, मन्त्र का प्रयोग
उनके वस्त्रों पर किया है. इस बात की शिकायत उन्होंनें न्यायाधीश से कर दी. परन्तु
चतुर न्यायाधीश ने मुझे निर्दोष घोषित करते हुए छोड़ दिया. मैं प्रसन्नता से घर
लौटा. कुछ ही देर में श्रीपाद प्रभु एक सोलह वर्षीय युवक के रूप में हमारे घर आये.
श्रीपाद प्रभु चाहे जिस रूप में भक्तों को दर्शन देते. मैं आश्चर्य से बोला, “महाराज, आपने अति उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लिया है, अतः हम रजकों की बस्ती में आपका आना उचित नहीं.” तब प्रभु बोले, “नरसावधानी जैसे ब्राह्मण जो अपने सर पर पापों की गठरी उठाए फिरते हैं, वास्तव में वे रजकों से निम्न श्रेणी के होते हैं. परन्तु तुम्हारे जैसे
रजक, जिनमें ब्राह्मणों के प्रति आकर्षण है, उनसे कहीं श्रेष्ठ होते हैं.”
श्रीपाद स्वामी के ये शब्द सुनकर मैं उनके चरणों में नतमस्तक हो गया और
फूट-फूट कर रोने लगा. श्री प्रभु ने मेरी और अमृतमयी द्रष्टि से देखा और अपने
दिव्य हाथों का स्पर्श करके मुझे उठाया. फिर उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरे मस्तक
पर रखा और तत्क्षण मुझे अपने पूर्व जन्मों का ज्ञान हुआ. मेरे भीतर की योग
शक्तियों को चालना मिली. मानो कुण्डलिनी शक्ति भी जागृत हो गई, ऐसा अनुभव होने
लगा. श्रीपाद प्रभु धीरे-धीरे चलकर अंतर्धान हो गए.
श्रीपाद प्रभु ने माँ से ज़िद की कि उनके लिए राजगिरे का साग बनाएँ. उन्हें
नरसावधानी के घर का साग चाहिए था, मगर यह बात असंभव प्रतीत हो रही थी. तब बापन्नार्य बोले, “वत्स, श्रीपाद! कल सुबह
मैं तुम्हें नरसावधानी के घर ले चलूँगा, तुम स्वयँ उनसे राजगिरे का साग देने की विनती करना, परन्तु यदि
उन्होंने देने से इनकार कर दिया तो फिर कभी उस साग के लिए जिद न करना.”
दूसरे दिन बापन्नार्य बालक श्रीपाद को लेकर नरसावधानी के घर गए. उनके घर
पहुँचते ही बापनार्य श्रीपाद से बोले, “श्रीपाद! बड़ों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेना चाहिए.” नरसावधानी बाहर
ओसारे में बैठे थे. उनकी लम्बी शिखा पीठ पर लहरा रही थी. अपनी शिखा नरसावधानी को
अत्यंत प्रिय थी. श्रीपाद स्वामी ने नरसावधानी की ओर देखा और दोनों हाथ जोड़कर
प्रणाम किया. जैसे ही बालक श्रीपाद की तीक्ष्ण दृष्टि नरसावधानी की पीठ पर लहराती
शिखा पर पडी, एक महदाश्चर्य की बात हुई. वह शिखा अपने आप झड कर नीचे गिर पडी. यह देखकर
नरसावधानी बड़े परेशान हो गए. अब बालक श्रीपाद ने कहा, “नानाजी! नरसावधानी की अत्यंत प्रिय शिखा झड गई है, अब क्या उनसे
राजगिरे का साग मांगना उचित होगा? चलिए, हम घर चलते है.” श्रीपाद स्वामी ने फिर कभी भी राजगिरे की भाजी नहीं मांगी.
श्रीपाद स्वामी के प्रणाम करने से हुई हानि नरसावधानी की समझ में आ गई. जब
वे ध्यानस्थ बैठे तो उनके शरीर से उनके ही जैसा दिखने वाला एक तेजोवलय बाहर निकला.
नरसावधानी ने उस तेजोवलय से पूछा, :तू कौन है?” नरसावधानी के सादृश दिखने वाली उस तेजःपुंज आकृति ने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारा
पुण्य शरीर हूँ. अब तक तुमने कितना वेद पठन किया, स्वयंभू दत्तात्रेय की आराधना की, परन्तु श्री दत्तात्रेय के साक्षात् अवतार श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का
अपमान किया है. अपनी शिखा से, राजगिरे के साग से तुम्हे जितना प्रेम था, जितनी आसक्ति थी उसका एक लक्षांश भी यदि श्रीपाद स्वामी से होता तो
तुम्हारे जन्म का सार्थक हो गया होता. परन्तु मोहपाशों से स्वयँ को जकड़ कर मोक्ष
प्राप्त करने की एक दिव्य संधि तुमने गँवा दी. तुम जल्दी ही दरिद्री होने वाले हो, उस दारिद्र्य का
हरण करने के उद्देश्य से ही श्रीपाद प्रभु ने तुमसे “शाकदान” माँगा था, यदि तुम उन्हें वह
दान दे देते तो तुम्हें अभी आने वाले दारिद्र्य के स्थान पर उत्तम ऐश्वर्य की
प्राप्ति होती. तुमने अपने ही हाथों से इस संधि को खो दिया. श्रीपाद प्रभु करुणा
के सागर हें. इस अवतार की समाप्ति के बाद वे नृसिंह सरस्वति के नाम से अवतार धारण
करेंगे. उस समय तुम एक दरिद्री ब्राह्मण के रूप में जन्म लोगे. उस जन्म में भी तुम
अपने घर में राजगिरे का साग उगाओगे. उस समय उचित अवसर देखकर मैं पुनः तुम्हारे
शरीर में प्रवेश करूंगा. उस समय श्रीपाद प्रभु तुम्हारे घर भिक्षा माँगने आयेंगे.
तुम्हारे द्वारा दी गई भिक्षा प्रेम से स्वीकार कर वे तुम्हें ऐश्वर्य प्रदान
करेंगे. मगर अभी तो मैं तुम्हारा शरीर छोड़कर जा रहा हूँ. श्रीपाद प्रभु द्वारा
किया गया प्रणाम तुम्हारे लिए नहीं, अपितु तुम्हारे भीतर पुण्य स्वरूप में वास करने वाले मेरे लिए था. उन्होंने
मुझे आज्ञा दी थी, कि मैं तुम्हें छोड़कर उनमें लीन हो जाऊँ. तदनुसार मैं श्रीपाद स्वामी के
स्वरूप में लीन होने के लिए जा रहा हूँ. अब तुम्हारे शरीर में केवल पाप पुरुष ही
शेष बचा है.” इतना कहकर वह पुण्यात्मा श्रीपाद श्रीवल्लभ के स्वरूप में लीन हो
गया.
कालान्तर से नरसावधानी की प्रकृति क्षीण होने लगी. लोग उनके शब्द का निरादर
करने लगे. उनके चेहरे पर विलास करता विद्वत्ता का तेज लुप्त हो गया.
इसी समय पीठिकापुर में हैजे का प्रकोप हुआ. अनेक ग्रामवासी मृत्यु के मुख
में चले गए. गाँव के वैद्यों ने निष्कर्ष निकाला कि यह रोग दूषित जल के कारण फ़ैल
रहा है. भयभीत ग्रामवासियों ने श्री बापन्नार्य से प्रार्थना की, कि वे इस महामारी
के निर्मूलन का कोई शास्त्रीय उपाय खोजें. श्री बापन्नार्य ने अपनी अन्तर्दृष्टि
से जान लिया कि महामारी का कारण दूषित जल नहीं, अपितु कलुषित वायुमंडल है. गाँव के वैद्य बापन्नार्य से सहमत नहीं हुए.
ग्रामवासियों ने ग्राम देवता को पशुबलि चढ़ाई, तांत्रिकों से विविध प्रकार की
पूजाएँ करवाईं जिससे महामारी का निर्मूलन हो जाए. पशु की बलि देने से उसके भीतर की
प्राण शक्ति को बलपूर्वक बाहर निकाला जाता है और उसे मंत्रोच्चार से वश में किया
जाता है. श्री बापन्नार्य का मत था, कि प्राणशक्ति को वृद्धिंगत करने के लिए योग-प्रक्रिया अथवा सात्विक आराधना
का अवलंबन करना अधिक योग्य है. उन्होंने ग्रामवासियों को यह सुझाव भी दिया, परन्तु अंधश्रद्धा
के वश, ग्रामवासी पशुओं की बलि चढाते ही रहे.
गाँव के कुछा व्यक्तियों ने श्रीपाद प्रभु के सम्मुख पशु-बलि के विषय पर
चर्चा की. इस पर श्रीपाद स्वामी बोले, “ग्राम देवता से विनती की है कि वह पशुबलि को स्वीकार न करें.”
“श्रीपाद स्वामी की आज्ञा के अनुसार ग्राम देवता समुद्र स्नान करने गई है.
अब दूध उबाल कर देवता को नैवेद्य अर्पण किया जाए तो इस महामारी से तुम्हें मुक्ति
मिलेगी. कालिका का रूप धारण की हुई ग्राम देवता शांत हो जाएगी.”
यह समाचार पूरे गाँव को सुनाने के लिए एक चर्मकार को बुलाकर चर्मवाद्य पर
डोंडी पीटने के लिए कहा गया.
“डोंडी कौन पीटेगा?” जब श्रीपाद स्वामी से यह पूछा गया तो वे बोले, “हैजे से पीड़ित वेंकय्या डोंडी पीटे. ऐसा मेरा संदेश उसे दीजिये. वे सब
ग्रामवासी वेंकय्या के पास गए. वह मरणासन्न था, उसे स्वामी का संदेश देते ही वह मूर्छित हो गया. एक घड़ी के उपरांत जब उसे
होश आया तो वह पूरी तरह स्वस्थ्य हो गया था. यह वार्ता दावानल के समान पूरे
पीठिकापुर में फ़ैल गई. वेंकय्या ने गाँव में चारों और घूमकर डोंडी पीटी. बापन्नार्य
ने अपने सेवक से कहा कि उनके सामने जल से भरा हुआ एक बड़ा पात्र लाकर रखे. वायुमंडल
में फैले ज़हरीले कीटाणुओं का नाश करने के लिए उन्होंने उचित मन्त्र का संधान किया, और तत्काल
वायुमंडल में उपस्थित विषैले कीटाणु टप-टप पानी में गिरने लगे. इस प्रकार वायुमंडल
शुद्ध हो गया और महामारी का निर्मूलन हो गया.
श्रीपाद स्वामी के जन्म दिन पर राज शर्मा पत्नी सहित बालक श्रीपाद को लेकर उसके नाना श्री बापन्नार्य के घर आये. जब-जब भी
बापन्नार्य ने श्रीपाद के चरणों पर शुभ चिह्नों को देखने का प्रयत्न किया, तब-तब उन्हें कोटि
सूर्यों की तेजस्विता आ अनुभव होता और उस प्रखर प्रकाश में वे शुभ चिह्न दिखाई
नहीं देते. इस बात का उन्हें बड़ा आश्चर्य होता. परन्तु उस दिन उषःकाल में धान के
भूसे पर उन्हे दिव्य पद चिह्न दिखाई दिए. उन्होंने अपनी कन्या सुमति से पूछा, “बेटा, इस भूसे पर से कौन
गया था?” सुमति ने उत्तर
दिया, “आपका लाडला नाती
यहाँ से गया, और कौन, बाबा!” वे पद चिह्न सोलह वर्षीय कुमार के पद चिह्नों के समान थे. नाना जी
ने बालक श्रीपाद को अपनी गोद में बिठा लिया और उसके चरण कमलों का निरीक्षण करने
लगे. इस समय उन्हें दिव्य प्रकाश के स्थान पर ‘मैं ही दत्तात्रेय हूँ,’ यह सूचित करने
वाले सुस्पष्ट चिह्नों के दर्शन हुए. उन दिव्य चरणों का बापन्नार्य ने स्नेहपूर्वक
चुम्बन लिया. उनका विश्वास दृढ़ हो गया कि यह बालक श्री दत्तात्रेय का अवतार है.
इसी समय उनके मुख से अपने आप श्री दत्तात्रेय की स्तुति में पद निकले. उन दिव्य
चरणों के दर्शन से बापन्नार्य के शरीर में अष्ट भाव जागृत हो गए. उनके नेत्रों से
आनंदाश्रु बहाने लगे. वे अश्रु श्रीपाद के गालों पर गिरे और मोतियों के समान चमकने
लगे. नानाजी ने अपने अंगवस्त्र से हौले से बालक श्रीपाद के गालों से अश्रुओं की
बूंदे पोंछी. तब श्रीपाद बोले, “नाना, तुमने सौर मंडल से शक्तिपात करके वह शक्ति श्री शैल्य स्थित श्री
मल्लिकार्जुन स्वामी के शिवलिंग में केन्द्रित की थी. उसी समय सौर मंडल की वह
शक्ति गोकर्ण महाबलेश्वर और पादगया क्षेत्र में विराजमान श्री दत्तात्रेय की
मूर्तियों में भी केन्द्रित हुई. गोकर्ण महाबलेश्वर क्षेत्र को अधिक शक्तिसम्पन्न बनाने
का संकल्प है. प्राणीमात्र के शरीर से जो अशुभ स्पंदन बाहर निकलते हैं, उन स्पंदनों को
मुझ में समाविष्ट करके, जो मेरे साधक हैं, मेरे आश्रित हैं, उनके लिए शुभ स्पंदनों का प्रसारण हो, ऐसा मेरा संकल्प है. गोकर्ण महाबलेश्वर श्री परमेश्वर का ‘आत्म लिंग’ है.
उसके केवल दर्शन मात्र से ही मुक्ति साध्य होती है. यहाँ के श्री मल्लिकार्जुन
स्वामी को शक्ति सम्पन्न करने का संकल्प है. आप सत्यऋषि हैं. जब मैं यति के रूप
में था, तब मेरी माता ने
मुझे प्रणाम किया था, इस कारण मैं अल्पायुषी हूँ, ऐसा मेरा मत था, परन्तु माँ न मुझे श्रीपाद के रूप में प्रणाम किया, अतः मैं अल्पायुषी
नहीं होऊंगा, ऐसा आपने कहा था. हम दोनों की बात झूठ सिद्ध न हो, इसलिए मैंने केवल
सोलह वर्षों तक आपके घर में रहने का निश्चय किया है. सांसारिक बंधनों से मुक्ति की
इच्छा रखने वाले मुमुक्षु जनों को अनुग्रह देने का कार्य होना है. मैं चिरंजीवी
बनूँ, ऐसी आपकी मान्यता
है, वह मैं पूरी
करूँगा. श्रीपाद श्रीवल्लभ के स्वरूप को गुप्त कर दूँगा. नृसिंह सरस्वती के रूप में
अवतार ग्रहण करने पर भी श्रीपाद श्रीवल्लभ का रूप ही शाश्वत सत्य रूप में सदा
रहेगा. नृसिंह सरस्वती का अवतार कार्य पूर्ण करने के बाद श्री शैल्य स्थित कर्दली
वन में तीन सौ वर्षों तक तपस्या करने के बाद प्रज्ञापुर (अक्कलकोट) में स्वामी समर्थ
के रूप में प्रकट होऊंगा. वहाँ स्थित वट वृक्ष में मेरी प्राण शक्ति सम्मिलित करके
श्री मल्लिकार्जुन शिवलिंग में विलीन हो जाऊंगा.”
बापन्नार्य को यह सब आश्चर्यजनक एवँ अद्भुत् प्रतीत हुआ. नानाजी के घर बालक
श्रीपाद का पहला जन्म दिन बड़े आनन्द से और ठाठ से मनाया गया. पीठिकापुर में उस दिन
एक और आश्चर्यजनक घटना घटित हुई. नरसावधानी, मंदिर के पुजारी तथा कुछ अन्य लोग
कुक्कुटेश्वर के मंदिर में दर्शनों के लिए गए थे, तब उन्हे वहाँ स्वयंभू दत्तात्रेय की मूर्ती दृष्टिगोचर नहीं हुई. मंदिर से
मूर्ती लुप्त होने की बात गाँव में दावानल की भाँति फ़ैल गई. नरसावधानी का विरोधी
एक मान्त्रिक बड़े ताव में आकर कहने लगा कि मूर्ती के अदृश्य होने के लिए नरसावधानी
ही उत्तरदायी हैं. नरसावधानी क्षुद्र विद्या के उपासक हैं. उन्होंने मूर्ती अदृश्य
कर दी है, इस प्रकार का
प्रचार उसने पूरे गाँव में करना शुरू कर दिया. पीठिकापुर के ब्राह्मणों ने
नरसावधानी के घर की तलाशी लेने का निर्णय लिया. वे ब्राह्मण श्री बापन्नार्य से मिले और उन्हें इस घटना से अवगत कराया. तब
बापन्नार्य उन ब्राह्मणों से बोले कि जब तक सत्य सामने नहीं आ जाता, तब तक मौन रहना
उचित है. योग्य समय पर इसा प्रश्न का समाधान हो जाएगा. नरसावधानी के घर की तलाशी
लेते समय संशयित स्थान की खुदाई करने पर मानव-कपाल और क्षुद्र-विद्या के काम में
लाई जाने वाली कुछ वस्तुएं मिलीं, परन्तु श्री दत्तात्रेय की मूर्ती नहीं मिली.
श्री नरसावधानी मूर्ती की चोरी के आरोप से तो मुक्त हो गए, परन्तु यह सिद्ध
हो गया कि वे क्षुद्र-विद्या के उपासक हैं. दिन पर दिन उनका शरीर क्षीण हो रहा था.
उनके यहाँ एक बाँझ गाय थी. उसे वे बैल के समान खेती-बाडी के काम में जोतते और समय
पर दाना-पानी भी न देते. एक दिन नरसावधानी के विरोधी उस तांत्रिक ने उस गाय के
शरीर में क्षुद्र-शक्ति का आवाहन किया. इसके फलस्वरूप वह गाय खूँटे का बंधन तुड़ाकर
घर में घुस गई और घर के लोगों को अपने सींगों से मारने लगी. नरसावधानी की बड़े
प्रेम से लगाई गई राजगिरे की बगिया उसने तहस-नहस कर दी. कोई भी गाय के निकट जाकर
उसे रस्सी से बाँध न सका. उसी दिन नरसावधानी के घर उनकी माता का श्राद्ध था.
श्राद्ध का पूरा भोजन तैयार हो चुका था. श्राद्ध के लिए आए हुए ब्राह्मणों का भोजन
हो चुका था. घर के लोगों ने अभी भोजन किया नहीं था. वह गाय सारा भोजन और वडे खा
गई. इसी समय बालक श्रीपाद प्रभु अपने पिता से हठ करने लगे कि उन्हें नरसावधानी के
घर ले जायें. श्री राज शर्मा उन्हें लेकर नरसावधानी के घर के सामने जाकर खड़े हो
गए. तभी वह गाय नरसावधानी के घर से बाहर आई, उसने आँगन में खड़े श्रीपाद स्वामी के चारों और तीन बार परिक्रमा की और उनके
चरणों में माथा टेककर उसने प्राण त्याग दिए.
इस प्रसंग के उपरांत गाँव के लोग कई तरह की बातें करने लगे. अनेक प्रकार के
लोकापवाद उठने लगे, जैसे कि गाय ने जो वडे खाए, उनमें ज़हर था और उन्हें खाने से गाय की मृत्यु हो गई. अब नरसावधानी को
गोहत्या का पातक लगेगा. इन सब प्रमादों से नरसावधानी त्रस्त हो गये थे. उस गाय ने
बालक श्रीपाद के चारों और तीन बार प्रदक्षिणा की और फिर उनके चरणों पर नतमस्तक
होकर प्राण त्याग दिए. अतः श्रीपाद दैवी अवतार हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं रहा.
राज शर्मा को आयुर्वेद का ज्ञान था, वे नरसावधानी की विनती के अनुसार उनका इलाज कर रहे थे, परन्तु उनके दुर्धर
रोग पर दवा का कोई प्रभाव नज़र नहीं आ रहा था. नरसावधानी का स्वास्थ्य गिरता ही जा
रहा था और इसी में एक दिन उनका देहांत हो गया.
नरसावधानी की मृत्यु के बारे में गाँव के लोग कहने लगे कि राज शर्मा ने
उन्हें उत्तम दवा नहीं दी, इसी कारण उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा. कुछ लोग कहने लगे कि
श्रीपाद श्रीवल्लभ तो नरसावधानी के घर प्रतिदिन जाया करते थे. यदि वे दत्तावतार
होते तो नरसावधानी की मृत्यु क्यों हुई? अनेक लोगों ने यह भी कहा कि नरसावधानी की मृत्यु का कारण गोहत्या के कारण
लगा पातक ही है.
जब श्री राज शर्मा और बालक श्रीपाद नरसावधानी के परिवार जनों का सांत्वन
करने गए तो नरसावधानी की पत्नी ने उनका हाथ पकड़ कर कहा, “अरे बेटा, श्रीपाद! चुटकी भर सौभाग्य का दान लेने के लिए मैं दूर-दूर तक हल्दी-कुंकुम
में जाती थी. अगर तुम दत्तात्रेय ही हो, तो क्या नरसावधानी नाना को जीवित करना
तुम्हारे लिए असंभव है?” ऐसा कहकर वह जननी रोने लगी. नवनीत के समान मृदु ह्रदय वाले श्रीपाद प्रभु
ने उस माता के आँसू पोंछे. शवयात्रा आरम्भ हुई. राज शर्मा एवं श्रीपाद उस यात्रा
में सहभागी हुए.
नरसावधानी के ज्येष्ठ पुत्र ने पिता की चिता को अग्नि देने के लिए हाथ में
जलती हुई लकड़ी ली. उसी क्षण बालक श्रीपाद के नेत्रों से अश्रु की दो बूँदें निकलीं
और मेघगर्जना के समान स्वर में श्रीपाद बोले, “अहा हा! मृत पिता के शरीर को अग्नि देने वाले पुत्र तो देखे हैं, मगर जीवित पिता को
अग्नि देने वाला पुत्र नहीं देखा!” यह सुनकर स्मशान में आये हुए सभी लोग निस्तब्ध
होकर श्रीपाद की और देखने लगे. श्रीपाद ने चिता पर लेटे हुए नरसावधानी के भ्रूमध्य
को अंगूठे से स्पर्श किया. उस दिव्य स्पर्श से नरसावधानी के शरीर में चैतन्य का
संचार होने लगा और आश्चर्यजनक बात यह हुई कि वे कुछ ही क्षणों में चिता से नीचे
उतर आये. उन्होंने श्रीपाद प्रभु को साष्टांग दंडवत किया और वे सब लोगों के साथ घर
लौट आये.
उन्हें सप्राण वापस आया देखकर उनकी पत्नी अत्यंत हर्षभरित हो गई. श्रीपाद
प्रभु के अँगूठे के स्पर्श से नरसावधानी को कर्म सूत्र का सूक्ष्म ज्ञान हो गया. उनके
घर में मृत हुई बाँझ गाय पूर्व जन्म में नरसावधानी की माँ थी. उनके घर में जो बैल
था, वह पूर्व जन्म में
उनके पिता थे. नरसावधानी को इस बात का ज्ञान हुआ, कि मरते समय उस गाय ने श्रीपाद प्रभु के चरणों में विनती की थी, कि प्रभु उसके दूध
का सेवन करें. अगले जन्म में जब वह बाँझ भैंस के रूप में जन्म लेगी, तब श्रीपाद
प्रभु नृसिंह सरस्वति के अवतार में उसके दूध का सेवन करेंगे. नरसावधानी को ज्ञात
हुआ कि श्रीपाद प्रभु ने गाय को ऐसा वचन दिया है. जिस मान्त्रिक ने नरसावधानी पर
अपनी तंत्र-विद्या का प्रयोग किया था, उसकी मृत्यु शीघ्र ही होकर अगले जन्म में वह ब्रह्म राक्षस की योनी को
प्राप्त होगा और उस पर यति वेश में श्रीपाद स्वामी कृपा करेंगे. सूक्ष्म-लोक के ये
विषय श्रीपाद प्रभु के अनुग्रह से नरसावधानी को ज्ञात हुए थे. उन्हें अपने आगामी
जन्म के वृत्तांत का भी ज्ञान हुआ. अगले जन्म में उनके घर श्रीपाद प्रभु यति के
रूप में आयेंगे, उनके हाथ से राजगिरे के साग की भिक्षा स्वीकार करके उसकी जड़ों से सोने की
मुहरों से भरा हुआ घड़ा निकाल कर उन्हें देंगे. यह भविष्य वार्ता नरसावधानी को
श्रीपाद प्रभु के अंगूठे के स्पर्श से ज्ञात हुई थी.
श्रीपाद प्रभु का मुख अत्यंत सात्विक, सुन्दर और दैदीप्यमान था. उसकी किसी से तुलना ही नहीं हो सकती. श्रीपाद
प्रभु ने नरसावधानी को जो उपदेश दिया और उनके अनुग्रहों के उदाहरणों के बारे में
तुम्हें मैं कल बताऊँगा. चलो, अब हम उनका नाम स्मरण करते हुए
उनके भजन-कीर्तन में खो जाएँ. जिस स्थान पर उनका नाम स्मरण, भजन-कीर्तन होता
है, उस स्थान पर
श्रीपाद प्रभु सूक्ष्म रूप से संचार करते है, यह अक्षर सत्य है.
तिरुमलदास जैसे भक्त की सत्संगत से हम हर्षभरित, पुलकित हो गए.
“श्रीपाद श्रीवल्लभ की जय जयकार हो.”
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