गुरुवार, 11 अगस्त 2022

अध्याय - ४७

 


।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।। 


अध्याय – ४७


पीठिकापुरम् से पंचदेव पहाड़ ग्राम तक श्रीपाद प्रभु के माता-पिता , नाना-नानी एवँ भक्तगणों का विचित्र प्रयाण

श्रीपाद प्रभु के दरबार में सबको यथेच्छा भोजन मिलता था. अन्नपात्र से चाहे जितना भी अन्न निकालो, उसमें से भोजन कभी समाप्त ही न होता था. यह बड़ा दिव्य आश्चर्य था. सभी प्राणियों के भरपेट भोजन के पश्चात जलचरों को भी यह प्रसाद प्राप्त हो, इस उद्देश्य से भोजनपात्र में बचा हुआ अन्न कृष्णा नदी में छोड़ दिया जाता था.

श्रीपाद प्रभु ने बापन्नाचार्युलु से कहा, “नाना जी, आपने श्री शैल्य पर सावित्री काटक यज्ञ संपन्न करके सूर्य मंडल का तेज शक्तिपात द्वारा आकर्षित किया था. साथ ही, भारद्वाज मुनि ने भी अत्यंत आर्त भाव से प्रार्थना की थी कि मैं अवतार लूँ. उन्हें दिए हुए वचन का पालन करने के लिए मैंने अवतार धारण किया है. ब्रह्म स्वरूप को शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता. मन में भी उसकी कल्पना नहीं की जा सकती.  उस ब्रह्मस्वरूप को केवल दत्तात्रेय प्रभु ही जान सकते हैं. अतः हम उन्हीं के नाम का जयघोष करें. मैं देश एवँ काल पर विजय प्राप्त कर सकता हूँ. मेरी इच्छा के विरुद्ध कुछ हो ही नहीं सकता. मेरी आवश्यकता के अनुसार मैं मेरे मतों-विचारों का आपके मतों-विचारों से तादात्म्य स्थापित कर सकता हूँ. अंतरिक्ष के सभी तारे तथा ग्रह मेरे हाथों के खिलौने हैं. मैंने आपकी हर इच्छा-आकांक्षा पूरी की है. नाना जी, पहले आप जब लाभाद महर्षि, नन्द, भास्कराचार्य थे, तब हर बार मैंने आप पर अनुग्रह किया, अब बापन्नाचार्युलु के रूप में आये हैं, और मैं श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में भाव विभोर होकर आया हूँ. इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात ही नहीं है.”

इसके उपरांत वेंकटप्पा श्रेष्ठी बोले, “हे सोन्या, हे कृष्णा, तुम्हें तो सब कुछ बड़ा आसान लगता है. परन्तु हमें वह असाधारण एवँ रोमांचकारी प्रतीत होता है.”

श्रीपाद प्रभु ने उत्तर दिया, “दादा जी, मैं पूर्ण प्रज्ञ हूँ और प्रत्येक प्राणी को उसके धर्म कर्म के अनुसार फल देता हूँ. मुझसे निकली हुई सूक्ष्मतम किरण भी पृथ्वी सहन नहीं कर सकती. थोड़ी सी कुण्डलिनी जागृत करूँ तो भी आप उसे सहन नहीं कर सकते. इसलिए मैं अपनी ही माया के भीतर अपने आपको सुरक्षित रखता हूँ. आवश्यकता होने पर ही मैं असाधारण कार्य कर सकता हूँ. ऐसा कोई भी वरदान नहीं है, जिसमें मेरी माया न हो. ऐसा कोई भी कार्य नहीं है, जो मैं नहीं कर सकता. आप सबको पीठिकापुरम् से पंचदेवपहाड़ ग्राम तक इतने अल्प समय में लाने का उद्देश्य यही था कि आपको ज्ञात हो जाए कि मैं दत्त प्रभु ही हूँ.”

नरसिंह वर्मा ने कहा, “सब प्राणियों की रक्षा करने वाले एकमेव क्षत्रिय तुम ही हो. बाकी सारे तो नाम मात्र के क्षत्रिय हैं.”  इस पर श्रीपाद प्रभु ने कहा, “ क्षत्रियत्व मेरा चिर स्वभाव ही है. शिवाजी महाराज के नाम से महाराष्ट्र में अवतार लेकर सनातन धर्म की रक्षा करूँ, ऐसी ईश्वरी इच्छा थी. इस इच्छा के अनुसार शिवाजी राजा का अवतार धारण करके महाराष्ट्र में हिन्दवी राज्य की प्रतिष्ठापना करूंगा.”

इस पर नरसिंह वर्मा ने कहा, “सार्वभौम श्रीपाद प्रभु की जय जयकार हो!”

श्रीपाद प्रभु की नानी बोली, “अरे बेटा! तुम्हारे विवाह का समारोह देखने के लिए हमारे नेत्र आतुर हैं. तुम्हारी शादी धूमधाम से होते हुए और तुम्हें भाल पर तिलक लगाए, माथे पर मोती-माला बांधे, सब       श्रृंगारों से सुसज्जित दूल्हे के रूप में हम देखना चाहते हैं.” श्रीपाद प्रभु ने कहा, “नानी! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी. मैं शंबल ग्राम में कल्की अवतार में जन्म लूँगा. उस अवतार में पद्मावती नामक अनघालक्ष्मी से विवाह करूंगा. परन्तु इसके लिए कुछ समय की आवश्यकता है. परन्तु आपकी इच्छा मैं अवश्य पूरी करूंगा.”

वेंकट सुब्बम्मा श्रीपाद प्रभु से बोलीं, “हे कान्हा! मेरे हाथ से तुझे दूध, दही, मलाई, मक्खन खिलाए बहुत दिन हो गए. अपने हाथों से तुम्हें खिलाने की तीव्र इच्छा है.”

 

मायानाटक सूत्रधारी श्रीपाद प्रभु एवँ उनका लीला विनोद

श्रीपाद प्रभु बोले, “नानी, तुम अवश्य खिलाओ. मुझे अपने हाथों से खाने में उकताहट होती है. तुम लोग पीठिकापुरम् से आते हुए दूध, दही, मक्खन लाओगे, यह मुझे ज्ञात हो गया था, परन्तु इतनी दूर की यात्रा में वह खराब न हो जाए, अतः आपके वात्सल्य प्रेम से बंधे हुए, मैंने ऐसी लीला की कि वह सब, जैसा था वैसा, अच्छा ही रहे. नानी, इसके लिए मैंने कितना कष्ट उठाया, क्या बताऊँ! इतनी दूर से अठारह घोड़ागाडियों को पंचदेव पहाड़ तक लाना क्या आसान बात है? मेरा पूरा शरीर दर्द कर रहा है. देखो, मेरे हाथों पर कितने बल पड़ गए हैं.” वास्तव में श्रीपाद प्रभु की हथेलियों पर फोड़े हो गए थे, वेंकट सुब्बम्मा ने अत्यंत मृदु भाव से श्रीपाद प्रभु की हथेलियों पर मक्खन लगाया, और उनके शरीर को गर्म जल से सेंका. सचमुच, माया नाटक सूत्रधारी श्रीपाद प्रभु की लीलाएँ अगम्य थीं.

राजमांबा ने कहा, “हे कृष्णा, तेरी पसंद का हलवा बनाकर चांदी के पात्र में रखकर लाई हूँ. तू मेरे पास आ जा, तुझे खिलाती हूँ.” श्रीपाद प्रभु की तीनों नानी-दादियों ने मिलकर उन्हें वह मधुर हलवा खिलाया, परन्तु उस पात्र का हलवा समाप्त ही नहीं हो रहा था. श्रीपाद प्रभु बड़ी देर तक यह लीला दिखाते रहे. वे नानी से बोले, “आप तीनों के मन में मेरे प्रति अत्यंत प्रेम भाव है. तीनों ने मिलकर मुझ अकेले को ही यदि हलवा खिलाया तो क्या मुझे तकलीफ नहीं होगी?” इसके पश्चात श्रीपाद प्रभु ने अपने हाथों से वह हलवा अपने भाईयों को, बहनों को, जीजाओं को खिलाया. वहाँ आये हुए भाविकों के बीच वेंकय्या नामक एक किसान था. उसे प्रभु ने दीक्षा दी एवँ अपने हाथों से हलवा दिया. बचा हुआ हलवा गाडीवानों एवँ घोड़ों को देने को कहा. चांदी का वह पात्र वेंकय्या को भेंट स्वरूप दिया.

अप्पल राजू शर्मा बोले, “बेटा, तू दत्त प्रभु है, यह समझ न पाने के कारण हमारे हाथों से अनजाने में हुए अपराधों को क्षमा कर.” 

श्रीपाद प्रभु बोले, “तात! आप मेरे पिता हैं. क्या पुत्र पिता को क्षमा करे, ऐसा होता है? आप मुझे पहले ही की भाँति अपना बेटा समझ कर मुझ पर सदा वात्सल्यामृत का सिंचन करें. साथ ही मेरे अभ्युदय की कामना भी करें!”

इस समय श्री वेंकटावधानी एवँ उनकी पत्नी के नेत्रों से अश्रुध्रारा बह रही थी. श्रीपाद प्रभु ने उनसे कहा, “मामा, हमारा संबंध शाश्वत स्वरूप का है. मैं केवल आप ही का नहीं, अपितु आपके वंश में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति का दामाद हूँ. अपनी दिव्य लीलाओं से मैं आपको सुख देता रहूँगा. कल्की अवतार के समय पद्मावती देवी को वधू के रूप में स्वीकार करके आपकी मनोकामना पूरी करूंगा. सुमती महाराणी का दुःख दूर करूंगा. अपने लाडले पुत्र को अन्य सभी पुत्रों के समान दूल्हे के रूप में देखने के स्थान पर वैराग्य ग्रहण किये हुए एक यति के रूप में देखकर वह दुखी हो गई है.”

श्रीपाद प्रभु माता की ओर देखकर बोले, “माँ! तुममें और अनुसूया माता में मुझे कोई अंतर नहीं दिखाई देता. तुम दोनों की मनोकामना मैं कल्की-अवतार में अवश्य पूरी करूंगा.”

श्रीपाद प्रभु आगे बोले, “माँ, तुम्हारे गर्भ से जन्म लेकर मैं कितना महान हो गया हूँ. तुम्हारे वात्सल्यामृत से ही मेरा पालन-पोषण हुआ है. मेरी बहन वासवी ने कितना महान कार्य किया, यह जानती हो ना? जब मुझे भूख लगी थी, तब मुझे एक छोटे शिशु के रूप में परिवर्तित करके अनुसूया माता के पास  दुग्धपान के लिए भेज दिया.”

वेंकय्या ने कहा, “ हे महागुरू! आपके चरणों में एक नम्र प्रार्थना है. आपने जो असंख्य लीलाएँ इस दरबार में की हैं, वह दरबार एवँ उसके आसपास का परिसर विश्व में विख्यात हो जाए.” श्रीपाद प्रभु बोले, “भविष्य में मेरा दरबार एक पक्की इमारत में परिवर्तित होगा. इसमें गोधन भी होगा. वहाँ मेरी कितनी सारी लीलाएँ प्रदर्शित होंगी. मेरे नेत्रों को भविष्य काल का यह अनुभव दिखाई दे रहा है.”

वहाँ एकत्रित सभी भाविक भक्तों को गहरी निद्रा आ गई और कुछ ही क्षणों में मैं, वह सन्यासी, श्रीपाद प्रभु एवँ उनका पूरा दरबार – सभी अदृश्य हो गए. उस सबका क्या हुआ होगा, यह चिंता मुझे सताने लगी. मेरे मन में यह शंका उत्पन्न हुई कि कहीं यह राक्षसी माया तो नहीं? इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “मेरे निकट कोई भी राक्षसी माया चल ही नहीं सकती. मैंने उन सबको सुरक्षित रूप से पीठिकापुरम् पहुँचा दिया है. यह एक महान अनुभूति थी. जो मुझे जिस भाव से भजता है, उसी भाव से मैं उसकी रक्षा करता हूँ. यह मेरा व्रत है. ”

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो.

बुधवार, 10 अगस्त 2022

अध्याय - ४६

 



।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय – ४६


श्रीपाद प्रभु की चरण पादुकाओं पर समर्पित मंत्राक्षता में वृद्धि, पादुकाएं श्री भास्कर पंडित को भेंट में


हम भास्कर पंडित से आज्ञा लेकर चलने को तैयार हुए. भास्कर पंडित कुछ देर ध्यान मग्न रहे. श्रीपाद प्रभु की चरण पादुकाएं भास्कर पंडित ने अपने पूजा घर में रखी थीं. उन चरण पादुकाओं पर चढ़ाए हुए चावल (अक्षता) बढ़ रहे थे. यह देखकर हम आश्चर्यचकित रह गए. भास्कर पंडित बोले, “श्रोताओं! श्रीपाद प्रभु की लीलाएँ अगम्य हैं. श्री पद्मावती माता का जन्म नक्षत्र मृग है, एवँ श्री वेंकटेश्वर प्रभु का जन्म नक्षत्र श्रवण है. उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र पद्मावती माता के लिए मित्र तारा है, जबकि श्री वेंकटेश स्वामी के लिए वह परम मित्र तारा है, अतः उनका लग्न नक्षत्र उत्तरा फाल्गुनी है. आज भी उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है. इस दिव्य नक्षत्र की बेला में श्रीपाद प्रभु की चरण पादुकाओं पर समर्पित मंत्राक्षताओं में वृद्धि हुई है. इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि श्रीपाद प्रभु साक्षात श्री पद्मावती एवँ श्री वेंकटेश स्वरूप ही हैं, यह प्रदर्शित करने के लिए ही उन्होंने यह लीला दिखाई. इनमें से कुछ मंत्राक्षता आप लोग अपने पास रखो. वे आपके लिए मंगलदायक होंगी एवँ श्री प्रभु की कृपा सदा आप पर रहेगी.”

 

शंकर भट्ट तथा धनगुप्त के साथ देश पर्यटन एवँ विविध क्षेत्रों के दर्शन

हमने यात्रा का संकल्प करके बैलगाड़ी से यात्रा आरम्भ की. वह बैलगाड़ी एक बरात की थी. इस बरात के वैश्य प्रमुख घोड़ा गाडी से यात्रा कर रहे थे. वे कोंडविडू गाँव जा रहे थे. वे वैश्यप्रमुख धनगुप्त बोले, “आज बड़ा शुभ दिन है. आपने बैलगाड़ी से यात्रा करके श्रीपाद प्रभु की मंत्राक्षता शादी वाले घर में दीं और फिर हमें भी दीं.” वे आगे बोले, “मैं एक बार व्यापार हेतु पीठिकापुरम् गया था. तब मुझे श्री वेंकटप्पा श्रेष्ठी के घर श्रीपाद प्रभु के दर्शन हुए. उस समय श्रीपाद प्रभु प्रेम से बोले थे, “तेरे पुत्र के विवाह के अवसर पर मैं आशीर्वाद स्वरूप मंत्राक्षता भेज दूँगा. जिससे तुझे मंत्राक्षता प्राप्त होगी, उस ब्राह्मण को दो वराह दक्षिणा के रूप में देना.”

 इसके पश्चात हम कोंडविडू गाँव पहुंचे. वहाँ वैश्य प्रमुख के पुत्र का विवाह बड़े शानदार ढंग से संपन्न हुआ. यहाँ हमारी मुलाक़ात एक हीरे मोतियों के व्यापारी से हुई. धनगुप्त कुछ दिनों तक कोंडविडू में रुके, परन्तु मैं घोडागाडी से विजय वाटिका (वर्त्तमान में विजयवाड़ा) क्षेत्र में आया. इस महाक्षेत्र में कृष्णा नदी है तथा श्री कनक दुर्गा एवँ श्री मल्लेश्वर स्वामी का मंदिर है. कृष्णा नदी में स्नान करके मैंने भगवान के दर्शन किये. देवी के मंदिर में मुझे एक वृद्ध सन्यासी मिले. उन्हें कई दिनों से पीठिकापुरम् जाकर श्रीपाद प्रभु के दर्शन करने की तीव्र इच्छा हो रही थी. विजय वाटिका से निकलकर हम कुछ दिनों में राजमंड्री क्षेत्र में पहुंचे. वहाँ गोदावरी में स्नान करके श्री मार्कंडेश्वर तथा श्री कोटिलिंगेश्वर के दर्शन किये. श्रीपाद प्रभु की कृपा से हमारी यात्रा अत्यंत सुखद हो रही थी. मैंने अपने साथ चल रहे सन्यासी से कहा, “कुछ ही दिनों में हम पीठिकापुरम् पहुँचने वाले हैं. वहाँ श्रीपाद प्रभु का जन्मस्थान देखेंगे. श्री वेंकटप्पा श्रेष्ठी एवँ श्री नरसिंह वर्मा से मिलेंगे. श्रीपाद प्रभु के नानाजी श्री बापन्नाचार्युलु से आशीर्वाद लेंगे. श्रीपाद प्रभु की माता सुमति महाराणी, पिता अप्पलराजू शर्मा से भी मिलेंगे. तदनंतर हम पीठिकापुरम् से कुरुगड्डी जाकर श्रीपाद प्रभु के दर्शन लेंगे.”

सन्यासी अत्यंत प्रसन्न हो गया. मार्ग में अनेक मंदिरों के दर्शन करते हुए हम कुछ ही दिनों में पीठिकापुरम् पहंचे. श्री बापन्नाचार्युलु के घर में हमारी रहने की एवँ खाने-पीने की व्यवस्था की गई. श्रीपाद प्रभु की अनेक बाल लीलाएँ हमने भक्तजनों के मुख से सुनीं. श्रीपाद प्रभु की असंख्य लीलाओं का वर्णन करना सहस्त्रमुखों वाले  शेषनाग के लिए भी कठिन है, वहाँ मेरे जैसे य:कश्चित ब्राह्मण की क्या बिसात?

श्रीपाद प्रभु के भक्तों का कुरुगड्डी को प्रयाण

श्री नरसिंह वर्मा की धर्मपत्नी ने कुरुगड्डी जाकर श्रीपाद प्रभु के दर्शन करने का संकल्प किया. इस सन्दर्भ में उन्होंने श्री वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी एवँ श्री बापन्नाचार्युलु से चर्चा की. सबने एकमत से कुरुगड्डी जाने का निश्चय किया. श्रीपाद प्रभु के माता-पिता, सुमति महाराणी तथा अप्पल राजू शर्मा, अपने पुत्र से मिलने की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे. इन सबने अठारह घोड़ा-गाड़ियों की व्यवस्था की. एक शुभ दिन सब सामान-असबाब सहित घोड़ा-गाडियों से सुबह-सुबह निकल पड़े. पीठिकापुरम् से कुरुगड्डी के बीच अंतर काफी होने से यात्रा कई दिनों तक चलने वाली थी. सुमति महाराणी अपने पुत्र का मुख देखने के लिए उतावली हो रही थीं. पुत्र की याद से माता की आंखें भर आईं. सबने यह कहकर उनका समाधान किया कि अब वे शीघ्र ही श्रीपाद प्रभु से मिलने ही तो वाले हैं.

माता-पिता, नाना-नानी को श्रीपाद प्रभु के पुनः दर्शन

सर्वान्तर्यामी एवँ माया नाटक सूत्रधारी त्रिकालदर्शी श्रीपाद प्रभु को अपने स्थान पर बैठे-बैठे ही पीठिकापुरम् से घोड़ा-गाडियों में आ रहे लोग दिखाई दे रहे थे. प्रातःकाल की निकली हुई गाड़ियां दोपहर के बारह बजे तक चल ही रही थीं. अचानक एक अद्भुत बात हुई. गाडीवानों सहित सभी को ऐसा लगा मानो वे मूर्छित हो गए हैं. उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनकी गाड़ियां आकाश मार्ग से जा रही हैं. कुछ देर के पश्चात मूर्च्छा टूटने पर देखा कि एक अनजान प्रदेश में पहुँच गए हैं. गाडी से नीचे उतर कर हम देखने लगे कि वह कौनसा प्रदेश है. रास्ते से आ रहे एक पथिक से पूछा कि यह कौनसा गाँव है. वह बोला, “महाराज, यह पंचदेव पहाड़ ग्राम है. आज गुरूवार होने के कारण हम श्रीपाद प्रभु के दर्शनों के लिए गए थे. महाप्रभु ने दर्शनों के लिए आए हुए प्रत्येक भक्त से उसका कुशल क्षेम पूछा, और उनकी व्याधियां दूर कीं. दर्शनाभिलाषियों के भोजन की व्यवस्था अत्यंत उत्तम थी.” इतना कहकर वह पथिक अपने मार्ग पर चला गया. हम प्रात:काल पीठिकापुरम् से घोड़ा-गाडी से निकले थे. इस समय दोपहर के साढ़े बारह बजे थे......इतने कम समय में हम यहाँ पर कैसे पहुँच गए इसका हमें महान आश्चर्य हो रहा था. हमने नौका से नदी पार करके कुरुगड्डी ग्राम में प्रवेश किया. यह स्वप्न है या सत्य है, इस बारे में हम भ्रमित हो गए. परन्तु यह सत्य ही था. हम सब प्रभु के दरबार में गए. सुमति माता ने श्रीपाद प्रभु को बड़े वात्सल्य से अपने ह्रदय से लगाया. उनके नेत्रों से आनंदाश्रु बह रहे थे, जो श्रीपाद प्रभु की पीठ पर गिर रहे थे. श्रीपाद प्रभु बोले, “माँ, तुम निर्गुण, निराकार ऐसे परतत्व के पुत्र की माता हो. तुम अनुसूया माता के सामान पतिव्रता शिरोमणी हो.” इतना कहकर उन्होंने अपने हाथ से माता के अश्रु पोंछे.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

सोमवार, 8 अगस्त 2022

अध्याय - ४५

 

 

 ।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय ४५


श्री हनुमान को पृथ्वी पर अवतार लेने की आज्ञा –

काशी क्षेत्र में श्रीपाद प्रभु की लीलाएँ.

श्री भास्कर पंडित के घर में हमने दोपहर का भोजन किया. उसके बाद उन्होंने कहना आरम्भ किया. वे बोले, “ श्रोताओं! श्रीपाद प्रभु की लीलाएँ अतर्क्य हैं. उन्होंने काशी में अनेक महापुरुषों को आशीर्वाद दिए. उन्हें इच्छित सिद्धियों की प्राप्ति करवाई. वे ऋषियों के समूह को संबोधित करते हुए बोले, “मैं नृसिंह सरस्वती के नाम से एक और अवतार धारण करने वाला हूँ. पीठिकापुरम् में अदृश्य होकर काशी क्षेत्र में आने का मुख्य कारण यह है कि यह एक महापुण्य क्षेत्र है. सिद्ध संकल्प की यहाँ पूर्ती होती है. प्रतिदिन गंगा स्नान के लिए मैं योग मार्ग से आता हूँ. नृसिंह सरस्वती के अवतार में मैं यहीं पर संन्यास दीक्षा ग्रहण करने वाला हूँ. आगामी शताब्दी में क्रिया योग का ज्ञान पाने के इच्छुक गृहस्थाश्रमी लोगों को विद्या प्रदान करने के उद्देश्य से श्यामाचरण नामक साधक को यहाँ काशी में जन्म लेने का आदेश दे रहा हूँ. आने वाले युग में हनुमान को श्यामाचरण से क्रिया योग का ज्ञान प्राप्त करने के लिए कहा है. यह वचन त्रिवार सत्य है.”

 

हनुमान को सीता, राम, लक्ष्मण एवँ भारत के दर्शन

तभी श्रीपाद प्रभु ऋषि-समुदाय सहित योग मार्ग का अनुसरण करते हुए बद्रिका वन में आ पहुंचे. वहाँ उन्होंने नर-नारायण गुफा में अनेक शिष्यों को क्रिया योग की दीक्षा दी. वहाँ से बारह कोस दूर स्थित उर्वशी कुंड के निकट वे आए. ऋषि-गंगा में भी उन्होंने स्नान किया. पाँच हज़ार वर्षों से तपस्या कर रहे सर्वेश्वरानंद नामक महायोगी को श्रीपाद प्रभु ने आशीर्वाद दिया. वहाँ से वे नेपाल गए. वहाँ एक पर्वत पर राम-नाम में ध्यान मग्न हनुमान को एक साथ श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत एवँ शत्रुघ्न के दर्शन श्रीपाद प्रभु ने करवाए. वे हनुमान से बोले, “हे हनुमंत, तुमने राम-नाम का कितने करोड़ की संख्या में जाप किया है, इसका अनुमान करना असंभव हो गया है. इतने अल्प काल में तुमने राम-नाम का इतनी महान संख्या में जाप किया है कि चित्रगुप्त के लिए भी उसका हिसाब रखना असंभव हो गया है. इसी जाप के कारण तुम चिरंजीवी पद को प्राप्त हो गए हो. तुम कालातीत हो. तुम्हारी आयु कितने लाख वर्षों की है, यह लिखना चित्रगुप्त के लिए भी असंभव है. तुम कलियुग में अवतार लो, जितेन्द्रिय होकर सबके लिए वन्दनीय हो जाओ.”

 

राम-बीज महिमा

इस पर हनुमान ने कहा, “प्रभु, राम-बीज अग्नि-बीज ही है. इसीके कारण मुझे अग्नि सिद्धि प्राप्त हुई है. मैं देह-बुद्धि से आपका अंश हूँ. आत्मा-बुद्धि से मैं आप ही का स्वरूप हो गया हूँ. मैं किस स्वरूप में अवतार लूं, कृपया यह मुझे बताएँ.”

श्रीपाद प्रभु मंद-मद मुस्कुराते हुए बोले, “तुम शिवांश रूप के राम भक्त हो. अरबी भाषा में ‘अल्’ से तात्पर्य है – ‘शक्ति एवँ ‘अहा का अर्थ है – “उस शक्ति को धारण करने वाला”. इसलिए “अल्लाह” का तात्पर्य है “शिव शक्ति स्वरूप!” इतने वर्षों तक सीतापति के रूप में मेरी सेवा की, अब यवन जाति के लोगों को स्वीकार्य ऐसे शिवशक्ति स्वरूप ‘अल्लाह के नाम से मेरी आराधना करो.”

इस पर हनुमान ने कहा, “प्रभु, मुझे यह ज्ञात था कि भारद्वाज ऋषि त्रेता युग में पीठिकापुरम् में ‘सावित्री काठक यज्ञ करने वाले थे. उस समय आपने यह वर दिया था कि आप भारद्वाज गोत्र में जन्म लेने वाले हैं. अतः मैं तो किसी भी परिस्थिति में आपको छोड़कर नहीं रह सकता. आपका और मेरा गोत्र एक ही है. इस कारण से मैं आपका पुत्र ही हुआ ना?

 

श्रीपाद प्रभु एवँ हनुमान के बीच संवाद

 

इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “बालक, हनुमान, तेरे द्वारा धारण किया गया यह देह भारद्वाज गोत्र का है.” हनुमान ने पूछा, “”अल्ला मालिक” से “अल्ला ही सबका मालिक है, यही हुआ ना?” श्रीपाद प्रभु ने बड़े प्रेम से हनुमान का आलिंगन किया और बोले, “ हनुमान, तू देह बुद्धि छोड़ दे. तू मेरा ही अंश है.”

“प्रभो, मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं आप ही का अंश हूँ>” हनुमान ने उत्तर दिया. “मैं इस भूमि पर आपका कार्य करने के पश्चात जब मूल तत्व में विलीन हो जाऊंगा, तब अंश अवतार भी पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा. अंश अवतार में मूल तत्व निरंतर मेरे साथ ही रहेंगे. जब उन तत्वों का विकास होगा, तब अपनी शक्ति संपदा एवँ मूल तत्वों से मुझे संभाले रखना.” इस पर श्रीपाद प्रभु ने कहा, “अरे, हनुमान, तू अत्यंत बुद्धिमान है. जो शक्तियां मेरी हैं, वे तुम्हारी भी हैं. मैं नृसिंह सरस्वती के अवतार में श्री शैल्यम के निकट स्थित कर्दली वन में तीन सौ वर्षों तक गुप्त रूप से योग समाधि में रहूँगा. इसके पश्चात प्रज्ञापुर (वर्त्तमान में अक्कलकोट) में स्वामी समर्थ के नाम से प्रसिद्ध होऊँगा. इस अवतार को समाप्त करते समय साईं रूप में तुझमें अवतरित होऊँगा. मैं स्पष्ट रूप से यह कहता हूँ कि मेरा अवतार तेरे स्वरूप में प्रकट होगा. उस समय तू एक समर्थ सद्गुरू के अवतार में विख्यात होगा.

इसके पश्चात हनुमान ने कहा, “प्रभु, मैं आपका सेवक. “अल्ला मालिक है!” ऐसा कहते हुए संचार करूंगा, जीवत्व बुद्धि के अनुसार मैं आपका अंश होते हुए भी आपके समान व्यवहार न कर पाऊंगा. आपके श्री चरण प्रत्यक्ष दत्त प्रभु ही हैं. आपमें और मुझमें अंतर कैसे हो सकता है? जब मैं आपके       
स्वरूप में
, तथा आप मेरे स्वरूप में परिवर्तित हो जाएंगे, तब हमारे बीच अद्वैत सिद्ध होगा. इसलिए आप मुझे श्री दत्त प्रभु की सायुज्यता का प्रसाद दें.”

श्रीपाद प्रभु ने काल पुरुष को अपने पास आने की आज्ञा दी. कालपुरुष हाथ जोड़कर श्रीपाद प्रभु के सम्मुख खडा हो गया. तब श्रीपाद प्रभु ने कहा, “हे कालपुरुष! यह हनुमान कालातीत है. मैंने इसे प्रसाद स्वरूप अपनी सायुज्यता दी है. इसे ‘नाथ का संबोधन देता हूँ. अब से यह साईंनाथ के नाम से संबोधित किया जाएगा. चलो, आज दत्त जयन्ती का आयोजन करते हैं.”

हनुमान का चैतन्य दत्त स्वरूप में प्रकट हुआ यह देखकर ऋषि समुदाय श्रीपाद प्रभु की ओर आश्चर्य से देखने लगा. तभी हनुमान के शरीर के जीवाणुओं का विघटन हुआ. उनमें से अनुसूया माता प्रकट हुईं. वे श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु को देखकर बोलीं, “बेटा, कृष्णा! तू कितना बढ़िया बालक है. जब मैंने तुझे जन्म दिया, उस समय साधारणतः माँ को होने वाली प्रसव वेदना मुझे नहीं हुई. माँ के लिए वह वेदना भी सुखदायक है. उसमें एक माधुर्य की अनुभूति होती है. परन्तु तेरे जन्म के समय मैं इस सुख से वंचित रही. क्या तू मेरे उदर में दुबारा जन्म नहीं लेगा? तेरी यह वैष्णवी माया मेरी समझ से परे है.? इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “हे माँ! पुत्र को माँ की धर्मबद्ध इच्छा पूरी करनी ही चाहिए. तेरे गर्भ से प्रकट हुआ यह हनुमान है. इसे मेरी सायुज्य स्थिति प्रदान कर दी है. दूसरे शब्दों में कहें तो अपनी माया से मैं तुम्हारे उदार से दुबारा जन्म ले रहा हूँ. थोड़ी ही देर में तुम्हें तीव्र प्रसव वेदना का अनुभव होगा.”

अनुसूया माता ने तीन शिरों वाली दत्त मूर्ति को जन्म दिया. कुछ ही देर में वह मूर्ति अंतर्धान हो गई, एवँ अनुसूया माता की गोद में एक शिशु प्रकट हुआ. उस नवजात शिशु को अनुसूया देवी ने स्तनपान कराया. इस घटना के कुछ ही देर के पश्चात हनुमान का स्वरूप दिखाई दिया. उनके सम्मुख श्री रामचंद्र प्रभु खड़े थे. इसके बाद हनुमान ने कहा, “म्लेच्छ धर्म के उत्तम तत्व तथा सनातन धर्म के उत्तम तत्वों का समन्वय करने का मैं प्रयत्न करूंगा. म्लेच्छ लोगों का भी कोइ गुरू होना चाहिए ना?

श्रीपाद प्रभु ने उत्तर दिया, “महबूब सुभानी नामक एक महाज्ञानी मुझमें समाया हुआ है. वह वारिफ अलिफ के नाम से अवतरित होगा. वह तुम्हारा गुरू बनकर योग रहस्य का ज्ञान तुम्हें देगा. क्रिया योग का ज्ञान शामाचरण नामक गुरू देंगे, उनसे तुम्हें इच्छित वर प्राप्त होंगे,          

 

माणिक प्रभु का अवतार

 

हनुमान ने कहा, “प्रभु, मैंने सूना था कि आप पद्मावती-व्यंकटेश स्वरूप हैं. आपकी आराधना जानने वाले वैष्णव स्वामी को भी आपका अनुग्रह प्राप्त हुआ.”

तब श्रीपाद प्रभु ने कहा, “निरंतर मेरा स्मरण करके अपने मन को सदैव मेरे चैतन्य रूप में लीन करो. मैं तुम्हें वर देता हूँ कि गोपाल राव नामक महावैष्णव तुम्हारे गुरू होंगे. वे श्री वेंकटेश्वर के भक्त होकर व्यंकन्ना के नाम से प्रसिद्ध होंगे. उनके महाप्रयाण के पश्चात उनकी अस्थियाँ एक मिट्टी के पात्र में रखकर ज़मीन के अन्दर कुछ समय तक सुरक्षित रखना. मेरी सूचना मिलने पर तुम वह पात्र खोलकर देखना, उसमें वेंकटेश की मूर्ति दिखाई देगी. उस मूर्ति की तुम पूजा करना. मैं प्रसन्न होकर तुम्हें इच्छित वर प्रदान करूंगा.” तब हनुमान ने जानकी माता से कहा, “माता, आपने मुझे अत्यंत प्रेम एवँ वात्सल्य भाव से एक माणिक मोतियों का हार दिया था. उन मोतियों में प्रभु श्री राम को ढूँढने के लिए मैंने उन मोतियों को पत्थर से तोडा, परन्तु उनमें श्री राम प्रभु दिखाई नहीं दिए, इसलिए मैंने उस हार को फेंक दिया. उस महान अपराध के लिए मुझे क्षमा प्रदान करें.” श्रीपाद प्रभु ने इस पर कहा, “ईश्वर के सान्निध्य के बगैर कोई भी कार्य पूर्ण नहीं होता. माणिक मोतियों का वह हार मैंने सुरक्षित रखा है. वह हार दत्त स्वरूप है, इसमें कोइ संदेह नहीं. मेरी आत्मज्योति से मैंने उस हार में प्राण डाल दिए हैं. वह माणिक हार गुरूस्वरूप के दिव्य तेज से दमक रहा था. वह गुरू स्वरूप माणिक प्रभु के स्वरूप में प्रकट होगा”  

श्रीपाद श्रीवल्लभ बद्रीनाथ क्षेत्र के नारायण स्वरूप हैं. वे पुनः मानव देह धारण करने वाले हैं, परन्तु उनका नाम व रूप किस प्रकार का होगा यह कोई भी नहीं जान सकता.

 

श्रीपाद प्रभु का द्रोणागिरी पर्वत के निकट शंबलगिरी ग्राम में निवास

 

श्रीपाद प्रभु के मामा वेंकटावधानी महाराज विद्यार्थियों को वेदों की शिक्षा दिया करते थे. उस स्थान के निकट ही एक नारियल का वृक्ष था. वेद पाठशाला के दिव्य परिसर में एक वानर वेदाध्ययन की और आकर्षित हुआ. वह वानर पेड़ के नारियल को न तोड़ता, किसी अन्य वस्तु को भी हाथ न लगाता. बस, चुपचाप बड़े श्रद्धाभाव से पेड़ पर बैठकर पाठ का श्रवण करता. श्रीपाद प्रभु ने बड़े भोलेपन से पूछा, “मामा, भगवान के अवतार के समान क्या नारियल के पेड़ का भी अवतार होता है?

“कृष्णा, यह कैसा प्रश्न पूछ रहे हो? प्रश्न का भी कुछ अर्थ होना चाहिए.”

इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “वो बात नहीं, मामा. पेड़ों पर फल लगते हैं. उस फल के बीज से फिर नए वृक्ष की उत्पत्ति होती है. इस प्रकार बीज से वृक्ष एवँ वृक्ष से पुनः बीज के निर्माण की प्रक्रिया निरंतर चलती ही रहती है.”

इतने पर ही वार्तालाप रुक गया. उसी समय उनकी बगल में खड़े वृक्ष से एक बड़ा नारियल नीचे गिरा. उस नारियल को श्रीपाद प्रभु ने अपने हाथ में लिया. उस वानर की ओर देखकर श्रीपाद प्रभु ने कहा, “तुझे खाली हाथ भेजना मैंने योग्य नहीं समझा. मेरे हाथों से तुझे प्रसाद स्वरूप यह नारियल दे रहा हूँ.” श्रीपाद प्रभु ने वह नारियल उस वानर के हाथों में देकर प्रेम से उसकी पीठ सहलाई और बोले, “तू मुझसे और नारियल मत मांगना, यदि यह स्वीकार है, तभी मैं यह नारियल ले जाने दूँगा.”

वानर ने सहमति से सिर हिलाया और नारियल लेकर प्रसन्नता से वहाँ से चला गया. वह वानर कौन था? श्रीपाद प्रभु ने उसे नारियल क्यों दिया? एक और नारियल नहीं दूँगा, ऐसा उन्होंने क्यों कहा? बिना कोई प्रयत्न किये नारियल नीचे कैसे गिरा? किसके लिए गिरा? इन सब प्रश्नों के उत्तर कौन दे सकता है? श्रीपाद प्रभु की लीला अद्भुत्, अगम्य एवँ अनाकलनीय है, यही सत्य है.

श्रीपाद प्रभु द्रोणागिरी नामक संजीवनी पर्वत पर गए. कुछ दिन वहाँ के ऋषि-मुनियों के समुदाय के साथ प्रसन्नता पूर्वक रहे. वहाँ उपस्थित महायोगियों को अनुग्रह प्रदान कर कृतार्थ किया. वहाँ से वे उस गाँव में गए जहाँ श्री कल्कि प्रभु का जन्म होने वाला है. उस प्रदेश को महायोगियों ने भी नहीं देखा है. हिमालय में हज़ारों वर्षों से तपस्या करने वाले महापुरुष इस ग्राम में हैं. संबल गाँव के पर्वत के शुद्ध जल का श्री प्रभु ने प्राशन किया. उस जल की यह महिमा है कि उसे पीने वाले की आयु बढ़ती नहीं है. इसी कारण श्रीपाद प्रभु की आकृति हमेशा सोलह वर्षीय कुमार जैसी ही रही. आयु के अनुसार उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ.

 

श्रीपाद प्रभु का गोकर्ण क्षेत्र से दिव्य लोक को प्रयाण

तत्पश्चात श्रीपाद प्रभु अनेक दिव्य स्थलों पर जाते हुए, साधकों, भक्तों, महापुरुषों को अनुग्रह प्रदान करते हुए गोकर्ण महाबलेश्वर क्षेत्र में पहुंचे. इस क्षेत्र में प्रभु तीन वर्षों तक रहे. इस पूण्य क्षेत्र में उन्होंने अनेक लीलाओं का प्रदर्शन किया, परन्तु उनका वर्णन करना नितांत असंभव है. गोकर्ण क्षेत्र से श्रीपाद प्रभु श्री शैल्य क्षेत्र में पधारे. श्री बापन्नाचार्युलु ने वहाँ एक महायज्ञ किया था. इस यज्ञ के परिणाम स्वरूप ही श्रीपाद प्रभु का अवतार हुआ.

श्रीपाद प्रभु योगमार्ग से  महा अग्निगोल के समान तप्त लाल होकर सूर्य मंडल गए. वहाँ से ध्रुव नक्षत्र से, सप्त ऋषिमंडल से, आर्द्रा नक्षत्र में घूम कर चार मास पश्चात श्री शैल्य क्षेत्र में वापस लौटे. उनके साथ उस नक्षत्र पर वास करने वाले महर्षि अत्यंत नूतन योग सीखने के लिए आए. श्री शैल्य के सिद्ध पुरुषों की, ऋषियों की एक सभा आयोजित करके सब ऋषियों को, दूसरे ग्रह से आये हुए ऋषियों को उस नूतन महायोग का, सिद्धयोग का बोध कराया. उस ज्ञान से सब ऋषि, मुनिगण अत्यंत प्रसन्न हो गए. इस ज्ञानामृत प्राशन के उपरांत आर्द्रा नक्षत्र के ऋषि अपने स्थान को लौट गए. श्रीपाद प्रभु कुछ दिनों के बाद श्री शैल्य से पवित्र क्षेत्र कुरुगड्डी आए.  

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जी जयकार हो।।

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                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...