शनिवार, 13 अगस्त 2022

अध्याय - ५३

 



।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।  

 

अध्याय – ५३


श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत का पीठिकापुरम् क्षेत्र में पहुँचने का विधान

ग्रन्थ की विशेषता


मेरे द्वारा लिखित “श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत “ ग्रन्थ कुछ दिनों तक श्रीपाद प्रभु के मामा के घर में था. इसके बाद इस संस्कृत ग्रन्थ का तेलुगु भाषा में अनुवाद किया गया. तेलुगु भाषा में अनुवाद होने के उपरांत मूल संस्कृत ग्रन्थ अदृश्य हो गया. गन्धर्वों ने उसे श्रीपाद प्रभु के जन्म स्थान पर ले जाकर ज़मीन के नीचे गहरे गाड़ कर रख दिया. उस ग्रन्थ का सिद्धयोग द्वारा पठन हो रहा है. मेरे द्वारा रचित चरित्रामृत श्रीपाद प्रभु की दिव्य चरण पादुकाओं के निकट रखकर मैंने उन्हें पढ़कर सुनाया. चरित्रामृत को सुनने के लिए आए पाँच भक्त उसका श्रवण करके धन्य हो गए.

मैं पंडित नहीं हूँ, अतः किस अध्याय को पढ़ने से क्या फल मिलेगा, यह कह नहीं सकता. श्री बापन्नाचार्युलु की तैंतीसवी पीढी के कालखंड में इस ग्रन्थ की तेलुगु प्रति उदित होही. जो भाग्यवान व्यक्ति इस ग्रन्थ को खोज निकालें, वे श्रीपाद प्रभु के जन्म स्थान पर जाकर वहाँ महासंस्थान के पवित्र परिसर में ग्रन्थ का पठन करके उसे श्रीपाद प्रभु के चरणों में अर्पित करें. इस ग्रन्थ का पठन होते समय पठन करने वाले भाग्यवान भक्त को गाणगापुर क्षेत्र से भेजा हुआ प्रसाद प्राप्त होगा. वह प्रसाद लाकर देने वाला व्यक्ति बापन्नाचार्युलु की तैंतीसवी पीढी से होगा. यह तेजोमय स्वरूप में दर्शन देने वाले श्रीपाद प्रभु का दिव्य वचन है.

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

।। हरिः ॐ तत्सत्।।

अध्याय - ५२

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।  

 

अध्याय – ५२

 

शंकर भट्ट का योगानुभव का निरूपण

श्रीपाद प्रभु के दिव्य दर्शन  

मैं लगातार तीन वर्षों तक हर रोज़ मध्यरात्री के समय श्रीपाद प्रभु के दिव्य तेजोमय दर्शनों का  लाभ प्राप्त करता रहा. मैंने योग की अनुभूतियाँ एक पुस्तक के रूप में लिखीं. वह पुस्तक हिमालय से एक योगी आकर ले गए. यह श्रीपाद प्रभु की ही इच्छा होगी, ऐसा मेरा विश्वास है. उनकी आज्ञा से ही यह घटित हुआ इसमें तिलमात्र भी संदेह नहीं.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

अध्याय - ५१

  

श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये


अध्याय – ५१

जलोदर से रक्षा – ग्रन्थ पारायण की महिमा


मैं कुरवपुर में ही था कि अश्विन कृष्ण द्वादशी का दिन आ पहुंचा. उस दिन हस्त नक्षत्र था. कृष्णा नदी में स्नान करने के पश्चात श्रीपाद प्रभु कुछ देर तक ध्यान मुद्रा में बैठे. ध्यान से बाहर आकर उन्होंने मुझे एक बार और स्नान करने के लिए कहा. उनकी आज्ञा के अनुसार मैंने एक बार फिर कृष्णा नदी में दुबकी लगाई और उनके पास आया. तब प्रभु बोले, “अरे, शंकर भट्ट ! मेरे गुप्त रूप से रहने का समय आ गया है. मैं कृष्णा नदी में अंतर्धान होकर इस कुरवपुर में गुप्त रूप से संचार करूंगा, पश्चात नृसिंह सरस्वती के नाम से सन्यासी रूप में धर्मोद्धार के लिए अवतार लूँगा.”

तू जिस ग्रन्थ की रचना कर रहा है, वह “श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत” महा पवित्र ग्रन्थ भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान लाभदायक होगा. वह ग्रन्थ “अक्षर सत्य” होगा. “दिगंबरा, दिगंबरा, श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा “ – मेरे इस मन्त्र का जयघोष सर्वत्र होगा. इस ग्रन्थ के पठन से संसार सुखी होगा. इहलोक एवँ परलोक में सौख्य की प्राप्ति होगी. इस ग्रन्थ का प्रत्येक शब्द वेद वाक्य के समान माना जाएगा. तू जो लिख रहा है, वह संस्कृत ग्रन्थ मेरे महासंस्थान के औदुम्बर वृक्ष के नीचे शब्द स्वरूप में हमेशा रहेगा. वहाँ से निकलने वाले दिव्य शब्द दर्शन हेतु आने वाले भक्तों को सुनाई देंगे. ह्रदय पूर्वक जो व्यक्ति मेरे दर्शनों के लिए तड़प रहे हैं, उन्हें मेरे दर्शन अवश्य होंगे. मैं अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता हूँ. तेरे इस संस्कृत ग्रन्थ का तेलुगु भाषा में अनुवाद किया जाएगा. वह अनुवाद बापन्नाचार्युलु की तैंतीसवी पीढी के वंशज द्वारा प्रकाश में आएगा. इस ग्रन्थ के अनेक भाषाओं में अनुवाद होंगे. इस पवित्र ग्रन्थ का पठन चाहे किसी भी भाषा में क्यों न किया जाये, दिव्य अनुभव की प्राप्ति होगी और पठन करने वाले भक्तों का सब कुछ शुभ मंगल होकर, उनकी सकल व्याधियों से रक्षा होगी.


भक्तों को श्रीपाद प्रभु का अभय वचन


श्रीपाद प्रभु ने शंकर भट्ट से आगे कहा, “तूने मेरी बहुत सेवा की है. तूने मुझे पिता के समान सन्मान देकर, मनःपूर्वक मेरी सेवा का व्रत अत्यंत श्रद्धा एवँ नियम पूर्वक निभाया है. मैं अपनी लकड़ी की चरण पादुकाएं तुझे भेंट स्वरूप दे रहा हूँ. मेरे न होने पर दु:खी मत होना. तू तीन वर्षों तक यहीं रहना. इन तीन वर्षों में मैं तुझे तेजोवलय रूप में दर्शन देता रहूँगा. साथ ही अनेक योग-रहस्यों के बारे में ज्ञान दूँगा.”


श्रीपाद प्रभु अंतर्धान हुए


“हे शंकर भट्ट! तीन वर्षों के पश्चात आने वाली अश्विन कृष्ण द्वादशी के दिन तेरे द्वारा रचित :श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत” ग्रन्थ मेरी चरण पादुकाओं के निकट रखना. उस दिन दर्शन हेते आने वाले सारे भक्त धन्य हो जायेंगे. सबको मेरा मंगलमय आशीर्वाद.”

इस प्रकार श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु ने बिदा ली और वे कृष्णा नदी में अंतर्धान हो गए. उनकी लकड़ी की चरण पादुकाएं लेकर मैंने ह्रदय से लगा लीं और माँ से बिछुड़े हुए बालक की भाँति फूट-फूटकर रोने लगा. श्रीपाद प्रभु पानी में दिखाई दे रहे हैं, अथवा नहीं, यह देखने के लिए मैंने फिर एक बार नदी में स्नान किया और बाहर आकर ध्यानस्थ हो गया.

तब मेरे मन:चक्षुओं को श्रीपाद प्रभु ने तेजोमय रूप में दर्शन दिए..

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

अध्याय - ५०

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।। 


अध्याय – ५० 


गुरू निंदा करने से दारिद्र्य प्राप्ति


एक वृद्ध ब्राह्मण पेट दर्द से पीड़ित था. वह श्रीपाद प्रभु के दर्शनों के लिए कुरुगड्डी आया. उसकी पीड़ा इतनी असह्य थी, कि उसे उन वेदनाओं को सहन करने की अपेक्षा आत्महत्या करना अधिक उचित लगता था.

नाम स्मरण महिमा

उस ब्राह्मण ने श्रीपाद प्रभु के दर्शन किये और अत्यंत दीन-हीन स्वर में प्रभु से अपनी पीड़ा दूर करने की विनती की. तब श्रीपाद प्रभु बोले, “अरे, ब्राह्मण! तूने पूर्व जन्म में अपनी कठोर वाणी से अनेक लोगों का दिल दुखाया है. अनेक लोगों को अपने ह्रदय भेदी कठोर शब्दों से घायल किया है. इस कर्म के फलस्वरूप तुझे इस जन्म में यह पेट दर्द की व्याधि लग गई है. इस कलियुग मे वाक् दोष से मुक्त होने का मानव के लिए केवल एक ही मार्ग है, और वह है – “नाम स्मरण”. ईश्वर के नाम स्मरण से वायु मंडल शुद्ध होता है. मैं कुरुगड्डी में नामस्मरण महायज्ञ का आयोजन करने वाला हूँ. इस “नाम” के साथ “श्रीकार” भी जोड़ने वाला हूँ. इसके फलस्वरूप परा, पश्यंती, मध्यमा, एवँ वैखरी – ये चारों वाणियाँ चिरस्थाई रूप से नियंत्रित हो जायेंगी. जो भक्त “दिगंबरा, दिगंबरा, श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा”, तथा “श्री दत्ता दिगंबरा” नाम-स्मरण मनःस्फूर्ति से करेंगे उन्हें मैं अत्यंत सुलभ रूप से प्राप्त होकर उनकी मनोकामना पूर्ण करूंगा.” उस व्याधिग्रस्त ब्राह्मण को श्रीपाद प्रभु ने तीन दिन एवँ तीन रात कुरुगड्डी में रहकर “दिगंबरा, दिगंबरा, श्रीपादवल्लभ दिगंबरा” नाम का जाप करने को कहा. श्री प्रभु के आदेशानुसार वह वृद्ध ब्राह्मण तीन दिन, तीन रात कुरुगड्डी में रहा एवँ उसने अत्यंत श्रद्धाभाव से जाप किया. उसके पेट का दर्द कम हो गया.

श्रीपाद प्रभु बोले, “वायु मंडल में आज भी पहले के ही समान वाक् जल भरा हुआ है. हमारे द्वारा उच्चारित प्रत्येक वाक्य प्रकृति में उपस्थित सत्व, रज, तम इन तीन गुणों से अथवा इनमें से एक अथवा दो गुणों से परिपूर्ण होता है. इस त्रिगुणात्मक सृष्टि का पञ्च महाभूतों पर प्रभाव पड़ता है. ये पञ्च महाभूत जब दूषित होते हैं, तो समूचा अंतरिक्ष दूषित हो जाता है. इसके फल स्वरूप मानव द्वारा पाप कर्म किये जाते हैं और वह दरिद्री हो जाता है. इस दारिद्र्य के कारण उसके हाथ से पुनः पापकर्म हो जाते हैं. इस पापकर्म के फलस्वरूप मन दूषित हो जाता है, उसके द्वारा दान, धर्म, लोक सेवा आदि सत्कर्म नहीं किये जाते, फलस्वरूप वह पुनः दरिद्री हो जाता है. यह दुष्ट चक्र निरंतर चलता रहता है.

 

त्रिकरण शुद्धि की आवश्यकता

मानव को दारिद्र्य एवँ पापकर्म से मुक्ति पाना हो तो उसे काया, वाचा, मनसा शुद्ध होना चाहिए. इसी को त्रिकरण शुद्धि कहते हैं. जो हमारे मन में है, उसी को वाणी प्रकट करे. मन में दुष्ट भाव हों, और वाणी मधुर हो, इस प्रकार का दोगलापन वांछनीय नहीं है. वाणी के ही समान आचरण भी पवित्र होना चाहिए. त्रिकरण शुद्धि प्राप्त मानव महान पद को प्राप्त होता है. मन में एक प्रकार का भाव हो, वाणी कुछ अन्य ही प्रकट करे एवँ इन दोनों से बिलकुल भिन्न आचरण करने वाले को दुरात्मा कहते हैं. इस कलियुग में ईश्वर ने जीवन सागर पार करने के अनेक मार्ग बताए हैं. इनमें सबसे सुलभप्राय साधन है “नाम-स्मरण”. नाम-स्मरण करने वाले साधक की वाणी मधुर होती है, नाम-स्मरण न करने वाले का मन भी अशुद्ध होता है. नाम-स्मरण के फलस्वरूप पवित्र कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त होती है.

 

कर्म विमोचन

एक बार क्षय रोग से ग्रस्त एक व्यक्ति कुरवपुर आया. उसे मधुमेह एवँ कुछ अन्य व्याधियां भी थीं. उसे देखते ही श्रीपाद प्रभु अत्यंत क्रोधित हो गए. वह व्यक्ति पूर्व जन्म में एक कुख्यात चोर था. उसने अनेक निरपराध लोगों की संपत्ति लूटकर उन्हें निर्धन बना दिया था.

एक उपवर कन्या के पिता ने उसके विवाह के लिए संपत्ति संचय करके रखी थी. उस दुष्ट चोर ने वह संपत्ति लूट ली,  फलस्वरूप उस कन्या का विवाह न हो सका. वर-दक्षिणा देने के लिए धन के न होने से उसे योग्य वर न मिल सका. अंत में एक वृद्ध वर-दक्षिणा के बिना विवाह के लिए तैयार हुआ. इस प्रस्ताव के कारण उस उपवर कन्या ने आत्महत्या कर ली. पूर्व जन्म के ऐसे पाप कर्मों के कारण वह क्षय रोग से ग्रस्त व्यक्ति अत्यंत दीन-हीन अवस्था में श्रीपाद प्रभु के पास आया और उसने अत्यंत करुणापूर्ण वाणी से प्रभु से प्रार्थना की कि उसे इस दुर्धर व्याधि से मुक्त करें. दयावन्त श्रीपाद प्रभु ने उसे पञ्चपहाड़ में स्थित गोशाला में सोने के लिए कहा. वहाँ मच्छर प्रचुर मात्रा में थे. प्यास लगने पर पीने के लिए पानी भी नहीं था. उस रात को उसने सपने में देखा कि एक राक्षस उसका गला दबाकर उसके प्राण ले रहा है. वह घबरा कर उठ बैठा. इधर-उधर देखने लगा और यह विश्वास करके कि वह स्वप्न ही था, वह पुनः सो गया. उसने फिर से एक सपना देखा. उसके सीने पर एक बड़ा पत्थर रखा था और उस पत्थर पर एक बलवान पहलवान बैठा था. इन दोनों स्वप्नों के कारण उसके कर्म फल का परिष्कार हो गया और वह अपनी क्षय रोग की एवँ अन्य व्याधियों से मुक्त होकर स्वस्थ्य हो गया. अनेक वर्षों से क्षय रोग से पीड़ित ऐसे व्यक्ति को श्रीपाद प्रभु ने सपने में दंड देकर कर्म विमुक्त कर दिया.

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो

अध्याय - ४९

 ।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय ४९


श्रीपाद प्रभु का कर्म विनाश के संबंध में विधान

तैतीस (३३) संख्या की विशेषता – कुरुगड्डी में

श्रीपाद प्रभु के कार्यक्रम


श्रीपाद प्रभु ने एक बार कहा, “शंकर भट्ट! हम जिसका अनुष्ठान करते हैं, वह अग्नि विद्या है. अग्नि उपासना करना श्रोत्रिय लक्षण है. तेरी अग्नि उपासना तो बुझी हुई अंगीठी पर खाना बनाने जैसी है. इस पर मैं प्रभु की जय जयकार करते हुए बोला, “महाराज, मेरे जीवन के उपरांत भी यह अंगीठी ऐसी ही रहने वाली है.” श्रीपाद प्रभु ने कहा, “तेरी बुझी हुई अंगीठी में स्वयँ की शक्ति नहीं है. मेरी योग शक्ति से उस अंगीठी पर बनाया गया भोजन प्रसाद स्वरूप होकर भक्तों के दैन्य. दुःख का हरण कर रहा है. यह अंगीठी और नौ वर्षों तक जलती रहेगी. इसलिए मैं तैंतीस (३३) वर्षों तक गुप्त स्वरूप में रहा. पश्चात तीन वर्ष तेज स्वरूप में रहकर श्रद्धालु भक्तों को ही दर्शन देता रहा. तब मैं तैंतीस वर्ष का था. योगियों के जीवन में तैंतीसवें वर्ष में अनेक परिवर्तन होते हैं. रूद्र गणों की संख्या तैंतीस करोड़ है.” श्रीपाद प्रभु ने आगे कहा, “हमारा अग्नियज्ञ इसके पश्चात भी चलता ही रहेगा. कर्म को स्थूल रूप प्रदान कर उसे दग्ध करने के प्रतीक स्वरूप अग्नि आराधना की जाती है. इससे भक्तों के कर्म स्थूल रूप ग्रहण करने से पहले सूक्ष्म-रूप में रहते हैं, इससे पूर्व कारण-रूप देह कारण-शरीर में स्थित होता है. इसलिए तैंतीस वर्ष हो जाने पर इस प्रकार की अग्निपूजा की आवश्यकता नहीं रहती. उस समय मेरे आश्रय में आने वालों के पाप-कर्म सूक्ष्म-शरीर में रहकर एवँ कारण-शरीर में रहकर योग अग्नि से दग्ध हो जाते हैं.

मेरे भक्त आकर अपना-अपना भोजन बना कर अपनी क्षुधा तृप्ति करेंगे. ऐसा तीन वर्षों तक चलता रहेगा. इसके पश्चात इस स्थूल रूप में अग्निपूजा करने की आवश्यकता न रहेगी. पृथ्वी यज्ञ का प्रारम्भ मैंने कर दिया है, वह यशस्वी रीति से चल रहा है. उसी प्रकार जल यज्ञ भी मैंने आरम्भ कर दिया है. वह भी धूमधाम से चल रहा है. अब अग्नि पूजा एवँ अग्नि यज्ञ का आरम्भ करना है. वह यज्ञ भी अद्वितीय होगा, इसमें कोई संदेह नहीं. समस्त जीव राशि में अग्नि स्वरूप मेरा ही है. सबका शुद्धिकरण मैं ही करता हूँ. सबका नाश करने वाला भी मैं ही हूँ. पंचतत्वों से संबंधित यज्ञ की जितनी जानकारी मुझे है, उतनी किसी को भी नहीं है.

एक दिन एक नवविवाहित जोड़ा श्रीपाद प्रभु के दर्शन के लिए आया. प्रभू ने उन्हें पंचदेव पहाड़ के दरबार में रहने की आज्ञा दी. उनके आदेशानुसार वे दोनों पति-पत्नी पंचदेव पहाड़ के दरबार में गए. परन्तु दो ही दिनों में वह युवक गतप्राण हो गया. उसकी अकस्मात् मृत्यु से वह नववधू बहुत भयभीत हो गई. वह बोली, “प्रभु अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनकी कृपा दृष्टी सब पर रहती है, ऐसा सुना था. परन्तु आज तो यह अघटित घटना हो गई.” वह शोक में विलाप करने लगी. उनके रिश्तेदार सूचना मिलते ही पंचदेव पहाड़ पर आए. उस मृत देह का दहन क्यों न किया जाए – यह प्रश्न सबके सम्मुख था.

श्रीपाद प्रभु की आज्ञा के बिना मृत देह दरबार से बाहर नहीं ले जाया जा सकता, ऐसा दरबार के सेवाधारी भक्त बोले. तभी श्रीपाद प्रभु दरबार में आये. शोक सागर में डूबी हुई उस नववधू ने श्रीपाद प्रभु को अपने दुर्भाग्य की कथा सुनाई. श्रीपाद प्रभु बोले, “ कर्म का फल भोगना अनिवार्य है. नववधू ने बड़े श्रद्धा भाव से कहा, “प्रभु! आपके लिए असंभव ऐसा इस विश्व में कुछ भी नहीं है. मेरा मांगल्य देकर मुझे इस भयंकर दुःख से उबारें.” उस नववधू को श्रीपाद प्रभु के करुणामय स्वभाव पर दृढ़ विश्वास  था.

मृतक को जीवन दान

श्रीपाद प्रभु ने कहा, “तेरा दृढ़ विश्वास ही फलदायक होगा. मुझ पर जो तेरी श्रद्धा है, उसके फलस्वरूप तेरा पति अवश्य ही जीवित हो जाएगा. कर्म सिद्धांत का व्यतिरेक न करते हुए तुझे एक उपाय बताता हूँ. तू अपने पति के वजन के बराबर लकडियाँ खरीद. इसके लिए अपना मंगलसूत्र बेच दे. उन लकड़ियों पर खाना बना. जैसे-जैसे चूल्हे में वे लकडियाँ जलेंगी, वैसे-वैसे तेरा अमंगल दग्ध हो जाएगा.” श्रीपाद प्रभ की आज्ञानुसार उस नववधू ने किया. सारी लकडियाँ जल जाने के बाद वह नवयुवक ऐसे उठ गया मानो नींद से जागा हो. अपने चारों और सभी रिश्तेदारों को देखकर उस नववधू के आनंद की सीमा न रही. सभी भक्तजनों ने हर्षोल्लास के साथ श्रीपाद प्रभु का जय जयकार किया.

 

दरिद्री ब्राह्मण पर श्रीपाद प्रभु की विशेष कृपा

एक बार एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण श्रीपाद प्रभु के दर्शन के लिए आया. वह अपनी परिस्थिति से इतना दुखी था कि श्रीपाद प्रभु की कृपादृष्टि प्राप्त न होने पर उसने आत्मह्त्या करने का निश्चय कर लिया था. श्रीपाद प्रभु उसके मन का भाव जान गए. उन्होंने अंगीठी से एक जलती हुई लकड़ी निकाल कर उससे ब्राह्मण की पीठ को स्पर्श किया. उस जलती हुई लकड़ी के कारण ब्राह्मण की पीठ जल गई और काफी देर तक उसे वेदनाएं होती रहीं. श्रीपाद प्रभु ने कहा, “अरे ब्राह्मण! तू आत्महत्या करने निकला था. यदि मैं तेरी उपेक्षा करता तो तू सचमुच में आत्महत्या कर लेता. उस आत्महत्या से संबंधित समस्त पाप कर्मों के स्पंदन इस जलती हुई लकड़ी के स्पर्श से नष्ट हो गए. अब तुझे दारिद्र्य से मुक्ति मिल जायेगी.” इतना कहकर श्रीपाद प्रभु ने वह ठंडी हो गई लकड़ी उस ब्राह्मण को दी और उसे अपने उत्तरीय में बांधकर संभाल कर घर ले जाने को कहा. प्रभु के आदेशानुसार ब्राह्मण उस लकड़ी को अपने उत्तरीय में बांधकर घर ले गया. घर पहुँच कर जैसे ही उत्तरीय खोलकर देखा तो वह लकड़ी सोने में परिवर्तित हो गई थी. इस प्रकार उस गरीब ब्राह्मण पर श्रीपाद प्रभु ने विशेष कृपा की थी.

श्रीपाद प्रभु ने अनेक भक्तों के पापों का अग्नि यज्ञ से दहन किया था. कभी वे भक्तों को बैंगन, भिन्डी, कद्दू आदि सब्जियां लाने को कहते. उन सब्जियों के रूप में भक्तों के पापकर्मों के स्पंदन आकर्षित कर लेते. इस प्रकार की सब्जियां पकाकर भक्तों को खिलाते. ऐसा करने से वे कर्म बंधन से मुक्त हो जाते.

एक बार एक उपवर कन्या श्रीपाद प्रभु के दर्शनों के लिए आई. उसकी शादी कहीं निश्चित नहीं हो रही थी. उसे मंगल का दोष होने के कारण प्रभु ने उसे कंद लाने के लिए कहा. उस कंद की सब्जी उस लड़की समेत उसके परिवार जनों को खाने के लिए कहा. ऐसा करने से कर्मबंधन से मुक्त होकर उसका एक सुयोग्य वर के साथ विवाह हो गया.

श्रीपाद प्रभु कुछ लोगों से गाय का घी लाकर उसे भोजन बनाने के लिए देने को कहते. किसी-किसी को गाय के घी का दिया भगवान के सामने जलाने को कहते. घर में यदि अत्यंत विकट परिस्थिति हो,   अथवा कन्या के विवाह में कठिनाई आ रही हो तो ऐसे भक्तों को श्रीपाद प्रभु हर शुक्रवार को राहुकाल में (प्रातः १०.३० से १२.०० तक) अंबिका माता की पूजा करने के लिए कहते.

एक बार श्रीपाद प्रभु का एक भक्त खूब बीमार हो गया. प्रभु ने उसके परिवार वालों से कहा, कि रोगी के कमरे में एरंडी के तेल का दिया निरंतर जलाएं और यह ध्यान रखें कि वह बुझने न पाए. ऐसा करने से वह भक्त शीघ्र ही रोगमुक्त हो गया.

एक भक्त की आर्थिक परिस्थिति अत्यंत विकट थी. उसे श्रीपाद प्रभु ने लगातार आठ दिनों तक गाय के घी का अखण्ड दीपक जलाने को कहा. ऐसा करने से उसके घर को लक्ष्मी जी का वरद हस्त प्राप्त हुआ.

 इस प्रकार की अनेक नई-नई विधियों द्वारा श्रीपाद प्रभु ने अपने भक्तों को पापकर्मों से मुक्त किया. इस सब के बारे में समझना सामान्य मानव के लिए असंभव है.       


।। श्रीपाद प्रभु की जय जयकार हो।।

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

अध्याय - ४८

 


श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये


अध्याय – ४८


श्रीपाद प्रभु का स्त्री-पुरुषों को संबोधन


श्रीपाद प्रभु प्रत्येक गुरूवार को पंचदेव पहाड़ पर सत्संग करते थे. श्रीपाद प्रभु कृष्णा नदी के पानी पर चलकर जाया करते. उनके पग जहाँ-जहाँ पड़ते वहाँ-वहाँ एक कमल विकसित हो जाता. उस कमल पुष्प पर श्रीपाद प्रभु के चरणों के चिह्न प्रकट हो जाते. यह कैसे होता था ये मानव की सीमित बुद्धि की समझ से परे की पहेली थी. इतना ही नहीं, पानी पर चलकर जाना भी एक अद्भुत् विषय था. कुछ दिनों तक देखने वालों को इस बात से आश्चर्य होता, परन्तु कालान्तर में लोग इसे श्रीपाद प्रभु की साधारण लीला समझने लगे. श्रीपाद प्रभु जब कृष्णा नदी से चलकर दूसरे किनारे तक पहुँचते, तो सारे भक्त गण उनका भव्य स्वागत करते. शाम तक सत्संग चलता रहता. फिर वे वापस कृष्णा नदी पर चलकर दूसरे किनारे पर जाते, तब भक्तगण बड़े श्रद्धाभाव से उनकी जय जयकार करते. रात के समय वे अकेले ही कुरुगड्डी में रहते थे. पंचदेव पहाड़ और कुरुगड्डी के मध्य में कृष्णा नदी का पात्र है.

हर शुक्रवार को वे विवाह योग्य कन्याओं को सौभाग्य का मंगल आशीर्वाद देते. महिलाओं को हल्दी की गाँठ देते. श्रीपाद प्रभु आयु में उनसे बड़ी महिलाओं को “अम्मा सुमति” अथवा “अम्मा अनुसूया तल्ली” कहकर संबोधित करते. आयु में छोटी महिलाओं को “अम्मा वासवी” अथवा “अम्मा राधा”, “अम्मा सुरेखा” कहकर बुलाते. उनसे बड़े पुरुषों को वे “अय्या” अथवा “नायना” कहकर बुलाते. आयु में उनसे छोटे लड़कों को “अरे अब्बी”, अथवा “बंगारू” कहकर पुकारते. अपने नानाजी की आयु के वृद्ध पुरुषों को “ताता “ कहते, तथा वृद्ध स्त्रियों को “अम्मम्मा” कहकर पुकारते.     

श्रीपाद प्रभु के नित्य कार्यक्रम एवँ सत्संग

गुरूवार एवँ शुक्रवार का सत्संग श्रीपाद प्रभु की इच्छानुसार कभी कुरुगड्डी में होता था अथवा कभी पंचदेव पहाड़ पर. इतवार के सत्संग में श्रीपाद प्रभु अत्यंत गहन योग विद्या के बारे में चर्चा करते. इसके पश्चात दर्शन हेतु आए हुए सभी भक्तों से उनका कुशल क्षेम पूछ कर उनकी कठिनाइयों का, प्रश्नों का बड़े प्रेमभाव से समाधान करते और उन्हें अभय वचन देते. सोमवार के सत्संग में पुराणों से ली गई कथाएँ सुनाते. उसके पश्चात भक्तों की समस्याओं का निराकरण करते. मंगलवार के सत्संग में उपनिषदों का बोध करवाते, तत्पश्चात भक्तों की व्यक्तिगत समस्याओं पर चर्चा कर उन्हें दूर करने का उपाय बतलाते. बुधवार को वेद एवँ वेदों का अर्थ बताया जाता. गुरूवार को गुरुतत्व का विवेचन होता. इसके पश्चात श्रीपाद प्रभु शान्ति से भक्तों की आधि-व्याधि के बारे में सुनकर उनके निराकरण का उपाय बताते. इस दिन विशेष भोजन बनता. सबको भरपेट स्वादिष्ट भोजन मिलता. इस भोजन की विशेषता यह होती कि श्रीपाद प्रभु स्वयँ पंगत में कोई न कोई पदार्थ परोसते. कुछ भाग्यशाली व्यक्तियों को अपने हाथ से ग्रास देते. श्रीपाद प्रभु के पास अनाज का अथवा धन का अभाव कभी भी नहीं होता था. शुक्रवार के सत्संग में वे श्रीविद्या के बारे में बोध कराते और सबको विधियुक्त ढंग से हल्दी की गाँठ का प्रसाद देते. शनिवार को शिवाराधना की महिमा पर प्रकाश डालते. श्रीपाद प्रभु के सत्संग का लाभ जिन्हें हुआ वे सचमुच ही धन्य हैं.

श्रीपाद प्रभु के भक्त साग-सब्जी, ज्वारी, रागी आदि अपने खेतों से लाते. भक्तों के लिए प्रतिदिन अन्नदान का आयोजन था, परन्तु गुरूवार के दिन विशेष भोजन बनता था. उस दिन अन्य पदार्थों के साथ-साथ एक मिष्ठान्न भी बनाया जाता, जिसे प्रसाद स्वरूप सारे भक्तों को दिया जाता था.

श्रीपाद प्रभु का ह्रदय मक्खन जैसा मुलायम था. उनसे भक्तों के दुःख देखे नहीं जाते. उनके सत्संग में आया हुआ दुखी श्रोता आनंद पूर्वक घर लौटता था. श्री दत्तात्रेय के दत्त पुराण का पाठ करने वाले भक्तों को तत्काल श्रीपाद प्रभु का अनुग्रह प्राप्त होता. ऐसी श्रीपाद प्रभु की यह माया कोटि-कोटि माताओं के वात्सल्य प्रेम से भी बढकर थी.

रात के समय किसी को भी कुरुगड्डी में रुकने की अनुमति न थी, परन्तु मेरे साथ आये हुए वृद्ध सन्यासी को श्रीपाद प्रभु ने वहाँ रुकने की अनुमति दी. मुझे भी श्रीपाद प्रभु ने रात को कुरुगड्डी में रुकने के लिए कहा. दूसरे दिन श्रीपाद प्रभु ने उस सन्यासी को काशी जाने का आदेश देते हुए कहा कि वह अपने अंतकाल तक वहीं रहे. भोजन हेतु प्रयुक्त बर्तन माँजना, भोजन बनाना, आने वाले भक्तों की सब प्रकार से व्यवस्था करना – ये मेरे काम थे. दरबार में कोइ भक्त चाहे किसी भी समय आये, उसे भोजन अवश्य मिलता था. जो भक्त अपने घर से भोजन करके आते, उन्हें भी प्रसाद स्वरूप भोजन करना ही पड़ता. यदि भोजन के लिए आये हुए भक्तों की संख्या अधिक होती और बनाया गया भोजन कम होता, तो श्रीपाद प्रभु अपने कमण्डलु से खाद्य पदार्थों पर जल छिड़कते. फिर सारे भक्तों के भोजन के पश्चात भी खाद्य पदार्थ शेष ही रहते. श्रीपाद प्रभु ने इस प्रकार की अनेक लीलाएँ कीं. रात के समय अनेक देवता विमान से कुरुगड्डी आते और श्रीपाद प्रभु की सेवा करते. सुबह होते ही श्रीपाद प्रभु का आशीर्वाद लेकर स्वस्थान को लौट जाते. कभी-कभी हिमालय से कुछ योगीजन आते. वे भी कृष्णा नदी के जल पर चलते हुए आते. उनके शरीर अत्यंत कान्तिमान एवँ दैदीप्यमान होते थे. इन योगियों को श्रीपाद प्रभु स्वयँ भोजन परोसते.

श्रीपाद प्रभु का भोजन केवल मुट्ठीभर ही होता था. चाहे वह मोरधन हो, या ज्वारी का भात हो या रागी की संकटी हो. भक्तों का पेट भरने से ही उन्हें अपना पेट भरने की तृप्ति प्राप्त होती थी.

रविदास नामक एक रजक था. उसे श्रीपाद प्रभु के वस्त्र धोने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. परन्तु श्रीपाद प्रभु के दर्शन के पश्चात भी बुरी प्रवृत्तियाँ उसे कष्ट पहुंचाती थीं. उनके निवारण के लिए उसने श्रीपाद प्रभु के चरणों में आश्रय लिया. श्रीपाद प्रभु कहा करते कि “पितरों का विधियुक्त श्राद्ध करने से उन्हें शान्ति प्राप्त होकर मुक्ति मिलती है. अष्टादश वर्णों के सभी लोगों को अपने-अपने धर्म-कर्म के अनुसार फल भोगना पड़ता है. इसमें किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होता. आज जो सुसन्धि प्राप्त हुई है, वह हमेशा मिलती रहेगी, ऐसा संभव नहीं है. मेरे अगले अवतार में मुझे थोड़ा कठिन प्रवर्तन करना होगा.”

अनेक जन्मों के पुण्यों के फलस्वरूप ही श्रीपाद प्रभु के दर्शन का लाभ होता है. ऐसी संधि का पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिए. इस संधि का उपयोग न करने से अनेक जन्मों तक सद्गुरू के दर्शन होना कठिन है. इस विशाल प्रपंच में, जिस युग में एक लाख पच्चीस हज़ार महासिद्ध पुरुषों में उनके अंशमात्र में विद्यमान भक्त को उनका आश्रय एवँ अनुग्रह प्राप्त होता है, और उसीके माध्यम से इस सृष्टि को इन भक्तों का ही आधार प्राप्त होता है. श्रीपाद प्रभु के केवल संकल्प मात्र से सृष्टि का निर्माण, स्थिति एवँ विनाश होता रहता है.

जब भक्तजन अपने गुरू को श्रद्धाभाव से प्रणाम करते हैं, तब गुरू उस प्रणाम को अपने गुरू तक पहुँचाते हैं. इस प्रकार हमारे द्वारा अपने गुरू के चरणों में किया गया प्रणाम अनेक गुरुओं तक पहुंचता है. यदि ईश्वर हम पर क्रोधित भी हो जाएँ, फिर भी गुरू उस क्रोध से हमारी रक्षा करते हैं. प्रत्येक शिष्य को गुरू का आशीर्वाद प्राप्त होता है. गुरू की आराधना से इहलोक एवँ परलोक, दोनों की प्राप्ति होती है. श्रीपाद प्रभु के सारे शिष्य सात्विक भाव वाले थे.

 

ह्रदय में ईश्वर का नामस्मरण करते हुए कर्म का आचरण

कुरुगड्डी की विशेष महिमा नित्य क्षेत्र के समान है. यहाँ स्थित देवता जागृत स्वरूप में हैं. इस क्षेत्र में अनेक देवता, महर्षि, महापुरुष वेष बदलकर गुप्त रूप में आकर रहते हैं. यहाँ उनका अपना-अपना स्थान निश्चित है. ह्रदय में ईश्वर का नाम भरकर सदाचरण करते हुए विहित कर्म करते रहो, ऐसा श्रीपाद प्रभु अपने भक्तों से कहा करते थे. यदि हर व्यक्ति अपने-अपने धर्म के अनुसार आचरण करे, फलस्वरूप पूर्व जन्म के पापों का क्षय करे, पश्चात पुण्य कर्म करते हुए उसका श्रेय स्वयँ को न दे, तो उसे पुण्य कर्म का शुभ फल प्राप्त होता है. श्रीपाद प्रभु के इस दिव्य वचन का पालन करने से हमारी जीवन नौका इस भवसागर को सुलभता से पार करेगी.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

अध्याय - ४७

 


।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।। 


अध्याय – ४७


पीठिकापुरम् से पंचदेव पहाड़ ग्राम तक श्रीपाद प्रभु के माता-पिता , नाना-नानी एवँ भक्तगणों का विचित्र प्रयाण

श्रीपाद प्रभु के दरबार में सबको यथेच्छा भोजन मिलता था. अन्नपात्र से चाहे जितना भी अन्न निकालो, उसमें से भोजन कभी समाप्त ही न होता था. यह बड़ा दिव्य आश्चर्य था. सभी प्राणियों के भरपेट भोजन के पश्चात जलचरों को भी यह प्रसाद प्राप्त हो, इस उद्देश्य से भोजनपात्र में बचा हुआ अन्न कृष्णा नदी में छोड़ दिया जाता था.

श्रीपाद प्रभु ने बापन्नाचार्युलु से कहा, “नाना जी, आपने श्री शैल्य पर सावित्री काटक यज्ञ संपन्न करके सूर्य मंडल का तेज शक्तिपात द्वारा आकर्षित किया था. साथ ही, भारद्वाज मुनि ने भी अत्यंत आर्त भाव से प्रार्थना की थी कि मैं अवतार लूँ. उन्हें दिए हुए वचन का पालन करने के लिए मैंने अवतार धारण किया है. ब्रह्म स्वरूप को शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता. मन में भी उसकी कल्पना नहीं की जा सकती.  उस ब्रह्मस्वरूप को केवल दत्तात्रेय प्रभु ही जान सकते हैं. अतः हम उन्हीं के नाम का जयघोष करें. मैं देश एवँ काल पर विजय प्राप्त कर सकता हूँ. मेरी इच्छा के विरुद्ध कुछ हो ही नहीं सकता. मेरी आवश्यकता के अनुसार मैं मेरे मतों-विचारों का आपके मतों-विचारों से तादात्म्य स्थापित कर सकता हूँ. अंतरिक्ष के सभी तारे तथा ग्रह मेरे हाथों के खिलौने हैं. मैंने आपकी हर इच्छा-आकांक्षा पूरी की है. नाना जी, पहले आप जब लाभाद महर्षि, नन्द, भास्कराचार्य थे, तब हर बार मैंने आप पर अनुग्रह किया, अब बापन्नाचार्युलु के रूप में आये हैं, और मैं श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में भाव विभोर होकर आया हूँ. इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात ही नहीं है.”

इसके उपरांत वेंकटप्पा श्रेष्ठी बोले, “हे सोन्या, हे कृष्णा, तुम्हें तो सब कुछ बड़ा आसान लगता है. परन्तु हमें वह असाधारण एवँ रोमांचकारी प्रतीत होता है.”

श्रीपाद प्रभु ने उत्तर दिया, “दादा जी, मैं पूर्ण प्रज्ञ हूँ और प्रत्येक प्राणी को उसके धर्म कर्म के अनुसार फल देता हूँ. मुझसे निकली हुई सूक्ष्मतम किरण भी पृथ्वी सहन नहीं कर सकती. थोड़ी सी कुण्डलिनी जागृत करूँ तो भी आप उसे सहन नहीं कर सकते. इसलिए मैं अपनी ही माया के भीतर अपने आपको सुरक्षित रखता हूँ. आवश्यकता होने पर ही मैं असाधारण कार्य कर सकता हूँ. ऐसा कोई भी वरदान नहीं है, जिसमें मेरी माया न हो. ऐसा कोई भी कार्य नहीं है, जो मैं नहीं कर सकता. आप सबको पीठिकापुरम् से पंचदेवपहाड़ ग्राम तक इतने अल्प समय में लाने का उद्देश्य यही था कि आपको ज्ञात हो जाए कि मैं दत्त प्रभु ही हूँ.”

नरसिंह वर्मा ने कहा, “सब प्राणियों की रक्षा करने वाले एकमेव क्षत्रिय तुम ही हो. बाकी सारे तो नाम मात्र के क्षत्रिय हैं.”  इस पर श्रीपाद प्रभु ने कहा, “ क्षत्रियत्व मेरा चिर स्वभाव ही है. शिवाजी महाराज के नाम से महाराष्ट्र में अवतार लेकर सनातन धर्म की रक्षा करूँ, ऐसी ईश्वरी इच्छा थी. इस इच्छा के अनुसार शिवाजी राजा का अवतार धारण करके महाराष्ट्र में हिन्दवी राज्य की प्रतिष्ठापना करूंगा.”

इस पर नरसिंह वर्मा ने कहा, “सार्वभौम श्रीपाद प्रभु की जय जयकार हो!”

श्रीपाद प्रभु की नानी बोली, “अरे बेटा! तुम्हारे विवाह का समारोह देखने के लिए हमारे नेत्र आतुर हैं. तुम्हारी शादी धूमधाम से होते हुए और तुम्हें भाल पर तिलक लगाए, माथे पर मोती-माला बांधे, सब       श्रृंगारों से सुसज्जित दूल्हे के रूप में हम देखना चाहते हैं.” श्रीपाद प्रभु ने कहा, “नानी! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी. मैं शंबल ग्राम में कल्की अवतार में जन्म लूँगा. उस अवतार में पद्मावती नामक अनघालक्ष्मी से विवाह करूंगा. परन्तु इसके लिए कुछ समय की आवश्यकता है. परन्तु आपकी इच्छा मैं अवश्य पूरी करूंगा.”

वेंकट सुब्बम्मा श्रीपाद प्रभु से बोलीं, “हे कान्हा! मेरे हाथ से तुझे दूध, दही, मलाई, मक्खन खिलाए बहुत दिन हो गए. अपने हाथों से तुम्हें खिलाने की तीव्र इच्छा है.”

 

मायानाटक सूत्रधारी श्रीपाद प्रभु एवँ उनका लीला विनोद

श्रीपाद प्रभु बोले, “नानी, तुम अवश्य खिलाओ. मुझे अपने हाथों से खाने में उकताहट होती है. तुम लोग पीठिकापुरम् से आते हुए दूध, दही, मक्खन लाओगे, यह मुझे ज्ञात हो गया था, परन्तु इतनी दूर की यात्रा में वह खराब न हो जाए, अतः आपके वात्सल्य प्रेम से बंधे हुए, मैंने ऐसी लीला की कि वह सब, जैसा था वैसा, अच्छा ही रहे. नानी, इसके लिए मैंने कितना कष्ट उठाया, क्या बताऊँ! इतनी दूर से अठारह घोड़ागाडियों को पंचदेव पहाड़ तक लाना क्या आसान बात है? मेरा पूरा शरीर दर्द कर रहा है. देखो, मेरे हाथों पर कितने बल पड़ गए हैं.” वास्तव में श्रीपाद प्रभु की हथेलियों पर फोड़े हो गए थे, वेंकट सुब्बम्मा ने अत्यंत मृदु भाव से श्रीपाद प्रभु की हथेलियों पर मक्खन लगाया, और उनके शरीर को गर्म जल से सेंका. सचमुच, माया नाटक सूत्रधारी श्रीपाद प्रभु की लीलाएँ अगम्य थीं.

राजमांबा ने कहा, “हे कृष्णा, तेरी पसंद का हलवा बनाकर चांदी के पात्र में रखकर लाई हूँ. तू मेरे पास आ जा, तुझे खिलाती हूँ.” श्रीपाद प्रभु की तीनों नानी-दादियों ने मिलकर उन्हें वह मधुर हलवा खिलाया, परन्तु उस पात्र का हलवा समाप्त ही नहीं हो रहा था. श्रीपाद प्रभु बड़ी देर तक यह लीला दिखाते रहे. वे नानी से बोले, “आप तीनों के मन में मेरे प्रति अत्यंत प्रेम भाव है. तीनों ने मिलकर मुझ अकेले को ही यदि हलवा खिलाया तो क्या मुझे तकलीफ नहीं होगी?” इसके पश्चात श्रीपाद प्रभु ने अपने हाथों से वह हलवा अपने भाईयों को, बहनों को, जीजाओं को खिलाया. वहाँ आये हुए भाविकों के बीच वेंकय्या नामक एक किसान था. उसे प्रभु ने दीक्षा दी एवँ अपने हाथों से हलवा दिया. बचा हुआ हलवा गाडीवानों एवँ घोड़ों को देने को कहा. चांदी का वह पात्र वेंकय्या को भेंट स्वरूप दिया.

अप्पल राजू शर्मा बोले, “बेटा, तू दत्त प्रभु है, यह समझ न पाने के कारण हमारे हाथों से अनजाने में हुए अपराधों को क्षमा कर.” 

श्रीपाद प्रभु बोले, “तात! आप मेरे पिता हैं. क्या पुत्र पिता को क्षमा करे, ऐसा होता है? आप मुझे पहले ही की भाँति अपना बेटा समझ कर मुझ पर सदा वात्सल्यामृत का सिंचन करें. साथ ही मेरे अभ्युदय की कामना भी करें!”

इस समय श्री वेंकटावधानी एवँ उनकी पत्नी के नेत्रों से अश्रुध्रारा बह रही थी. श्रीपाद प्रभु ने उनसे कहा, “मामा, हमारा संबंध शाश्वत स्वरूप का है. मैं केवल आप ही का नहीं, अपितु आपके वंश में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति का दामाद हूँ. अपनी दिव्य लीलाओं से मैं आपको सुख देता रहूँगा. कल्की अवतार के समय पद्मावती देवी को वधू के रूप में स्वीकार करके आपकी मनोकामना पूरी करूंगा. सुमती महाराणी का दुःख दूर करूंगा. अपने लाडले पुत्र को अन्य सभी पुत्रों के समान दूल्हे के रूप में देखने के स्थान पर वैराग्य ग्रहण किये हुए एक यति के रूप में देखकर वह दुखी हो गई है.”

श्रीपाद प्रभु माता की ओर देखकर बोले, “माँ! तुममें और अनुसूया माता में मुझे कोई अंतर नहीं दिखाई देता. तुम दोनों की मनोकामना मैं कल्की-अवतार में अवश्य पूरी करूंगा.”

श्रीपाद प्रभु आगे बोले, “माँ, तुम्हारे गर्भ से जन्म लेकर मैं कितना महान हो गया हूँ. तुम्हारे वात्सल्यामृत से ही मेरा पालन-पोषण हुआ है. मेरी बहन वासवी ने कितना महान कार्य किया, यह जानती हो ना? जब मुझे भूख लगी थी, तब मुझे एक छोटे शिशु के रूप में परिवर्तित करके अनुसूया माता के पास  दुग्धपान के लिए भेज दिया.”

वेंकय्या ने कहा, “ हे महागुरू! आपके चरणों में एक नम्र प्रार्थना है. आपने जो असंख्य लीलाएँ इस दरबार में की हैं, वह दरबार एवँ उसके आसपास का परिसर विश्व में विख्यात हो जाए.” श्रीपाद प्रभु बोले, “भविष्य में मेरा दरबार एक पक्की इमारत में परिवर्तित होगा. इसमें गोधन भी होगा. वहाँ मेरी कितनी सारी लीलाएँ प्रदर्शित होंगी. मेरे नेत्रों को भविष्य काल का यह अनुभव दिखाई दे रहा है.”

वहाँ एकत्रित सभी भाविक भक्तों को गहरी निद्रा आ गई और कुछ ही क्षणों में मैं, वह सन्यासी, श्रीपाद प्रभु एवँ उनका पूरा दरबार – सभी अदृश्य हो गए. उस सबका क्या हुआ होगा, यह चिंता मुझे सताने लगी. मेरे मन में यह शंका उत्पन्न हुई कि कहीं यह राक्षसी माया तो नहीं? इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “मेरे निकट कोई भी राक्षसी माया चल ही नहीं सकती. मैंने उन सबको सुरक्षित रूप से पीठिकापुरम् पहुँचा दिया है. यह एक महान अनुभूति थी. जो मुझे जिस भाव से भजता है, उसी भाव से मैं उसकी रक्षा करता हूँ. यह मेरा व्रत है. ”

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो.

Complete Charitramrut

                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...