मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

अध्याय - १०

 

 



।। श्रीपाद राजम् शरणं प्रपद्ये।।

 

अध्याय – 10


नरसिंह मूर्ति का वर्णन


तिरुमलदास की आज्ञा लेकर मैंने कुरवपुर की दिशा में प्रस्थान किया. श्रीपाद स्वामी की लीलाओं के स्मरण से मन रोमांचित हो उठता था. कुछ दूर जाने के बाद मुझे एक अश्वत्थ वृक्ष दिखाई दिया. दोपहर हो चुकी थी. मैं भूख से व्याकुल हो रहा था. यदि आसपास ब्राह्मणों के घर हों. तो वहाँ भिक्षान्न सेवन करके विश्राम करने के लिए इस पवित्र अश्वत्थ वृक्ष की छाया में आ जाऊँगा, ऐसा विचार मन में लिए मैं चल पड़ा. मैंने देखा कि उस वृक्ष की छाया में कोई विश्राम कर रहा है. निकट जाकर देखा कि उस व्यक्ति ने यज्ञोपवीत धारण किया है.

जब मैं अश्वत्थ वृक्ष के निकट पहुँचा तो उस व्यक्ति ने आदरपूर्वक मुझे बैठने के लिए कहा. उनके नेत्रों में अथाह करुणा थी. उनके सामने एक झोली थी, उसमें कोई भी खाद्य पदार्थ न था, बस एक ताम्र पात्र था. वे निरंतर श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का नाम स्मरण कर रहे थे. मैंने उनसे पूछा, “महाशय! आप क्या श्रीपाद स्वामी के दिव्य चरणों के आश्रित हैं? क्या आपने उनके दर्शन किये हैं?

वे बोले, “मेरा जन्म एक भले वैश्य कुल में हुआ है और मेरा नाम सुब्बय्या श्रेष्ठी है. हमारा वंश ग्रंथी कहलाता है. पूर्वजों के समय से ही हमारे यहाँ सद्ग्रंथों का पठन-पाठन होता आ रहा है. इसलिए हमारे वंश का नाम “ग्रंथी” पड़ गया. बचपन में ही मेरे माता-पिता का निधन हो गया. मेरा घर धन-धान्य से समृद्ध है. मैं दूर-दूर के देशों में जाकर व्यापार करता हूँ. इस सन्दर्भ में कई बार कांचीपुरम जा चुका हूँ. वहाँ चिंतामणी नामक वैश्या से परिचय हुआ. उस पर मैंने बहुत धन लुटाया. मल्याल (केरल) देश के पालक्काड नामक प्रांत से बिल्वमंगल नामक ब्राह्मण भी व्यापार के लिए कांचीपुरम आया करता था. वह अरबी नागरिकों को सुगंधी द्रव्य बेचकर उनसे रत्न एवँ घोड़े खरीदता था. कभी-कभी हम दोनों मिलकर व्यापार करते. दुर्भाग्यवश हम दोनों वैश्या की संगत में भ्रष्ठ हो गए थे. कुछ समय तक तो अरबों के साथ हमारा व्यापार अच्छा चला, उसके बाद अरबों ने हमें धोखा दिया. ऊँची जाति के घोड़ों की कीमत लेकर निम्न जाति के घोड़े हमें बेचे, जिससे हमें बहुत हानि हुई. कई राजा-महाराज हमसे ऊँची जाति के घोड़े खरीदा करते थे. व्यापार में नुक्सान होने के कारण हमारी संपत्ति नष्ट हो गई. मेरी पत्नी इस दुख में परलोक सिधार गई. मेरा एक पुत्र था जो मंदबुद्धि था. उसका भी अल्पायु में निधन हो गया. भाई! समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ एवँ विख्यात पाद-गया क्षेत्र में स्थित पीठिकापुर मेरा जन्म स्थान है. हम वहीं के हैं. जब मैं अज्ञानी था, तो देवताओं एवँ ब्राह्मणों का अनिष्ट किया करता था. क़र्ज़ की वसूली निर्दयता से किया करता था. श्रीपाद स्वामी के पिता श्री अप्पलराजू के घर आईनविल्ली से उनके रिश्तेदार मिलने के लिए आये. उन सबके भोजनादि की व्यवस्था करने के लिए अप्पल राजू के पास पर्याप्त धन नहीं था. वे दान नहीं स्वीकारते थे. श्री वेंकटप्पय्या के घर से प्राप्त भिक्षा से उदार निर्वाह एवँ अन्य व्यवहार किया करते थे. श्रेष्ठी के कुल-पुरोहित होने के कारण वे भिक्षा के रूप में धन स्वीकार नहीं करते थे.

एक दिन मजबूरी में उन्होंने एक वराह मूल्य की सामग्री हमारी दुकान से उधार ली. मैंने अप्पल राजू को ताकीद दी थी कि रिश्तेदारों के जाते ही मेरी रकम लौटा दें. ‘मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है, मगर जब मुझे धन प्राप्त होगा तब मैं अवश्य लौटा दूँगा.’ ऐसा अप्पल राजू बोले. मैं चक्रब्याज वसूलने में उस्ताद था. समय बीत रहा था. ब्याज पर ब्याज लगाकर, झूठा हिसाब दिखाकर, मैंने अप्पल राजू को सूचना भेजी कि उन्हें मुझे दस वराह लौटाने हैं. इतना धन लौटाने में अप्पल राजू को अपना घर बेचना पड़ता. उस समय के मूल्य के हिसाब से यदि मैं वह घर खरीदता तो अप्पल राजू और १-२ वराह देकर ऋणमुक्त हो जाते, ऐसा मैंने कई लोगों से कहा था. अप्पल राजू को बेघर करना ही मेरा उद्देश्य था. मेरे इस दुष्ट विचार को भांप कर वेंकटप्पय्या ने मेरी भर्त्सना की, “अरे दुरात्मा! धन के मद में तू मनमानी कर रहा है. हमारे कुल-पुरोहित का अपमान हमारा ही अपमान हुआ. तू अपना बर्ताव सुधार, वरना तुझ पर घोर विपदा आएगी. अग्निहोत्र से भी अधिक पवित्र अप्पल राजू शर्मा को तू जो कष्ट पहुंचा रहा है, उसके बदले में रौरवादि नरक को प्राप्त होगा.”

एक बार, जब बालक श्रीपाद श्रेष्ठी के घर में थे, तब मैंने श्रेष्ठी से व्यंग्यपूर्वक कहा, “यदि अप्पल राजू शर्मा मेरा ऋण चुकाने में असमर्थ हैं, तो वे अपने पुत्रों में से किसी एक पुत्र को मेरी दुकान पर नौकरी करने के लिए भेजें, अथवा वे स्वयं मेरे यहाँ नौकरी करें. एक पुत्र तो अंधा है, दूसरा है पंगु और तीसरा, यह श्रीपाद, यह तो केवल तीन वर्ष का है. मेरा ऋण कैसे उतारेंगे भला?” यह सुनकर श्रेष्ठी के मन को बड़ी ठेस पहूँची. उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली. बालक श्रीपाद ने अपने दिव्य हस्त से उनके आँसू पोंछते हुए कहा, “दादा जी! मेरे होते हुए भय किस बात का? हिरण्याक्ष एवँ हिरण्यकश्यप का वध मैंने ही किया, तो सुब्बय्या के ऋण को चुकाने में मुझे कठिनाई कैसी?” इतना कहकर मेरी और मुड़कर बोले, “ अरे! तेरा ऋण मैं चुकाऊंगा. चल तेरी दुकान में. तेरी दुकान में चाकरी कर के ऋण चुकाऊंगा. मगर तेरा ऋण उतर जाने पर तेरे घर में लक्ष्मी नहीं रहेगी. सोच ले.”

बालक श्रीपाद को लेकर वेंकटप्पय्या सुब्बय्या की दुकान में आये. वे सुब्बय्या से बोले, “बालक श्रीपाद के बदले मैं तुम्हारी दुकान में चाकरी करूंगा. कोई आपत्त्ति तो नहीं है? सुब्बय्या ने इनकार करते हुए गर्दन हिला दी. तभी दूकान में एक जटाधारी आया. वह सुब्बय्या श्रेष्ठी की दूकान ढूंढ रहा था. उसे एक ताँबे का बर्तन खरीदना था. वह श्रेष्ठी से बोला, “मुझे एक ताँबे के बर्तन की बड़ी आवश्यकता है. मूल्य यदि अधिक हो तो भी कोई बात नहीं, सुब्बय्या की दूकान में ताँबे के बत्तीस पात्र थे, परन्तु उसने जटाधारी से झूठ कहा, “मेरे पास ताँबे का केवल एक ही पात्र है. यदि उसके लिए दस वराह दे सकते हो तो वह तुम्हें मिल जाएगा.” वह सन्यासी तुरंत तैयार हो गया. उसकी बस एक ही शर्त थी कि वह पात्र वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी की गोद में बैठे बालक श्रीपाद अपने हाथों से उसे दें. शर्त के अनुसार बालक श्रीपाद ने अपने हाथ से वह पात्र सन्यासी को दिया. पात्र देते हुए श्रीपाद प्रभु हँस रहे थे. वे बोले, “अरे, अब तेरी इच्छा पूरी हो गई है ना? तेरे घर में लक्ष्मी सदा बनी रहेगी. अब अपनी संन्यास दीक्षा छोड़कर घर जाओ! तेरी पत्नी एवँ बच्चे तेरी राह देख रहे हैं.” वह जटाधारी सन्यासी खुशी-खुशी चला गया.

वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी एवँ अप्पल राजू शर्मा का अपमान करने की सुब्बय्या की इच्छा थी. वह पूरी होने से उसके मन में थोड़ा अहंकार निर्माण हो गया था. उसी मद में उसने कहा, “आज की बिक्री से मुझे विशेष धन लाभ हुआ है. मुझे ऐसा लगा मानो अप्पलराजू शर्मा के दस वराहों का ऋण उतर गया है. इसी क्षण श्रीपाद राय ऋणमुक्त हो गए.” वेंकटप्पय्या बोले, “यह जो कुछ भी तुम कह रहे हो, वह गायत्री को साक्षी मानकर कहो.” सुब्बय्या ने ऐसा ही किया.

श्रीपाद प्रभु तथा वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी जब चले गए तो सुब्बय्या ने अन्दर जाकर देखा कि इकतीस पात्रों में से केवल एक ही ताँबे का पात्र बचा था. श्रीपाद प्रभु की लीलाएँ अनाकलनीय, अद्भुत् है. उनके सम्मुख जो भी वचन बोले जाते हैं, वे सत्य होते थे.

साक्षात दत्त प्रभु के हाथों से ताँबे का पात्र ग्रहण करने वाला वह सन्यासी कितना भाग्यवान था और सुब्बय्या कितना अभागा था! उसका दस वराहों का ऋण तो श्रीपाद प्रभु ने अपनी लीला से चुका दिया, परन्तु उसी क्षण से उसके घर की धन संपत्ति क्षीण होने लगी. इकतीस पात्रों के स्थान पर केवल एक ही पात्र शेष बचा था. सुब्बय्या ने अप्पल राजू से दस वराह प्राप्त करना है, ऐसा झूठा हिसाब दिखाया था. उस पाप का फल उसे इस प्रकार से प्राप्त हुआ था.

शंकर भट्ट ने कहा, “अरे सुब्बय्या! सूर्योदय के पूर्व एवँ सूर्यास्त के पूर्व का समय अत्यंत पवित्र होता है.  प्रातः-संध्या एवँ सायं-संध्या के समय अग्निहोत्र करना विशेष फलदायी होता है. प्रातः काल के समय सूर्य भगवान सभी शक्तियों के स्त्रोतों से सिद्ध होते हैं. सायंकाल के समय वे ही शक्तियां पुनः सूर्य में विलीन हो जाती हैं.

इस पर सुब्बय्या बोला, “महाराज! दान स्वीकारने से पुण्य कम होता है, ऐसा मैंने सुना है. परन्तु उसे न स्वीकारने से भी पाप लगता है, ऐसा आप से सुना था. इन दोनों कथनों का अर्थ समझ नहीं पा रहा हूँ. उसी प्रकार यह भी समझ नहीं पाता हूँ कि श्रीपाद स्वामी को श्री दत्तात्रेय का अवतार कहा जाता है, वहीं नरसिंह स्वामी को शिव का अवतार कहते हैं. शिव में अनुसूया का तत्व किस प्रकार अनुभूत है? कृपया यह बातें मुझे विस्तार से समझाएं.”

परन्तु इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले सबको भूख लगाने के कारण पहले भोजन करने की सोची. आश्चर्य की बात यह थी कि उस छोटे से स्थान पर एक ताँबे के पात्र के सिवा कुछ भी नहीं था. सुब्बय्या दो केले के पत्ते लाया. शंकर भट्ट नदी पर जाकर शुचिर्भूत होकर आये.  खाने में चावल और तुरई की दाल थी. केले के पत्तों पर पलाश के पत्तों के दोने रखे. उस जटाधारी सन्यासी ने आंखें मूँद कर क्षणभर ईश्वर का ध्यान किया और निकट ही पड़े ताँबे के पात्र से दोनों में पानी डाला. फिर उसी पात्र से स्वादिष्ट तुरई की दाल परोसी, तत्पश्चात चावल परोसा. उस अमृतमय भोजन के सेवन से हम तृप्त हो गए. खाली पात्र से पहले पानी, फिर भोजन का निकलना एक दैवी चमत्कार ही था. भोजन के पश्चात वह पात्र खाली ही रहा.

 

शनिवार प्रदोष काल में की गई शिवार्चना का फल

श्रीपाद स्वामी सकल देवताओं के स्वरूप हैं. श्री शनिदेव कर्मकारक हैं. नवग्रहों में जो छायाग्रह – राहू एवँ केतु – हैं, उनमें से राहू शनि के कारण फल देता है. केतु मंगल के कारण फल देता है. कर्मकारक शनि कर्म-साक्षी सूर्य का पुत्र होने के कारण शनिवार की शाम शक्तिमान होती है. चतुर्थी एवँ त्रयोदशी को राहू बलवान होता है. शनि त्रयोदशी के महापर्व काल में शाम को शिव की आराधना करने से मानव द्वारा पूर्वजन्म में किये गए पाप नष्ट होते हैं. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का अवतार मंगल ग्रह के चित्रा नक्षत्र पर हुआ है, अतः इस नक्षत्र पर श्रीपाद प्रभु की पूजा-अर्चना करने से सभी ग्रहों के दोषों का शमन होता है. युद्ध, आपदा, अस्त्र-शस्त्रों के कारण अकाल मृत्यु, ऋणग्रस्त होने पर आने वाले संकटों का कारण मंगल ग्रह होता है. चित्रा नक्षत्र पर अथवा मंगलवार को श्रीपाद स्वामी अरुण वर्ण के समान प्रकाशमान होते हैं. ऋण अर्थात् पाप, अऋण से तात्पर्य है पाप रहित होना. उस दिन श्रीपाद प्रभु साक्षात अरुणाचलेश्वर के रूप में विद्यमान होते है. वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी, नरसिंह वर्मा तथा बापन्नार्य शनिप्रदोष की शाम को शिवाराधना किया करते थे. उस दिन अप्पल राजू शर्मा ने भी बड़े श्रद्धा भाव से आराधना में भाग लिया था. अखंड सौभाग्यवती सुमति महारानी शिव स्वरूप में विद्यमान अनुसूया महातत्व का ध्यान किया करती थीं. उस महा तपस्या के फलस्वरूप ही श्रीपाद स्वामी का अवतार हुआ था. इसी कारण वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी, नरसिंह वर्मा अथवा बापन्नार्युलू से धन का स्वीकार करने पर वह दान नहीं होगा. परन्तु यदि उनसे धन न स्वीकारा जाए तो वह महापाप होगा ऐसा श्रीपाद स्वामी अपने पिता को मौन रहकर बताना चाहते थे. श्रीपाद प्रभु सकल देवताओं के स्वरूप हैं. सभी देवताओं से परे – ऐसा महान तत्व हैं. उनके दर्शन, स्पर्श तथा उनसे संभाषण का लाभ जिन भाग्यवन्तों को हुआ वे धन्य है.”

श्रीपाद स्वामी ने अपनी असाधारण लीला से अपने पिता को ऋणमुक्त कर दिया – यह समाचार पीठिकापुर में दावानल की भाँति फ़ैल गया. तीन वर्ष के बालक श्रीपाद के अप्पल राजू को ऋणमुक्त करने पर उनके नेत्रों से पुत्र के प्रति स्नेहवश अश्रु धारा बह निकली. महारानी सुमति अपने पुत्र को ह्रदय से लगाए कितनी ही देर तक तन्मय अवस्था में थी. उस समय उनके घर वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी, नरसिंह वर्मा, बापन्नार्य एवँ सुब्बय्या आये हुए थे. सुब्बय्या ने सभी ज्येष्ठ व्यक्तियों के सम्मुख कहा कि श्री अप्पल राजू का उधार चुक गया है. इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “ पिता को ऋणमुक्त करना पुत्र का धर्म ही है.”

अप्पल राजू ने पूछा, “कोई जटाधारी दस वराह देकर ताँबे का पात्र ले गया, इससे मेरा ऋण कैसे उतर गया?” इस प्रकार की अनेक प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की गईं. बापन्नार्युलु ने श्रीपाद स्वामी से पूछा, “क्या तुम जानते हो कि वे जटाधारी सन्यासी कौन थे?” इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “मैं न केवल उस जटाधारी के, अपितु सभी जटाधारी सन्यासियों के बारे में जानता हूँ.”

 

श्रीपाद स्वामी कौन हैं? और उनका स्वरूप क्या है?

 

बापन्नार्युलु बालक श्रीपाद से बोले, “तू तीन वर्ष का बालक है, परन्तु बातें बड़े आदमियों जैसी कर रहा है. सब बातें जानने के लिए क्या तू सर्वज्ञ है?” इस पर बालक श्रीपाद बोले, “आपको ऐसा प्रतीत होता है कि मैं तीन वर्ष का हूँ, परन्तु मुझे ऐसा नहीं लगता. मेरी आयु लाखों वर्षों की है. मैं इस सृष्टि से पहले था, प्रलय के पश्चात भी रहूँगा. सृष्टि की निर्मिती के समय मैं था. मेरे बिना सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवँ विलय हो ही नहीं सकता. मैं साक्षीभूत होकर सभी क्रियाकलापों का अवलोकन करता हूँ.” इस पर बापन्नाचार्युलु ने कहा, “श्रीपाद! कोई छोटा बालक यदि केवल कल्पना करे कि वह चंद्रमंडल में है, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह यथार्थ में चंद्रमंडल में है. प्रत्यक्ष अनुभव की आवश्यकता होती है. सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमानता – ये केवल जगन्नियंता के लक्षण हैं.”

इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “मैं वह आदितत्व हूँ, जो सर्वत्र स्थित है. आवश्यकतानुसार मैं उचित प्रसंग पर उचित स्थान पर प्रकट होता हूँ. सभी प्राणियों में मैं अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवँ आनंदमय कोष में विद्यमान रहता हूँ. मेरी उपस्थिति के कारण ही इन पंचकोषों के सभी क्रिया कलाप चलते रहते हैं. यदि किसी विशिष्ट कोष में अपने होने की अनुभूति तुम्हें दूं तो उस कोष में मेरी उपस्थिति का आभास होगा. मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि मैं ऐसी अनुभूति न दूं, तो मैं वहाँ हूँ ही नहीं. मैं सर्वव्यापी हूँ. समस्त ज्ञान-विज्ञान मेरे चरणों में लीन हैं. मेरी केवल इच्छा मात्र से इस समूची सृष्टि का निर्माण हुआ है. मैं सर्वत्र विद्यमान हूँ. इसमें क्या आश्चर्य है?

इस पर अप्पल राजू शर्मा ने कहा, “ बेटा, बचपन से ही तू हमारे लिए तू एक पहेली है. तू बार-बार ‘मैं दत्त प्रभु हूँ, मैं दत्त प्रभु हूँ’ ऐसा कहता है. ‘नृसिंह सरस्वति के रूप में अवतार लूँगा’ ऐसा कहता है. लोग तो कौओं जैसे हैं. पीठिकापुर के ब्राह्मण तो नरक के लौह-कागों से भी भयानक हैं. इन सब बातों को वे मन की चंचलता एवँ बुद्धिभ्रष्ठता कहते हैं. हम ब्राह्मण हैं. विधियुक्त धर्म-कर्म का आचरण करना हमारे लिए श्रेष्ठ है. इससे बढ़कर यदि यह कहें, कि तू ईश्वरी अंशयुक्त अवतारी पुरुष है, तो वे समझते हैं कि ये हम केवल अहंकारवश कह रहे हैं.”

इस पर बालक श्रीपाद ने उत्तर दिया, “तात, आपकी बात मैं अमान्य नहीं करता, परन्तु जो सच है वह तो कहना ही चाहिए ना? पञ्चभूतों से साक्षी प्राप्त करते समय, मैं दत्त प्रभु नहीं हूँ, ऐसा कहने से क्या असत्य भाषण का दोष नहीं लगेगा? यदि आकाश के सूर्य से यह कहा जाए कि तू सूर्य नहीं है, तो क्या वह सूर्य न रहेगा? सत्य देश काल की सीमाओं से परे है. जिस प्रकार हमारे पीठिकापुर के ब्राह्मण स्वयँ को देहधारी समझकर मनुष्यत्व का अनुभव ले रहे हैं, उसी प्रकार मैं भी सर्वज्ञता, सर्वशक्तित्व, सर्वान्तर्यामित्व युक्त दत्त हूँ. इस बात का मैं पग पग पर सबको अनुभव करवा रहा हूँ. युग बीतते रहेंगे. अनेक बार सृष्टि का लय हो सकता है, परन्तु मैं, जो साक्षात दत्त हूँ. वह दत्त नहीं हो, ऐसा कैसे हो सकता है?

इसके बाद बापन्नार्युलु ने कहा, “श्रीपाद! जटाधारी के जाने के पश्चात सुब्बय्या के पास इकतीस पात्रों के स्थान पर केवल एक ही पात्र बचा. क्या तुमने किसी चमत्कार से उनको अदृश्य कर दिया?” इस पर दत्त प्रभु बोले, “सभी घटनाएं काल एवँ कर्म के अनुसार किसी न किसी कारण वश घटित होती हैं. कारण के बिना कार्य संभव नहीं है. यह प्रकृति का नियम है. यह सुब्बय्या पिछले जन्म में वन्य प्रांत में दत्त पुजारी थे, परन्तु वन में दत्त का दर्शन वे कभी-कभार ही किया करते थे. उनके भीतर स्त्री कामना बड़ी प्रबल थी. यह स्त्री लोलुप पुजारी प्राचीन काल की परंपरानुसार पूजित ताँबे की विशाल दत्त मूर्ती को बेचना चाहता था. अतः एक दिन इसने उस मूर्ती को बेच दिया और उससे प्राप्त धन को गलत ढंग से खर्च कर दिया. मगर, लोगों में इसने यह समाचार फैला दिया कि दत्त मूर्ती की चोरी हो गई है. जटाधारी के रूप में जो सन्यासी आया था, वह पूर्व जन्म में सुनार था. उसने धन के लालच में उस दत्त मूर्ती को पिघलाया था. इस जन्म में वह जन्मतः दरिद्री रहा. दत्त मूर्ति की अनेक वर्षों तक पूजा करने के फलस्वरूप उस पुजारी का धनवान श्रेष्ठी कुल में जन्म हुआ. इन दोनों ने उस मूर्ती को पिघला कर उसके बत्तीस पात्र बना कर बेचे थे. उस सुनार के घर में नृसिंह देव की पूजा-आराधना होती थी. नृसिंह भगवान की मूर्ती के सम्मुख ही ये ताँबे के  बर्तन बनाए गए थे. ईश्वर की इच्छा से नृसिंह भगवान के बत्तीस अवतारों के अंशों ने उन ताँबे के बर्तनों में प्रवेश किया था. इस जन्म में अपने पूर्व जन्म का ज्ञान होकर उस सुनार ने बड़ी श्रद्धा-भक्ति से मेरी सेवा की. मैंने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और पीठिकापुर आकर मेरे हाथ से ताँबे के पात्र को स्वीकार करने की आज्ञा दी. साथ ही श्रेष्ठी को दस वराह देकर मुझे बंधन मुक्त करने की भी आज्ञा दी. ऐसा करके वह धन्य हो गया. उसकी आर्थिक समस्या दूर होने का आशीर्वाद मैंने उसे दिया था. लेनदारों के तकाजों से बचने के लिए उसने जटाधारी सन्यासी का वेष धारण किया था. मुझे तो जटाधारी के बारे में सभी कुछ मालूम है ना? यह सुब्बय्या श्रेष्ठी वाम मार्ग से हमारे परिवार से दस वराह वसूल करना चाहता था. उसे दस वराह प्राप्त हों, ऐसी व्यवस्था मैंने कर दी. परन्तु इसके बदले में सुब्बय्या का सभी पूण्य फल नष्ट हो गया. अरे, सुब्बय्या! चिंतामणि के साथ तूने जो श्रुंगार-व्यभिचार किया, वह सब मुझे ज्ञात है. तेरी कथा मेरे कथामृत में हास्यास्पद होगी. तू झोली लेकर छोटे बच्चों के लिए आवश्यक खाद्य पदार्थ बेचकर अपना उदार निर्वाह करेगा. तुझ से जो धन उधार लिया था, उससे मेरे माता-पिता ने भोजनादि की व्यवस्था की थी. तुझ से ज़्यादा तो बनिए का हिसाब मैं जानता हूँ. भोजन में बनाए चावल तथा तुरई की सब्जी बनाने में ही तेरे पास से लिया धन समाप्त हो गया था. अन्य खर्चों के लिए मेरे पिता द्वारा कष्ट से अर्जित किया गया धन ही खर्च हुआ था. जब तू खाने को मोहताज हो जाए तो तेरे पास के इस ताम्र पात्र से तुझे केवल जल, चावल तथा तुरई की बनी दाल ही प्राप्त होगी. वह भी सिर्फ उतनी जितनी कि तू खाकर औरों को खिला सके.”

बालक श्रीपाद ने इतनी बातें अत्यंत तीव्रता पूर्वक कहीं. उनका मुखमंडल दिव्य, प्रखर तेजस्वी प्रतीत हो रहा था. उनके नेत्र अग्नि-गोल के समान लाल हो रहे थे. वे आगे बोले, “अरे, सुब्बय्या श्रेष्ठी! आज रात को तेरे घर के दक्षिण द्वार के निकट एक भैंस आयेगी. तेरा अंतःकाल निकट आ गया है, ऐसे यमराज के संदेश वाहक के रूप में वह आएगी. मैं तुझ पर एक अनुग्रह करने जा रहा हूँ. तू अपने हाथ से भोजन बनाकर तुरई की दाल तथा चावल उस भैंस को खिला. उस भैंस की केवल एक ही यह इच्छा तू पूरी कर. उस अन्न को खाकर वह भैंस मर जायेगी, परन्तु उसी क्षण से तू उत्तरोत्तर निर्धन होता जाएगा. तू झोली लेकर मैंने जो कहा है वह कर. इसके पश्चात जब तू दाने-दाने के लिए तरसेगा, तब ताँबे के पात्र का लाभ तुझे मिलेगा.”

श्रीपाद स्वामी ने यह बात अत्यंत कठोर शब्दों में कही. उस समय वेंकटप्पा श्रेष्ठी क्रोधित श्रीपाद प्रभु को देखकर अत्यंत भयभीत हो गए. उन्होंने बालक श्रीपाद को इतने क्रोध में कभी नहीं देखा था. तब बालक श्रीपाद ने कहा, “नाना जी! डर गए क्या? मैं नरसिंह मूर्ती ही हूँ. आपको वरदान देकर आप पर कृपा कर रहा हूँ. क्या आपने ऐसा सोचा कि मैं वैश्य कुल के सभी लोगों को शाप दूँगा? मेरी बहन वासवी ने अपने कुल के लोगों के सौन्दर्य में कुछ त्रुटी रहने का शाप दिया था. मैं श्रीपाद उसी प्रकृति का हूँ! कहीं आपके मन में ऐसी आशंका तो नहीं उठी कि मैं सभी वैश्यों को निर्धन होने शाप दूँगा? आप घबराएं नहीं. ईश्वर के लिए जाति-कुल का भेदभाव नहीं होता, उसी प्रकार भक्तों की भी न कोई जाति होती है, न कोई कुल, आर्य वैश्यों के तथा मेरे अनुबंध बहुत पुराने हैं. बापन्नार्य अर्थात प्राचीन काल के लाभाद महर्षि ही तो हैं. वैश्यों में लाभाद महर्षि गोत्र लुप्त हो गया है. बापन्नार्य के सभी वंशजों को (कलियुग के अंत तक के) मेरा आशीर्वाद है. उन पर मेरा वरद हस्त सदा बना रहेगा. आपको जो दी है, वह झोली बिलकुल भिन्न है. उसमें दत्त-मिठाई भरी है. कितनी भी दीजिये, कम न होगी. परन्तु वह किसी के नेत्रों को दिखाई नहीं देती. नृसिंह के बत्तीस अवतारों के सभी लक्षण मुझमें विद्यमान हैं. बापन्नार्युलु की तेहतीसवीं पीढी में मेरे इस जन्म स्थान पर एक महासंस्थान का निर्माण होकर उसमें मेरी चरण-पादुकाओं की स्थापना की जायेगी. आपके वंश का कोई भी पुरुष यदि श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दिव्य एवँ भव्य रूप की नवविध भक्ति के किसी भी मार्ग से आराधना करेगा, तो श्री दत्तात्रेय के श्वान अदृश्य रूप से उसकी देखभाल करेंगे. वेद, पुराण, उपनिषद् ये सब श्वान रूप में अदृश्य रहकर सदैव रक्षा करेंगे. तभी वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी ने श्रीपाद प्रभु को प्रेम से गोद में लिया. उनके नेत्रों से आनंदाश्रु बह निकले. बापन्नार्युलु के मुख से बोल नहीं फूट रहे थे. सुमति माता इस संदेह में थी कि यह सब स्वप्न है अथवा वैष्णवी माया. अप्पल राजू शर्मा विस्मय चकित रह गए. बालक श्रीपाद के दोनों भाई भयभीत दृष्टि से उनकी और देखते हुए सोच रहे थे कि यह हमारा अनुज है अथवा दत्त प्रभु?

नरसिंह वर्मा ने बालक श्रीपाद को अपनी गोद में ले लिया. श्रीपाद प्रभु वर्मा से बोले, “दादा जी, कल हम दोनों घोडागाडी में अपनी ज़मीन देखने जायेंगे. वहाँ भूमाता मुझसे कई दिनों से आर्त स्वर में प्रार्थना करते हुए कह रही है कि अपने पद स्पर्श से मुझे कब पावन करोगे? मेरा तो वचन है कि मैं “आर्तत्राण परायण” हूँ.  तब वर्मा बोले, “अरे श्रीपाद! मेरी एक छोटी-सी विनती है. अपने पीठिकापुर के निकट मेरी ज़मीन है न? वहीं एक छोटा-सा गाँव बसाकर वहाँ के निवासियों से खेती-बाडी करवाई जाए. ग्राम वासियों को कम पैसों में खेती करने के लिए देकर ज़मींदारी का दायित्व निभाने के लिए कुलकर्णी पद तुम्हारे पिता को दिया जाए. परन्तु अभी यह कुलकर्णी पद अपने पास नहीं है ना?” इस पर बालक श्रीपाद हँस कर बोले, “दादा जी, आपने अपनी ज़मींदारी पर तो विचार कर लिया, मगर मेरी ज़मींदारी के विषय में कुछ नहीं सोचा. मुझे यह स्वीकार नहीं. पहले पिता जी से कहिये कि कुलकर्णी पद का निर्माण करें.”

“इसके पश्चात वह कुलकर्णी पद तुम्हें ही संभालना है,” ऐसा वर्मा बोले.

“घंडीकोटा श्रीपाद श्रीवल्लभ राज शर्मा किसी एक गाँव का कुलकर्णी था, केवल इतना ही इतिहास में शेष रहेगा. परन्तु जो कुलकर्णी पद मैं निभाने वाला हूँ, वह विश्वात्मक है. मेरे हिसाब-किताब मुझे ही करने हैं. प्रतिदिन करोड़ों-करोड़ों पुण्य राशि का हिसाब-किताब होता रहता है. मेरे अवतार का प्रयोजन है – विश्व कुण्डलिनी को झकझोरना. मानव के ही समान प्रत्येक गाँव की, शहर की, पुण्य क्षेत्रों की भी कुण्डलिनी होती है. सान्ध्र सिन्धुवेद का ज्ञान जिन्हें है, वे ही इस योग-रहस्य को जान सकेंगे. पीठिकापुरम् की कुण्डलिनी बापन्नार्युलु, वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी तथा वत्सवाई की तैतीसवीं पीढ़ी में जागृत हो सकती है. अभी उसकी जल्दी क्या है? दैवयोग से आपको प्राप्त हुए इस महापुण्य काल के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना उचित होगा.”

श्रीपाद प्रभु के इस कथन के पश्चात वे सदा पीठिकापुरम् में ही रहें, ऐसा प्रयत्न नरसिंह वर्मा ने किया था.

 

श्रीपाद प्रभु का वैभव

मैं अज्ञान से भरा हुआ हूँ. श्रीपाद श्रीवल्लभ जब कहते थे कि “मैं स्वयँ श्रीकृष्ण हूँ,” तो सामान्य लोगों को यह हास्यास्पद प्रतीत होता. उस अज्ञानता के वश ही मैंने प्रश्न किया, “श्रीपाद, तू स्वयँ को श्रीकृष्ण कहता है तो तेरी अष्ट भार्याएं एवँ सोलह सहस्त्र गोपिकाएं भी क्या इस अवतार में हैं?” इस पर श्रीपाद प्रभु मंद हास्य करने हुए बोले, “मेरी अष्टविध प्रकृति ही अष्ट भार्याएं हैं. मेरे इस शरीर से दसों दिशाओं में प्रतिक्षण शक्ति स्वरूप स्पंदन प्रवर्तित होते रहते हैं. इस प्रकार प्रत्येक क्षण में एक-एक कला से, शरीर, मन एवँ आत्म तत्व से (10 × 10 ×10 = 1000) अर्थात् एक हज़ार स्पंदन प्रवर्तित होते हैं. इसा प्रकार सोलह कलाओं में से कुल सोलह हज़ार स्पंदन प्रवर्तित होते हैं. ये ही मेरी सोलह हज़ार गोपिकाएं हैं. पूर्वावतार में ये सभी कलाएँ मानव रूपों में प्रकट हुई थीं. इस अवतार में वे सब निराकार रूप में स्पन्दनशील हैं. 

विविध देवताओं के माध्यम से मेरी पूजा-आराधना करने में कोई भूल नहीं है. वह मेरी ही आराधना है. मुझमें उपस्थित शिव स्वरूप, विष्णु रूप और ब्रह्मस्वरूप की आराधना की जा सकती है. विभिन्न प्रकार की साधन पद्धतियाँ, साधक की विभिन्न साधना अवस्थाएं, काल, कर्म एवँ कारण जैसी प्राणियों की अवस्था पर प्रभाव डालती रहती हैं.”

 

नरसिंह प्रभु के ३२ रूप

 

उस रात को नरसिंह प्रभु ने नरसिंह राज वर्मा को बत्तीस रूपों में दर्शन दिए थे. ये रूप इस प्रकार हैं:

1.   कुंदपाद नरसिंह मूर्ती

2.   कोप नरसिंह मूर्ती

3.   दिव्य नरसिंह मूर्ती

4.   ब्रह्माण्ड नरसिंह मूर्ती

5.   समुद्र नरसिंह मूर्ती

6.   विश्वरूप नरसिंह मूर्ती

7.   वीर नरसिंह मूर्ती

8.   रौद्र नरसिंह मूर्ती

9.   क्रूर नरसिंह मूर्ती

10. विभत्स नरसिंह मूर्ती

11. धूम्र नरसिंह मूर्ती

12. वह्नि नरसिंह मूर्ती

13. व्याघ्र नरसिंह मूर्ती

14. बिडाल नरसिंह मूर्ती

15. भीम नरसिंह मूर्ती

16. पाताल नरसिंह मूर्ती

17. आकाश नरसिंह मूर्ती

18. वक्र नरसिंह मूर्ती

19. चक्र नरसिंह मूर्ती

20. शंख नरसिंह मूर्ती

21. सत्व नरसिंह मूर्ती

22. अद्भुत नरसिंह मूर्ती

23. वेग नरसिंह मूर्ती

24. विदारण नरसिंह मूर्ती

25. योगानंद नरसिंह मूर्ती

26. लक्ष्मी नरसिंह मूर्ती

27. भद्र नरसिंह मूर्ती

28. राज नरसिंह मूर्ती

29. वल्लभ नरसिंह मूर्ती

इसके पश्चात तीसवीं नरसिंह मूर्ती के रूप में उन्होंने श्रीपाद श्रीवल्लभ को देखा. इकतीसवीं नरसिंह मूर्ती को श्री नृसिंह सरस्वति अवतार में और बत्तीसवीं नरसिंह मूर्ती के रूप में प्रज्ञापुर (अक्कल कोट) के स्वामी समर्थ को देखा.

 

श्रीनिवास का वृत्तांत

कन्या मास के श्रवण नक्षत्र पर द्वादशी, सोमवार को सिद्ध योग पर श्री वेंकटेश अर्च्य रूप में प्रकट हुए. वैशाख शुद्ध सप्तमी को विलम्बी नाम संवत्सर में उन्होंने कुबेर से ऋण लेकर ऋण पत्र लिख कर दिया. श्री पद्मावती देवी ने मृग नक्षत्र पर जन्म लिया. वैशाख शुद्ध दशमी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र पर श्रीनिवास प्रभु का पद्मावती देवी के साथ विवाह संपन्न हुआ. श्रीनिवास प्रभु भी भारद्वाज गोत्र में अवतरित हुए थे. पांडवों के वंश में सुधन्वा नागकन्या द्वारा प्रसूत पुत्र आकाश महाराज था. उसका भाई था तोंडमान. वसुधानु था आकाश महाराज का पुत्र. श्रीनिवास प्रभु ने अगस्ती महर्षि की सलाह के अनुसार आधा राज्य तोंडमान को तथा आधा राज्य वसुधानु को दे दिया.

उस रात को उन सबने श्रीपाद प्रभु के दिव्य नाम का कीर्तन किया. दूसरे दिन श्रीपाद प्रभु की आश्चर्यकारक लीलाओं का वर्णन करने का आश्वासन देकर सुब्बय्या श्रेष्ठी निकट ही स्थित एक कुटी में शंकर भट्ट को ले गए. उस कुटिया में ताड़पत्री की दो चटाइयां थीं. चार श्वान उस कुटी की रक्षा कर रहे थे.

 

श्रीपाद प्रभु के स्मरण से प्राप्त फल

श्रीपाद प्रभु की ह्रदयंगम लीलाओं के केवल स्मरण मात्र से अनेक जन्मों की संचित पाप राशियाँ भस्म हो जाती हैं.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की जय जयकार हो।।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

अध्याय - ९

 


।। श्रीपाद राजम् शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय – 9


कर्मफल मीमांसा


आज गुरूवार है. प्रातः सूर्योदय के समय, गुरू का होरा चल रहा है. मैं और तिरुमलदास एक कमरे में ध्यानस्थ बैठे थे. सूर्य की कोमल किरणें कमरे में झाँक रही थीं. क्या आश्चर्य हुआ! सूर्य की उन कोमल किरणों में हम दोनों को श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के दर्शन हुए. सूर्य किरणों के प्रवेश से हम अपनी सुध-बुध में वापस लौटे. परम पूजनीय, अत्यंत मंगलप्रद ऐसे १६ वर्षीय श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के दर्शन प्राप्त होना केवल उन परम प्रभु की निस्सीम करुणा का ही फल है. हमें पल मात्र को दर्शन देकर वे अदृश्य हो गए.

श्रीपाद प्रभु को नैवेद्यार्थ चने रखे थे. सूर्य किरणों के स्पर्श से वे चने लौह खण्डों में परिवर्तित हो गए. इससे मुझे आश्चर्य हुआ, और मेरा मन दुखी भी हो गया. प्रभु के दर्शन होना और चनों का लौह खण्डों में परिवर्तित होना – क्या यह किसी विशेष बात की सूचना है?

श्री तिरुमलदास ने आगे कहना शुरू किया, “ बेटा! शंकर भट्ट! आज दोपहर को मेरा आतिथ्य स्वीकार करने के बाद तुम कुरवपुर जाओ, ऐसी दत्त प्रभु की आज्ञा हुई है. भरी दोपहर में प्रभु दत्त क्षेत्र में भिक्षा हेतु भ्रमण करते हैं. यह काल अतिशय शुभ है.”

मैंने कहा, “ स्वामी! रोज़ मैं श्री दत्त प्रभु के स्मरण में, दत्त-कथा प्रसंग के श्रवण में काल व्यतीत कर रहा था. आज नैवेद्य के लिए रखे हुए चने लौह खण्डों में परिवर्तित हो गए, इससे मुझे दुख हो रहा है. मेरे इस संशय का निवारण करके कृपया मुझे कृतार्थ करें.”

श्री तिरुमलदास बोले, “बेटा! कुछ शताब्दियों के उपरांत कली प्रबल होने से, नास्तिकत्व बढ़ेगा. नास्तिकत्व का निर्मूलन करके आस्तिकत्व की स्थापना करने के लिए प्रभु चित्र-विचित्र लीलाएँ दिखाकर अनुग्रहीत करेंगे. भविष्य में धर्मं-संस्थापना हेतु सभी कार्यक्रमों में बीज रूप में श्रीपाद श्रीवल्लभ के अवतार में अनुग्रह प्रदान करेंगे.”

खनिज पदार्थों में चैतन्य निद्रित अवस्था में रहता है. खनिज स्थिति में प्राण अंतर्लीन होकर रहता है. खनिजों में अनेक रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण प्राणों की उत्पत्ति होती है. प्राण में मन अंतर्लीन होता है. प्राण रूप में चैतन्य अर्धनिद्रित अवस्था में रहता है. यह तुम वृक्षों में स्पष्ट रूप से देख सकते हो. मादक द्रव्यों के सेवन से, मनुष्य अपने देह में इस स्थिति का अमुभव करता है.

प्राण शक्ति के रूप में व्यक्त चैतन्य तत्व, परिणाम क्रम से विकसित होकर मन के माध्यम से कर्म करने के प्रति अभ्यस्त होता है. यह स्थिति पशुओं में देखी जाती है. पशु का पूर्ण विकास ही मनुष्य कहलाता है. मनुष्य में मनः शक्ति पूरी तरह कार्यरत रहती है. मन से भी परे है, एक अतिमानस. अतिमानस अंतर्लीन स्थिति में रहता है. मानव योग साधना से परिपूर्ण हो जाता है, वह मूलाधार चक्र में सुप्त चैतन्य को सहस्त्रार चक्र में ले जाकर सविकल्प, निर्विकल्प समाधि स्थिति को प्राप्त कर लेता है. परम ज्योति स्वरूप श्री गुरु के साथ तादात्म्य की स्थिति स्थापित कर लेता है. इस स्थिति में अनिर्वचनीय आनंद का अनुभव प्राप्त करता है. मगर उसका व्यवहार महासंकल्प के अनुसार होता है. इसलिए वह कर्म बंधन से अलिप्त रहता है. उस महासंकल्प का स्वरूप अचिन्त्य, अगम्य एवँ कल्पनातीत है और महाप्रचंड रूप से वेगवान है. अतिमानस केवल श्री प्रभु का होता है. हर क्षण प्रभु करोड़ों-करोड़ों प्रार्थनाएँ स्वीकार करते हैं. धर्मं सम्मत प्रार्थनाओं को तत्काल प्रचीति देकर दुःख निवारण करते हैं. धर्मबद्ध व्यक्तियों की इच्छाएँ पूरी करते हैं. मानव के मन का वेग कूर्म गति के समान है, मगर श्री प्रभु के अतिमानस का वेग महाप्रचंड एवँ कल्पनातीत है. महाप्रचंड वेग वाले प्रकाश की गति भी उनके अतिमानस की गति के सामने कम है. मानव या कोई प्राणी यदि छोटी सी प्रार्थना भी करे, तो वह प्रभु के दिव्य तेज-पुंज के माध्यम से प्रभु तक पहुँचती है. समस्त दृश्यादृश्य शक्तियों का आधार प्रभु ही हैं. सभी लोकों के प्रकाशित होने का कारण है केवल उनके शरीर से निकलने वाला ज्योतिपुंज – अन्य कोई कारण नहीं. ब्रह्मांड में प्रकाशित होने वाले अनेक करोड़ सूर्यों तथा नक्षत्रादि पिण्डो का संयुक्त प्रकाश भी उनके तेज के सम्मुख यूँ प्रतीत होता है, जैसे सूर्य के सामने छोटा-सा दीपक. बेटा! यही श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का वास्तविक तत्व है. अनंत शक्ति, अनंत ज्ञान, अनंत व्यापकत्व वाले उस निर्गुण, निराकार स्वरूप ने केवल सृष्टि के प्रति असीम, निःस्वार्थ करुणा के कारण ही सगुण, साकार, मनुष्य देह धारण किया है, और वे श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के रूप में दर्शन दे रहे हैं. इसे समझने के लिये मानव का परिपूर्णता को प्राप्त करना आवश्यक है.”

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का दिव्य स्वरूप   

मानव का देवताओं के प्रति आकर्षण अनिवार्य है. उसी प्रकार देवता भी अनंत सीमाओं को लांघकर निम्न स्तर में जन्म लेते हैं. इसे ‘अवतरण कहते हैं. यह एक निरंतर चलने वाली योग क्रिया है. सृष्टि में यदि एक बार सत्य की स्थापना हो जाए तो वह स्वयंसिद्धता से, बिना किसी प्रयत्न के कार्यशील रहती है. सत्य, ज्ञान एवँ अनंत स्वरूप वाले श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी अनेक ‘सत्यों को सृष्टि में स्थापित करने के संकल्प से दिव्य. भव्य अवतार ग्रहण करते हैं. वे साक्षात दत्त प्रभु हैं.”

मैंने कहा, “स्वामी! आपसे चर्चा करते हुए मुझे कितने ही नवीन विषयों का ज्ञान हुआ. फिर भी श्री गुरू के स्वरूप का सार समझ में नहीं आता, उनका यह दिव्य तथा भव्य चरित्र किस प्रकार लिखूं, और उनकी व्याख्या कैसे करूँ, यह समझ नहीं पा रहा हूँ. मैंने मूर्ती प्रतिष्ठा के बारे में सुना है, आप सत्य की प्रतिष्ठा के बारे में कह रहे हैं. मुझ पर कृपा करके सत्य के बारे में विस्तार पूर्वक बताएँ, यह विनती करता हूँ”.

श्री तिरुमलदास बोले, “बेटा! तेरे द्वारा श्री प्रभु का चरित्र लिखा जाएगा, यह निर्णय पहले ही हो चुका है. तेरे संपर्क में आने वाले श्रीपाद प्रभु के भक्त शिरोमणि वे अनुभव तुझे बताएँगे, उन्हें लेखनीबद्ध करना. तेरी व्याख्याओं की कोई आवश्यकता नहीं. श्री प्रभु का चरित्र प्रभु स्वयं ही तेरी लेखनी के माध्यम से लिखवा लेंगे. इसके आगे किसी भी बात का विचार करना व्यर्थ है.

मनुष्य नाना प्रकार के अन्न का सेवन करता है. सेवन किये हुए अन्न का अपने आप पाचन होकर वह शरीर को शक्ति प्रदान करता है. यह पाचन क्रिया शरीर का कार्य है, मनुष्य को इस क्रिया में कोई  प्रयत्न नहीं करना पड़ता. मनुष्य का कर्तव्य केवल इतना है कि वह अन्न का संग्रह करके उसका सेवन करे. भोजन करने के बाद अन्न का पाचन करना शरीर का कर्तव्य है. अर्थात्, विधि का यह निर्णय है कि तुम अन्न प्राप्त करो, जबकि पाचन का कर्तव्य शरीर का है. मनुष्य के पास मन होने के कारण वह स्वेच्छा का अनुभव करता है. इसलिए सच-झूठ, अच्छा-बुरा कुछ भी होने की संभावना है. शरीर को स्वेच्छा का गुण प्राप्त नहीं है. सेवन किया हुआ भोजन पचाकर शरीर को शक्ति-संपन्न करना, यही शरीर का कर्तव्य है, यह विधि का निर्णय है. मनुष्य की इच्छा हो अथवा न हो, उसके प्रयत्नों के बिना ही शरीर अपने कर्तव्य का पालन करता रहता है. शरीर से संबंधित इस सत्य की स्थापना होने के कारण, अप्रयत्न से, मनुष्य का संकल्प न होते हुए भी, वह कार्य निरंतर चलता रहता है. प्रकृति से तात्पर्य है, सृष्टि के अंतर्गत सारी क्रियाएँ एवँ प्रतिक्रियाएँ, जो इस सत्य के आधार पर घटित होती हैं. सूर्योदय – सूर्यास्त, ऋतुचक्र, ग्रहों–नक्षत्रों आदि की गति को इस सत्य के आधार पर घटित होना ही पड़ता है. यह एक अनुल्लंघनीय नियम है. इसके विपरीत जाने का स्वातंत्र्य उनके पास नहीं. सर्वव्यापक, ऐसे प्रभु, सृष्टि के प्राणिमात्र के प्रति करुणा के कारण सृष्टि विधान सुचारू बनाते हैं. कृत युग में केवल संकल्प मात्र से सकल सिद्धियाँ प्राप्त होती थीं, त्रेतायुग में यज्ञ-याग से, द्वापर युग में मन्त्र एवँ शास्त्रास्त्रों से सकल सिद्धियाँ प्राप्त होती थीं. अब कलियुग में प्रमुखता से तंत्र प्रयोग से, कलियुगी यंत्र से सकल सिद्धी प्राप्त होती है. युगधर्म का अनुसरण करते हुए, तथा मानव के शक्ति-युक्ति के स्तर को दृष्टिगत रखते हुए सृष्टि विधान को सरलीकृत बनाने का निर्णय लिया जाता है.

तीन दिन अहोरात्र श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का स्मरण करने से, उनका ध्यान करने वाले को श्रीपाद प्रभु सशरीर दर्शन देकर धन्य करते हैं. मानव के पतन के यदि एक लाख मार्ग हैं, तो ईश्वर उसके उद्धार के लिए दस लाख मार्गों से उस पर अनुग्रह करते हैं. श्री दत्त प्रभु अपने अंशावतार, सिद्ध, योगी, महासिद्ध आदि के माध्यम से इस सृष्टि का पालन करते हैं.      

पूर्व युग के श्री दत्त प्रभु ही क्या श्रीपाद स्वामी हैं? यह शंका बीज रूप में तुम्हारे मन में उत्पन्न होने के कारण तुम्हारी शंका का निवारण करने के लिए श्रीपाद प्रभु ने नैवेद्य हेतु रखे गए चनों का लौह खण्डों में रूपांतर किया. माता अनुसूया ने लौह खण्डों को खाने योग्य चनों में परिवर्तित किया था. मैं ही प्रत्यक्ष श्री दत्त प्रभु हूँ, यह दिखाने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया.

तुम्हारी कुण्डली में गुरू व्याधि-स्थान में है. गुरू ग्रह का चनों से सम्बन्ध है. गुरू ग्रह के कारण तुम पर आने वाली विपदाएँ, बीज रूप में होने के कारण, अंकुरित न हो पाएँ इसलिए चनों को लौह-खण्डों में परिवर्तित करके तुम्हें दिखाया. इस सृष्टि में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसका श्रीपाद प्रभु के दिव्य मानस चक्षुओं ने अवलोकन न किया हो. उसी प्रकार उनकी दिव्य दृष्टि में पड़े बिना कोई भी प्राणी इस सृष्टि में जन्म नहीं ले सकता. यह परम सत्य है.

सत्य वस्तु से संबंधित ज्ञान सुप्रतिष्ठित होने के कारण उस ज्ञान को प्राप्त कर चुके लोग, इस लोक में लुप्त होने पर भी उसका नाश नहीं होता. उस ज्ञान को प्राप्त करने की योग्यता के पात्र मानव के इस सृष्टि में जन्म लेने के पश्चात, वह ज्ञान अपने आप उसे प्राप्त होता है.

दैवशक्ति, चिरंजीव मुनि, अवतारी पुरुष – ये सभी अविनाशी तत्व के ही अंश हैं, जबकि मानव विनाशी तत्व के अंश हैं. अविनाशी तत्व के ज्ञान, उसकी स्थिति, गति तथा शक्ति का कोई  विशिष्ठ रूप नहीं है. वह स्वेच्छा-तत्व है. वह परिपूर्ण है. वह अत्यंत प्राचीन होते हुए भी नित्य नूतन है. ऐसा कोई कार्य संभव नहीं, जिसके पीछे कोई कारण न हो. सभी कारणों तथा सब कार्यों का आधार वही एकमेव तत्व है. वह अतीत है, अगम्य है. उसी को दत्त-तत्व कहते हैं. उन्हीं श्री दत्त प्रभु ने इस कलियुग में अपनी समस्त कलाओं से परिपूर्ण, श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में प्रथम अवतार इस पीठिकापुर में लिया. उन श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का वर्णन करने में सहस्त्र फन वाले आदिशेष भी असमर्थ हैं.

बेटा! श्रीपाद श्रीवल्लभ श्री नृसिंह सरस्वति का अवतार ग्रहण करने वाले हैं, ऐसी सूचना अनेकों बार दी जा चुकी है. हिरण्यकश्यप ने एक विचित्र-सा वरदान जब प्राप्त कर लिया तो ऐसा प्रतीत होता था कि उसकी मृत्यु असंभव है. दिए हुए वरदान का खंडन न करते हुए, कल्पनातीत विधि से श्री नृसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यप का वध करके अपने  परम भक्त प्रहलाद की रक्षा की. प्रहलाद ने यह निर्धार किया कि प्रभु स्तम्भ में विराजमान हैं, प्रभु स्तम्भ में से प्रकट हुए. ईश्वर है, अथवा नहीं? कलियुग में अनेक व्यक्तियों के मन में यह संशय उत्पन्न होता है. कलियुग के हिरण्यकश्यप के मद का नाशा करके प्रहलाद जैसे भक्तों की रक्षा करने के लिए श्री दत्त प्रभु श्री नृसिंह सरस्वति के रूप में अवतार लेने वाले हैं. ईश्वर का अस्तित्व है, यह सिद्ध करने के लिए – यह नरसिंह अवतार की विशेषता है. श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु एवँ श्री नृसिंह सरस्वति के अवतार ईश्वर को दूषण देने वालों के मद का नाश करने के लिए तथा ईश्वर की भक्ति करने वालों की आंख की पुतली की भांति रक्षा करने के लिए होने वाले हैं. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है.

तिरुमलदास कहते रहे, मैं सुनता रहा. मेरे मन में एक संदेह उठा. मैं भूर्जपत्र पर श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का चरित्र लिख रहा था. भविष्य में लोग किस प्रकार के पत्र पर स्वामी का चरित्र लिखेंगे? अभी शालिवाहन शक चल रहा है. स्वामी के अनुसार हूण शक का आगमन होने वाला है. वास्तव में देखा जाए तो श्रीकृष्ण का निर्वाण कब हुआ? इस कलियुग का किस घड़ी में आरम्भ हुआ? यदि भविष्य काल के लोगों की कालगणना के अनुरूप, भविष्य में प्रयुक्त होने वाले पत्र पर यदि श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी मुझे लिखकर दिखाएँगे, तो मुझे पूरा विश्वास हो जाएगा कि वे वास्तव में श्री दत्तात्रेय के अवतार हैं.

अपने मन के संदेह को तिरुमलदास के सामने प्रकट न करते हुए मैं उनकी बातें सुनने का नाटक करता रहा और लौह-खण्डों में परिवर्तित हुए चनों की और देखता रहा. तभी तिरुमलदास का कंठस्वर क्षीण होकर उनकी वाचा बंद हो गई. कानों के परदे फाड़ने वाली भयंकर ध्वनी हुई. उस ध्वनी के प्रभाव से मैं बहरा हो गया.

एक ही क्षण में मैं बहरा और तिरुमलदास गूंगे हो गए. तिरुमलदास बोलने का प्रयत्न कर रहे  थे, मगर उनके मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे. मैं सुनने का प्रयत्न कर रहा था, मगर मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. मन को एक ही विचार परेशान कर रहा था – बेकार में ही मैंने संदेह किया, जिसके परिणाम स्वरूप मैं बहरा हो गया. अब क्या जीवन भर बहरा ही रहना होगा? मेरा भी क्या भाग्य है! अब मैं क्या करूँ? तभी नैवेद्य के लिए रखे हुए चने, अर्थात् वे लौह-खण्ड, तेलुगु भाषा में “श्रीपाद राजं शरणम् प्रपद्ये” अक्षरों में परिवर्तित हो गए. उस पर सफ़ेद पत्र दिखाई दिया. हमारे देखते ही देखते उस पात्र का आकार बढ़ते-बढ़ते चौकोर हो गया. भूर्जपत्र की अपेक्षा बहुत अधिक पतला, स्पर्श करने से बहुत मृदु प्रतीत हुआ. उस पर काले रंग के सुन्दर अक्षर प्रकट हो गए. तेलुगु लिपि में उस पत्र पर यह लिखा था : “श्रीकृष्ण का निर्वाण, ईसा पूर्व सन् ३१०२ में, फरवरी की १८ तारीख को रात में २ बजकर २७ मिनट तथा ३० सेकंद पर हुआ. प्रमादी नाम संवत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा. शुक्रवार, अश्विनी नक्षत्र, श्रीकृष्ण के निधन के उपरांत कलियुग का प्रवेश हुआ.”

यह चमत्कार देखकर मुझे पसीना छूटने लगा. शरीर निर्बल हो गया, काँपने लगा. मन में यह विचार आया कि श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी अदृश्य रूप से यहीं पर विद्यमान हैं. मैंने यह भी सोचा, ‘कितना अभागा हूँ मैं! कुरवपुर जाना तो अब स्वप्न ही रह जाएगा. श्रीपाद स्वामी नृसिंह अवतार धारण करके मेरा वध भी करें, तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं. यदि तिरुमलदास को यह आदेश प्राप्त हो जाए कि “शंकर भट्ट को वस्त्र के समान धोकर, निचोड़कर, सुखा दो”, तो मैं क्या करूँगा? तिरुमलदास निश्चय ही वस्त्र की भाँति पीट-पीटकर, निचोड़कर सुखा देंगे.

कभी-कभी कोई गुरू ब्रह्मज्ञान संबंधी ज्ञान होने का, अपने आत्मज्ञानी होने का ढोंग करते हुए अपने शिष्यों को संबोधित करते हैं. द्रव्य की लालसा से किसी शिष्य विशेष की प्रशंसा भी कर देते हैं. वह शिष्य गुरू द्वारा की गई प्रशंसा के मद में लीन रहता है. तब गुरू एवँ शिष्य दोनों ही दोषी हो जाते हैं. रजक कुल में जन्मे तिरुमलदास द्वारा, ब्राह्मणकुलोत्पन्न मुझे ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो, यह श्रीपाद स्वामी का चमत्कार ही है. इस परिसर के अन्य रजक अपने व्यवसाय में मगन थे. उनके मन में इस गहन चरित्र को जानने की अथवा उससे संबंधित चर्चा करने की इच्छा भी नहीं थी. अब तो मुझे श्रीपाद स्वामी की शरण में जाना ही होगा.”

मैंने तिरुमलदास की और देखा, उनका मुख ब्रह्मतेज से दैदीप्यमान हो रहा था. मेरे मन में विचार उठा कि तिरुमलदास ब्राह्मण हैं और मैं रजक हूँ. उनका चेहरा प्रसन्न प्रतीत हो रहा था. नैवेद्य के रूप में अर्पित किये गए चने अपने लौह रूप को त्यागकर पूर्ववत् हो गए थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि श्रीपाद स्वामी ने मुझे क्षमा कर दिया है. कुछ समय पश्चात्त वह श्वेत रंग का पत्र अदृश्य हो गया. तिरुमलदास बोले, “वत्स! शंकर भट्ट! कलियुग लौह युग है.                                             

कल्मष से पूर्ण – ऐसा यह युग है. मेरे देहावसान के पश्चात कुछ काल तक मैं हिरण्यलोक में वास करने के पश्चात श्रीपाद स्वामी की आज्ञानुसार पुनः महाराष्ट्र देश में जन्म लूँगा.”

“स्वामी! श्रीपाद स्वामी ने आपको भी मृत्यु के पश्चात जन्म लेने की आज्ञा दी है? कृपया यह वृत्तांत विस्तार पूर्वक कथन करें, ऐसी प्रार्थना है.”

तिरुमलदास बोले, “एक बार मैं श्रीपाद स्वामी के नानाजी के घर उनके धुले हुए वस्त्र लेकर गया. सुमति महारानी के मामा श्रीधरावधानी बालक श्रीपाद को कमर पर लेकर खेल रहे थे, और “दत्त दिगम्बर! दत्त दिगम्बर! दत्त दिगम्बर! अवधूता!” ऐसा घोष कर रहे थे. श्रीपाद स्वामी की आयु केवल दो वर्ष की थी. वे किलकारियाँ मारते हुए खेल रहे थे. बड़ा ही मनोहारी था यह दृश्य. अनायास ही मेरे मुख से निकला, “श्रीपाद वल्लभ! दत्त दिगम्बर!” श्रीधरावधानी ने मुड़कर मेरी ओर देखा. तभी श्रीपाद स्वामी “नृसिंह सरस्वति! दत्त दिगम्बर!” ऐसा बोले. वे साक्षात दत्त प्रभु हैं , वर्त्तमान में श्रीपाद वल्लभ के रूप में हैं, एवँ भविष्य में नृसिंह सरस्वति के रूप में अवतरित होने वाले हैं, ऐसी सूचना उन्होने अपनी विशिष्ट शैली में दी थी.”

 

समर्थ सदगुरु शिर्डी साईं बाबा के रूप में अवतार लेंगे

 

श्रीपाद स्वामी बोले, “ नानाजी, नृसिंह सरस्वति के रूप में महाराष्ट्र देश में अवतरित होने का मेरा संकल्प है. तिरुमलदास को भी महाराष्ट्र देश आने को कह रहा हूँ.” श्रीधरावधानी अवाक् रह गए. मैंने कहा, “मैं किसी भी जन्म में, किसी भी रूप में रहूँ, मेरी रक्षा का भार आप पर है. आपके बालकृष्ण के रूप पर मेरी बहुत ही आस्था एवँ प्रीत है.”

श्रीपाद स्वामी बोले, “तिरुमलदास! तू महाराष्ट्र देश में गाडगे-महाराज के रूप में रजत कुल में जन्म लेगा. दीन-दलितों की तथा दुःखी जनों की सेवा करके पुनीत हो जाएगा. धीशिला नगर में “साईं- बाबा” के नाम से यवन-वेष में मेरा समर्थ सद्गुरू रूप में अवतार होगा. यवन वेष में समर्थ सद्गुरू के रूप में अवतरित मुझसे तुझे अनुग्रह की प्राप्ति होगी. क्योंकि बालकृष्ण के रूप पर तेरी विशेष प्रीती है, इसलिए तू “गोपाला! गोपाला! देवकीनंदन गोपाला!” इस मन्त्र का जाप करता रहेगा. इस शरीर का अवसान होने के बाद कुछ काल हिरण्यलोक में वास करने के पश्चात गाडगे महाराज के रूप में जन्म लेकर तू लोकहित का कार्य करेगा. यह मेरा वरदान एवँ अभयदान है.”

इस पूरे प्रकार के दौरान श्रीधरावधानी माया के आवरण में खो गए थे. वे कुछ भी समझ न पाए. जब सुमति महारानी ने आवाज़ दी तो उन पर पडा हुआ माया का आवरण हट गया. श्रीपाद सामान्य बालक ही है, ऐसी उनकी धारणा बन गई.

मैंने कहा, “स्वामी! श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा था कि कर्म का फल अनिवार्य है. फिर श्रीपाद स्वामी इस नियम का उल्लंघन न करते हुए कर्म का नाश किस प्रकार करेंगे?   

 

सद्गुरू, सत्पुरुष तथा योगियों को दिए गए दान का फल

 

तिरुमलदास आगे बोले, “ श्रीकृष्ण ने सच ही कहा है कि कर्म का फल भोगना ही पड़ता है. परन्तु यह कर्मफल जागृतावस्था में ही भोगा जाए, ऐसा नहीं कहा है. वह स्वप्नावस्था में भी भोगा जा सकता है. स्थूल शरीर जो कर्मफल दस वर्षों में भोगता है, उसे मानसिक कष्ट द्वारा, स्वप्न में उत्पन्न मानसिक व्यथा द्वारा कुछ ही क्षणों में भोगा जाकर कर्म से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है. यदि सत्पुरुषों को, योगियों को दान दिया जाए तो ईश्वरीय कृपा के कारण पाप कर्मो का क्षय होता है. देवता मूर्ती पुण्य स्वरूप होते हैं, उनके ह्रदय में अपार करुणा का वास होने के कारण वे तुम्हारा पाप कर्म खुद पर ले लेते हैं एवँ अपना पुण्य तुम्हें देते हैं.”

पुण्य पुरुषों को दिए गए दान-धर्म से अथवा उनकी सेवा करने से भी पाप-पुण्य की इस प्रकार की अदला-बदली होती है. समर्थ सद्गुरू का ध्यान करने से ध्यान के माध्यम से यह अदला-बदली होती है. सद्गुरू अपने शिष्यों की सेवा ग्रहण करके, सेवा के माध्यम से शिष्यों के पाप कर्म अपने सिर पर ले लेते हैं एवँ अपना तपः फल शिष्यों को प्रदान करते हैं, परन्तु पाप कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है. ईश्वर, सत्पुरुष, सद्गुरू, अवतारी पुरुष महातेजोमय होने के कारण अग्नि-स्वरूप होते हैं. उनके भीतर स्वीकार किये गए पाप कर्मों को दग्ध करने की शक्ति होती है. उन्हें अर्पण किये गए पान, फल, फूल, आदि के माध्यम से भी पाप-पुण्य की अदला-बदली होती है. भक्त की आर्तता, भक्ति, शरणागति जितनी तीव्र होगी, उतनी ही तीव्र गति से यह अदला-बदली होती रहती है.”

कभी-कभी श्रीपाद स्वामी अपने आश्रितों के पाप कर्मों का फल निर्जीव पत्थरो को दे देते. उन पत्थरों को फोड़कर, या अनेक विचित्र मार्गों से पाप कर्म का निर्मूलन करते. इस सन्दर्भ में एक वृत्तांत सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो:

जन्म से ही श्रीपाद स्वामी को पर्याप्त मात्रा में दूध प्राप्त नहीं होता था. सुमति महारानी अपने पुत्र को को पर्याप्त मात्रा में स्तनपान नहीं करवा सकती थीं. उनके घर एक गाय थी. वह गाय उनके घर में प्रतिष्ठापित कालाग्निशमन दत्तात्रेय के नैवेद्य के लिए आवश्यक दूध ही देती थी एवँ बाकी दूध अपने बछड़े को पिला देती. इस गाय का यह एक विचित्र गुण था.

कभी-कभी बालक श्रीपाद कालाग्निशमन दत्तात्रेय के नैवेद्य के हेतु रखा हुआ दूध, भोग लगाने पहले ही पूजा-मंदिर में जाकर पी लेते. जिस दिन ऐसा होता, उस दिन अप्पलराजू गुड का भोग लगाकर उपवास करते. पति के निराहार उपवास करने पर सुमति महारानी भी निराहार रहतीं. यदि किसी दिन भोग लगाने के समय तक श्रीपाद स्वामी रुके रहते, तो उस दिन उस दूध का प्राशन बालक श्रीपाद करते. अपने वंश में जन्मे इस अपूर्व तथा दिव्य शिशु को पर्याप्त दूध देने में असमर्थ माता-पिता चिंतित रहते. वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी एवँ नरसिंह राय वर्मा ने खूब दूध देने वाली एक गाय अप्पलराजू को दान में देने का प्रयत्न किया. परन्तु उनके सारे प्रयत्न व्यर्थ हो गए. क्योंकि अप्पलराजू दान नहीं स्वीकार करते थे. उनकी ऐसी धारणा थी कि दान ग्रहण करने से पाप संग्रहित होता है. वे वेद शास्त्र सम्पन्न थे. केवल वेद-सभा का आयोजन होने पर, उससे जितनी दान-दक्षिणा मिलती, उतनी ही वह स्वीकार किया करते. पुरोहित कर्म से उन्हें काफी कम आय होती थी. वे सिर्फ वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी एवँ नरसिंह राय वर्मा के घर ही पौरोहित्य करते. यदि ये दोनों अधिक दक्षिणा देने का प्रयत्न करते तो अप्पलराज क्रोधित हो जाते. अपने श्वसुर, सत्यऋषिश्वर श्री बापन्नार्य से भी वह कभी कुछ न लेते. कार्तिक पौर्णिमा के दिन सुमति महारानी का जन्म दिन हुआ करता, उस दिन वे श्वसुर के घर भोजन करते. वैशाख शुद्ध तृतीया को अपने जन्म दिन पर भी अप्पलराजू श्री बापन्नार्य के घर भोजन करते. कालान्तर में श्रीपाद जयन्ती अर्थात् गणेशा चतुर्थी के दिन भी उनके घर भोजन के लिए जाते.

अपने परिवार की निर्धनावस्था से चिंतित सुमति महारानी ने एक दिन अपने पति से पूछा, “नाथ! मेरे मायके के लोग संपन्न हैं, तथा नैष्ठिक श्रौत्रीय संस्कार युक्त हैं. मल्लादी वंश, जो मेरा पीहर है, सम्पन्न है. उनके पास से एक गाय स्वीकार करने में मुझे कोई दोष प्रतीत नहीं होता. बालक श्रीपाद को पेटभर दूध देने में भी हम असमर्थ हैं. मेरी प्रार्थना है कि आप इस विषय पर शांतिपूर्वक विचार करें.” अप्पलराजू बोले, “ सौभाग्यवती! तुम्हारा कथन उचित है. सत्यऋषिश्वर पाप रहित हैं और उनसे गोदान ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है. मगर इस विषय पर शास्त्रों की सम्मति होना आवश्यक है. बालक श्रीपाद के जन्म से लेकर आज तक अनेक आश्चर्यजनक घटनाएं होती आई है. यदि श्रीपाद दत्तप्रभू के नए अवतार हैं, तो क्या हमारी गाय पर्याप्त दूध नहीं देती! या तुम्हारे आंचल से निकलता क्षीर बढ़ नहीं जाता! अच्छा! ज्येष्ठ पुत्र श्रीधर राज शर्मा अंधा है और उससे छोटा राम राज शर्मा पंगु है. श्रीपाद स्वामी उनकी विकलांगता तो दूर कर सकते हैं, ना! इस विषय में तुम अपने पिताजी से विचार-विमर्श कर लो, बार-बार मुझे अपने नियमों के उल्लंघन के लिए बाध्य करना उचित नहीं है.”

सुमति महारानी ने इस बात की चर्चा अपने पिता से की. बापन्नार्य मंद मुस्कान से बोले, “बेटी! ये सब श्रीपाद स्वामी की लीलाएं हैं. श्रीपाद स्वामी केवल समस्याओं का समाधान ही नहीं करते, वे स्वयं नई-नई समस्याएं भी उत्पन्न करते हैं. बालक श्रीपाद दत्तप्रभू ही हैं, इस बात को मैं योग-दृष्टी से जान गया हूँ. हमारे घर में गौ-समृद्धि है. गाय प्रदान करने में मुझे बड़ा आनंद प्रदान होगा. श्री दत्त प्रभु को गौ-क्षीर अत्यंत प्रिय है. तुम्हारे पति के अनुसार शास्त्रों की सम्मति आवश्यक है. आह! क्या विडम्बना है! अपने श्वसुर से संपत्ति ऐंठने के लिए नाना प्रकार के प्रयत्न करने वाले जामातों (दामादों) की कमी नहीं, परन्तु मेरा दामाद अग्निहोत्र के समान है. उनके नियम भंग करने का प्रयत्न करने वाले हम लोग मूढ़ हैं. सृष्टि के पंच-महाभूतों की स्पष्टतः सम्मति के बगैर तेरा पति गोदान स्वीकार नहीं करेगा. जब श्रीपाद स्वामी अपने ज्येष्ठ बंधुओं की विकलांगता दूर कर देंगे, तब तुम्हारे परिवार से उनके ऋणानुबंध समाप्त हो जाएंगे. ऋणमुक्त हो चुके दत्त प्रभु तुम्हारे घर में पुत्र के रूप में वास नहीं कर सकते. वे जगद्गुरू होकर लोकोद्धार हेतु गृह त्याग कर चले जायेंगे. इसलिए भूल कर भी उनकी विकलांगता दूर करने इच्छा बालक श्रीपाद के सामने व्यक्त न करना. सब कुछ कालाधीन है, काल श्रीपाद के आधीन है. यदि श्रीपाद संकल्प करें तो तुम्हारे क्षीर में वृद्धि हो जायेगी. परन्तु श्रीपाद के तुझसे जो ऋणानुबंध हैं, वे समाप्त हो जायेंगे. तब सभी प्रकार के ऋणानुबंधों से मुक्त श्रीपाद हमारे परिवार में सीमित न रहकर विश्वगुरू का कर्तव्य पूरा करने के लिए अपना घर छोड़ कर चले जायेंगे. श्रीपाद की इच्छा होते ही तुम्हारी गाय अपनी विचित्र वृत्ति छोड़कर खूब दूध देने लगेगी. फिर यह समस्या नहीं रहेगी. अतः तुम थोड़ा धीरज रखो. दत्त प्रभु द्वारा उत्पन्न समस्या का समाधान वे ही करेंगे.”

मैंने पूछा, “स्वामी! श्रीपाद स्वामी के बंधुओं को विकलांगता क्यों प्राप्त हुई?

तिरुमलदास बोले, “श्री दत्त प्रभु का अवतार संध्या समय हुआ था. श्रीपाद स्वामी का प्रातःकाल में हुआ. आगे होने वाले नृसिंह सरस्वति का अवतार भरी दोपहर में, अभिजित लग्न पर होने वाला है. श्री दत्त प्रभु की लीला अगाध है. सायंकाल के पश्चात अन्धेरा छाने लगता है, जीवन निद्रावस्था में चला जाता है. अतः दत्त अवतार में योग-साधना के परिणाम क्रमानुसार समस्त जीवों का भार वहन करके, उन्हें सुख-निद्रा दी गई. प्राणिमात्र इस दुविधा में रहता है कि वह कहाँ जाए, क्या करे, किस दिशा में जाए. यही दुविधा गहन अन्धकार है. प्राणिमात्र को, उसे मालूम हुए बिना, परिणाम-सिद्धी प्राप्त करवाना, यही दत्तावतार की विशेषता है. प्राणिमात्र किसी भी प्रकार के प्रयत्न के बिना अथवा अल्प प्रयत्न से ही, अनजाने ही, अन्तः चैतन्य से, अगाध परिणामों को प्राप्त करता है. यह घटना केवल भूमंडल तक ही सीमित नहीं है. श्रीपाद स्वामी का आगमन उषःकाल में हुआ. उषःकाल के समय सूर्य भगवान अपनी समूची शक्ति एक साथ प्रयोग करके प्राणियों को पुनीत करते हैं. सूर्य श्रीपाद स्वामी का प्रतीक है. प्राणियों की विविध शक्तियों के जागृत होकर, नाट्य करते हुए, विविध प्रकारों से परिणामस्थिति को प्राप्त होने का यह प्रतीक है. मध्याह्न समय मार्तंड का प्रचंड स्वरूप है. आत्मा रूपी सूर्य अपनी समूची शक्ति का दसों दिशाओं में प्रसार करता है, उसी प्रकार प्राणियों को जागृत करने के लिए नृसिंह सरस्वति का अवतार होगा. यह उसके विश्व व्यापी चैतन्य का उद्देश्य है. दत्तावतार एवँ श्रीपाद अवतार के मध्य रात थी. उसका स्वरूप था अन्धकार. इस अन्धकार के प्रतीक के रूप में ज्येष्ठ बंधू श्रीधर राज शर्मा का जन्म हुआ. उस रात्रि की समाप्ति के पश्चात जो स्थिति उत्पन्न हुई वह थी संशय, नास्तिकवाद, कुतर्क, वक्रभाष्य की स्थिति. इसके प्रतीक स्वरूप कनिष्ठ बंधू श्री रामराज शर्मा का जन्म हुआ. कोई भी प्राणी अन्धकार सदृश्य तामसी वृत्ति का त्याग करके, संशय, कुतर्क, वक्रभाष्य आदि का त्याग करके ही श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का अनुग्रह प्राप्त कर सकता है. इसके पीछे यही रहस्य है. यह विषय संसार के प्राणियों की परिणाम-दशा से संबंधित विषय है.”

वंश परम्परा से प्राप्त कर्म दोष भी होते हैं. श्री अप्पलराज शर्मा वेलनाडू मंडल के वैदिक ब्राह्मण थे. फिर भी उनके परिवार के पास ग्राम का आधिपत्य था. श्रीपाद स्वामी के पितामह आईनविल्ली नामक ग्राम के अधिकारी थे. उनके परिवार में यह प्रथा थी कि सभी अधिकार ज्येष्ठ पुत्र को प्राप्त हों. श्रीपाद स्वामी के पितामह का नाम था श्रीधर रामराज शर्मा. जिन ब्राह्मणों के पास ग्रामाधिकार होते थे, वे अपने नाम के आगे “राज” शब्द लगाया करते थे. साथ ही अपने ब्राह्मणत्व को दर्शाने के लिए “शर्मा” भी लगाया करते. ज़मींदार का कर्तव्य था उस गाँव के प्रत्येक किसान से कर वसूल करना – चाहे उस वर्ष फसल हुई हो अथवा नहीं. ग्रामाधिकारी पर यह दायित्व था कि कर की उचित प्रकार से वसूली करे. श्रीधर रामराज शर्मा को अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को दूर रखते हुए ज़मींदार की आज्ञानुसार, कभी-कभार हिंसा का प्रयोग भी करते हुए कर वसूलना पड़ता था. ग्रामाधिकारी होने के कारण उन्हें यह करना ही पड़ता था. 

परन्तु ईश्वर की दृष्टी में यह पाप कर्म ही था. अप्पल राजू के ज्येष्ठ भ्राता को ग्रामाधिपत्य प्राप्त हुआ. पितामह द्वारा किये गए पाप कर्मों के फलस्वरूप अप्पलराजू के ज्येष्ठ पुत्र श्रीधर राज शर्मा तथा उससे छोटे पुत्र श्री रामराज शर्मा को विकलांगता प्राप्त हुई. यद्यपि श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी साक्षात दत्तावतार थे, परन्तु पितामह के स्वल्प पापकर्मों के परिणाम को उन्हें भी भोगना पडा, इसीलिये उन्हें पर्याप्त मात्रा में दूध की प्राप्ति नहीं होती थी. विश्व-प्रभु द्वारा रचा गया नियम सभी पर समान रूप से लागू होता है. स्वयं अवतार लेकर कर्म फल को भोगते हुए उन्होंने हमारा मार्ग दर्शन किया है.

श्री वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी एवँ श्री वत्सवाई नरसिंह वर्मा बालक श्रीपाद को अपना पौत्र मानते थे, इसलिए उन्होंने दुग्ध संबंधी इस समस्या को हल करने के बारे में काफी विचार विमर्श किया. श्री वर्मा ने श्री श्रेष्ठी को बुलाकर कहा कि वे इस समस्या का समाधान करें.

श्री वर्मा के घर में ‘गायत्री नामक सुप्रसिद्ध गाय की संतान थी. उनमें से सभी शुभ लक्षणों वाली एक गाय को श्रेष्ठी ने वर्मा से खरीद लिया. विक्रय करने से प्राप्त धन को वर्मा ने अपने पास संभाल कर रखा. जब श्री अप्पल राजू पौरोहित्य हेतु वर्मा के घर आए, तो गो-विक्रय से प्राप्त धन को वर्मा ने अप्पल राजू को दक्षिणा स्वरूप प्रदान किया. यह धन उस राशि से अधिक था, जो साधारणतः उन्हें पुरोहित के रूप में प्राप्त होता था. अतः अप्पलराजू शर्मा ने दक्षिणा के रूप में जितना उचित था, उतना धन रखकर शेष धन को अस्वीकार कर दिया. वर्मा ने भी दी हुई दक्षिणा को वापस लेने से इनकार कर दिया. वे बोले, “एक भले क्षत्रिय कुल में मेरा जन्म हुआ है, अतः मैं दान में दी गई धन राशि वापस नहीं ले सकता. यह विवाद श्री बापन्नार्य तक पहुंचा. ब्राह्मण परिषद् बुलाई गई. परिषद् में श्री बापन्नार्य ने कहा, “अप्पल राजू शर्मा द्वारा अस्वीकार की गई धनराशी जिसे लेना हो, वह ले ले.” अनेक ब्राह्मण इस धन को लेने के लिए आपस में स्पर्धा करने लगे. यह सब देखने में बड़ा ही विचित्र प्रतीत हो रहा था.

तभी पापय्या शास्त्री नामक एक युवा ब्राह्मण ने कहा, “श्रीपाद देवी-अंश युक्त अवतारी पुरुष नहीं हैं. यदि वे ईश्वर होते तो ऐसी परिस्थिति का निर्माण क्यों होता? यदि वे श्री दत्त प्रभु होते तो उन्होंने तो उन्होंने अपने दोनों बंधुओं की विकलांगता से रक्षा क्यों नहीं की? जो भी घटनाएँ घटित हुईं, वे सब कल्पना मात्र हैं. तिल का ताड़ बनाकर वर्णन करना महापाप है. मैं दत्त भक्त हूँ, मैंने अपने गुरु से श्वेतार्क रक्षा भी प्राप्त की है. प्रतिदिन मैं कितना सारा जप करता हूँ. किसी भी प्रकार के दान को स्वीकार करने पर मुझे दोष नहीं लगेगा. मैं इस दान के लिए सर्वथा योग्य हूँ, अतः यह दान मुझे ही मिलना चाहिए.” ब्राह्मण परिषद् ने पापय्या शास्त्री को वह दान देने का निर्णय लिया. वह धन एक अच्छी गाय खरीदने के लिए पर्याप्त था. सभा समाप्त होने पर विजय के मद में पापय्या शास्त्री अपने घर पहुँचा. उसने अपने मामा को देखा. कुशल मंगल पूछने के पश्चात पापय्या शास्त्री ने मामा को भोजन करके जाने की विनती की. “मैं साल भर में एक ही बार भोजन करता हूँ. इस समय भांजे के घर भोजन करना संभव नहीं है,” इतना कहकर मामाजी शीघ्रता से वहां से चले गए.

मामा के जाने के पश्चात पापय्या शास्त्री विचार मग्न बैठे थे. उनकी पत्नी निकट आकर बोली, “स्वामी! अभी-अभी जो आपके मामा आये थे, वे बिलकुल पिछले वर्ष दिवंगत हुए मामा जैसे ही ही दिखाते हैं, है ना?

पापय्या शास्त्री भय से थर्रा उठे. उनके केवल एक ही मामा थे, उनका भी पिछले वर्ष निधन हो गया था. तो अभी जो आए थे, वे कौन से मामा थे? मेरी बुद्धि ये कैसे भ्रम में पड़ गई? मामा जैसे कई अन्य रिश्तेदार तो थे, मगर हूबहू इन मामा जैसा दिखने वाला कोई भी रिश्तेदार न था. कहीं मैंने मृत मामा की आत्मा को तो नहीं देखा? उनके ह्रदय की धड़कन बढ़ती जा रही थी. भूत-प्रेतों, पिशाच्चों से संबंधित मन्त्र-तंत्रों का उन्हें कोई ज्ञान न था. कहीं उनके इष्ट देवता श्री दत्तप्रभू की कृपा तो समाप्त नहीं हो रही है, कहीं निकट भविष्य में मुझ पर कोई कष्ट तो नहीं आने वाला है? मामा जी ने जाते-जाते कहा था, “आशा करता हूँ, कि शीघ्र ही पुनः भेंट होगी.” यह वाक्य बार-बार उनके ह्रदय को डराता रहा. क्या मैं शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होकर मामा जी से मिलने वाला हूँ? इस विचार से उनका मन भारी हो गया. “ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः” इस मन्त्र का जाप उन्होंने आरम्भा किया. उस दिन मन्त्र का जाप भी एकाग्रता से नहीं हो पा रहा था. वह श्री कुक्कुटेश्वर के मंदिर में स्वयंभू दत्तात्रेय के दर्शन हेतु गए. वहां जब दत्तात्रेय की मूर्ती का ध्यान करने बैठे तो ध्यान में शिर-विहीन दत्त मूर्ती उन्हें दिखाई दी. वहां भी जब जाप करने बैठे तो मन एकाग्र न हो पाया. अर्चक ने जब उन्हें प्रसाद दिया तो उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह विष पूरित कलश से निकाल कर दिया हो. पुजारी हँसते-हँसते कुछ कह रहे थे, परन्तु पापय्या शास्त्री को ऐसा सुनाई दे रहा था कि ‘यह प्रसाद ग्रहण करके तुम शीघ्र मृत्यु को प्राप्त हो जाओ.’ वे घर वापस आये तो उन्हें अपनी पत्नी के माथे पर कुंकुम का टीका नहीं दिखाई दिया.

“मेरे जीवित होते हुए कुंकुम का टीका क्यों मिटा दिया?” ऐसा कहते हुए वे पत्नी पर क्रोधित हुए. पत्नी ने सोचा, ‘मेरे माथे पर तो रुपये के सिक्के जितना बड़ा टीका है, फिर ये क्यों कुपित हो रहे हैं!’ उसे पापय्या शास्त्री का व्यवहार विचित्र-सा प्रतीत हुआ. पीठापुरम में अफवाह फ़ैल गई कि पापय्या शास्त्री पागल हो गए हैं. पीठापुरम में अफवाहें ज़रा ज़्यादा ही फैला करती थीं. पापय्या पर मानसिक तथा भूत-प्रेत चिकित्सा की जाने लगी, पापय्या कहे जा रहे थे कि वे पागल नहीं हैं, फिर भी लोग मानने के लिए तैयार नहीं थे. वे समझते कि कभी-कभी पागल व्यक्ति भी तर्कयुक्त बात कर सकता है. तब पापय्या की पत्नी को एक उपाय सूझा. उसे दृढ विश्वास हो गया कि उसके पति ने अज्ञानवश श्रीपाद स्वामी की निंदा की थी, उसी कर्म का फल वे भोग रहे हैं. पाषाण मूर्ती में स्थित ईश्वर की शरण में जाने की अपेक्षा सशरीर श्रीपाद स्वामी की शरण में जाना उसने उचित समझा.

वह श्रीपाद स्वामी के घर गई. उसने बालक श्रीपाद को गोद में उठाकर उन पर वात्सल्य की वर्षा की. आस-पास कोई नहीं है, यह देखकर उसने बालक श्रीपाद को अपनी परिस्थिति बताई. बालक श्रीपाद ने कहा, “मामी! इस सबके लिए एक छोटा-सा उपाय है. तुम मेरी माता के समान हो, इसलिए मैं तुम्हें यह रहस्य बतलाता हूँ. तुम बिलकुल भी समय नष्ट न करते हुए नए घर का निर्माण करो. तुम और मामा वास्तु-पूजा करने के उपरांत नए घर में प्रवेश  करो. फ़ौरन सब कुछ ठीक हो जाएगा.”

श्रीपाद स्वामी की इस प्रकार की आज्ञा होने के पश्चात्त उसने यह कहना आरम्भ कर दिया कि उस पर यह विपदा किराए के घर में रहने के कारण आई है. अतः उसने अपने रिश्तेदारों को विश्वास दिलाया कि उसके लिए शीघ्रातिशीघ्र नए घर का निर्माण किया जाना चाहिए. फिर क्या कहना था! किसी एक रिश्तेदार ने पापय्या को एक जीर्णशीर्ण घर भूदान स्वरूप दिया. तुरंत ही घर की पूरी संपत्ति आदि का विक्रय करके उस जीर्ण घर को गिराकर उसके स्थान पर नए घर का निर्माण आरम्भ हो गया. गृह निर्माण के लिए कुछ ऋण भी लेना पडा. पर्वत शिलाएँ लाई गईं, उसके टुकड़ों का उपयोग घर बनाने में किया गया. नए घर में प्रवेश करने के पश्चात पापय्या शास्त्री भले चंगे हो गए.

“बेटा! शंकर भट्ट! पापय्या की मृत्यु दशा चल रही थी. श्रीपाद स्वामी ने अपमृत्यु के संकट से उसकी रक्षा की. उसे मानसिक कष्ट, अपमान, धन का व्यय आदि कष्ट देकर उसके कर्म का नाश किया. इतना ही नहीं, पापय्या के पाप कर्मों को पाषाण शिलाओं में आकर्षित करके, उन शिलाओं के तुकडे करवाकर पाप कर्मों का नाश किया. कर्म ध्वंस करने के लिए सिद्ध योगी, अवधूत अनेक विविध एवँ विचित्र मार्गों का अवलंबन करते हैं. स्वस्थ्य होने पर पापय्या शास्त्री से बालक श्रीपाद बोले, “ तू कितना मूढ़ है! जिसकी मनःपूर्वक आराधना करता है, वह श्री दत्तात्रेय सशरीर तेरे सामने खड़ा है, फिर भी तू उसे पहचान नहीं पाया. कितना दुर्दैवी है तू. तूने सोचा कि कुक्कुटेश्वर के मंदिर में स्थित पाषाण मूर्ती तेरी रक्षा करेगी. इसलिए तेरे संचित पाप को पाषाण शिलाओं पर केन्द्रित करके, उनके टुकड़े-टुकड़े करवा कर तेरे कर्म फल का मैंने नाश किया. तुझे नया घर बनवा कर दिया. यदि तू इस सशरीर दत्तात्रेय की शरण में आता तो तेरे संचित पाप कर्म इस शरीर पर झेलकर तेरा कर्म क्षय करा देता. भक्तों की जैसी भावना होती है, उसी के अनुसार ईश्वर अनुग्रह करते हैं.”

इस लीला के पश्चात पापय्या को विश्वास हो गया कि श्रीपाद श्रीवल्लभ ही दत्तात्रेय के अवतार हैं.

बालक श्रीपाद की दूध की समस्या को लेकर श्री श्रेष्ठी तथा श्री वर्मा चिंतित थे. इस विषय पर उन्होंने श्रीसत्यऋषीश्वर बापन्नार्य से चर्चा की. उन्होंने कहा, “हे राजर्षि! आप राजा जनक के समान संसार में रहते हुए भी ब्रह्मज्ञानी हैं, ब्रह्मा में लीन हैं. हमारी एक छोटी सी इच्छा है, आप उसे पूर्ण करें.” श्री बापन्नार्य बोले, “जब तक आप लोग अपनी इच्छा व्यक्त नहीं करेंगे, मैं वचन कैसे दे सकता हूँ! निःसंकोच होकर अपनी इच्छा बताएँ. यदि वह धर्मबद्ध हुई तो उसे अवश्य पूरी करूंगा.” श्री श्रेष्ठी बोले, “मैंने श्री वर्मा की गायत्री नामक गौ की संततियों में से एक अत्यंत शुभ लक्षणों से युक्त गाय खरीदी है. हमारे कुल पुरोहित श्री अप्पल राजू शर्मा को वह गाय देने का विचार था. उस गाय का दूध बालक श्रीपाद की सेवा हेतु प्रयुक्त हो, इसके सिवा अन्य कोई इच्छा नहीं है.”

श्री श्रेष्ठी की बात सुनकर श्री बापन्नार्य बोले, “अच्छा! आप ऐसा करें कि वह गाय मेरी गौशाला में बांध दें. मैं वह गाय अप्पल राजू को देने का प्रयत्न करूंगा. शुभलक्षणों वाली गाय का अप्पल राजू के घर में होना दाता एवँ ग्रहीता दोनों के लिए कल्याणकारी है.”

गौमाता को बापन्नार्य के घर लाया गया परन्तु अप्पल राजू ने गोदान ग्रहण करने से इनकार कर दिया.

हिमालय में सतोपथ नामक एक प्रांत है, वहाँ से युधिष्ठिर आदि पांडवों ने स्वर्गारोहण किया था. वहाँ श्री सच्चिदानन्दावधूत नामक महात्मा का वास था. उनकी आयु कई शताब्दियों से अधिक थी. वे कैवल्यश्रुंगी के विश्वेश्वर प्रभु के शिष्य थे. “श्री विश्वेश्वर प्रभु स्वयं पीठिकापुर में श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में हैं और उनके बाल्य रूप का दर्शन लेकर कृतार्थ होना है,” इस प्रकार का आदेश श्री सच्चिदानंद को प्राप्त हुआ. श्री सच्चिदानन्दावधूत पीठिकापुर आये. श्री बापन्नार्य ने आदर पूर्वक उनका स्वागत किया. जब उनके सम्मुख बालक श्रीपाद की दूध की समस्या की चर्चा की गई, तब उन्होंने दृढ़ता से कहा कि अप्पल राज शर्मा को गोदान स्वीकार करना चाहिए. श्रीपाद श्रीवल्लभ साक्षात दत्त प्रभु हैं, और व्यर्थ नियमों के जंजाल में पड़कर उन्हें गोक्षीर अर्पण करने का महद्भाग्य खोना नहीं चाहिए, ऐसा जोर देकर कहा. ब्राह्मण परिषद् ने श्रीपाद श्रीवल्लभ दत्त प्रभु हैं, इस बात का प्रमाण माँगा. अवधूत बोले कि तुम्हें पंचमहाभूतों की साक्षी देता हूँ .

 

श्रीपाद के श्री दत्त होने के बारे में पञ्चमहाभूतों की साक्षी

 

यज्ञारंभ होते ही भूमाता ने साक्षी दी. श्रीपाद श्री दत्त हैं, अतः अप्पल राजू शर्मा को गोदान का स्वीकार करना चाहिए. श्वसुर द्वारा दामाद को प्रेमपूर्वक दी गई वस्तु “दान” नहीं होती, इसलिए सत्यऋषीश्वर श्री श्रेष्ठी से दान ग्रहण करें एवँ इसे भेंट स्वरूप दामाद को दें. यह भूमाता का कथन था.

यज्ञारंभ होने पर, यज्ञस्थल को छोड़कर अन्य सभी स्थानों पर बारिश हो रही थी – यह थी दूसरी साक्षी. यज्ञ के हविर्भाग को स्वीकार करने के लिए स्वयं अग्निदेव आये और गोदान स्वीकार करने में कोई दोष नहीं, ऐसा उन्होंने कहा – यह थी तीसरी साक्षी. यज्ञ मंडप को छोड़कर, अन्य सभी स्थानों पर वायुदेव ने अपना प्रताप दिखाया - यह थी चौथी साक्षी. आकाश से दिव्य वाणी सुनाई दी कि श्रीपाद साक्षात श्री दत्त हैं – यह थी पांचवीं साक्षी.

इस प्रकार पञ्च महाभूतों की साक्षी होने के पश्चात अप्पल राजू ने गोदान स्वीकार किया. गोदान का फल श्री श्रेष्ठी को प्राप्त हुआ. इस कारण, गाय के विक्रय से प्राप्त धनराशि नरसिंह वर्मा ने अप्पल राजू को देने का निर्णय लिया. इस प्रकार पञ्च महाभूतों की उपस्थिति में श्रेष्ठी तथा वर्मा को अपूर्व पुण्य की प्राप्ति हुई.

भविष्य में वायसपुर अग्रहार कोकनद (काकीनाडा) नाम से प्रसिद्ध होगा. श्यामलाम्बापुर (समर्लाकोटा) तथा श्री पीठिकापुर एकत्र होकर महानगर का स्वरूप लेंगे. संसार के सभी देशों के, सभी धर्मों के, सभी पंथों के लोग किसी जन्म में, एक दिन पीठिकापुर आकर श्रीपाद स्वामी के दर्शन करेंगे. श्रीपाद स्वामी का चरित्र संस्कृत भाषा में लिखा जाएगा. “श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत” ग्रन्थ श्रीपाद स्वामी के आशीर्वाद से प्रसिद्ध होगा. भूर्ज पत्र पर लिखे गए ग्रन्थ श्रीपाद स्वामी की आज्ञा से, श्रीपाद स्वामी के जन्म स्थान पर सात आदमियों की गहराई में सुरक्षित रहेंगे. उनके जन्म स्थान पर श्री पादुकाओं की स्थापना तथा मंदिर का निर्माण होगा. श्रीपाद स्वामी को गौदान करने वाले महापुण्यवान वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी वास्तव में धन्य हैं. उनका परिवार सदा धन-धान्य से समृद्ध रहेगा. वे कुछ काल हिरण्य लोक में बिताकर फिर महाराष्ट्र देश में एक ऐश्वर्यशाली वैश्य कुल में जन्म लेंगे. उन्हें नृसिंह सरस्वति अवतार के दर्शन भी होंगे.

बेटा! शंकर भट्ट! गौदान बड़ा शुभप्रद एवँ विशेष होता है. तू अब कुरवपुर को प्रस्थान करने की तैयारी कर. श्रीपाद श्रीवल्लभ सदैव तेरी रक्षा करेंगे.”

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की जय हो।।

Complete Charitramrut

                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...