गुरुवार, 10 मार्च 2022

अध्याय -४

 

“श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये”

 

अध्याय ४


कुरवपुर में वासवाम्बिका के दर्शन

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के जन्म स्थान में होने वाली लीलाएँ


श्री पळनीस्वामी की आज्ञानुसार हमने ध्यान धारणा का संकल्प किया. श्री पळनीस्वामी बोले, “वत्स, माधव! वत्स शंकर! हम तीनों श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की आज्ञानुसार ध्यानमग्न हो जाएँ और तत्पश्चात अपने-अपने अनुभवों की चर्चा करें. इस अवस्था में हमें किसी उत्कृष्ट आध्यात्मिक परिणाम का अनुभव होगा. भविष्य में हूण शक (ईस्वी सन्) का प्रचलन होगा. हूण शकानुसार आज दिनांक २५-५-१३३६ है. शुक्रवार है. आज का दिन हमारे जीवन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण दिन है. मैं अपने स्थूल शरीर को यहीं छोड़ कर सूक्ष्म शरीर से कुरवपुर जाऊँगा. एक ही समय में चार-पाँच स्थानों पर सूक्ष्म शरीर से विहार करना मेरे लिए बाल्य-क्रीडा के सामान है. हम सभी जब श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के ध्यान में मग्न होंगे, तब उनकी आज्ञा होने पर मैं सूक्ष्म शरीर से कुरवपुर में उनके सान्निध्य में जाऊँगा.

 

स्वामी की कृपा प्राप्त करने का विधान (विधि)

श्री पळनीस्वामी का कथन सुनकर मुझे अचम्भा हुआ, अतः मैंने पूछा, “माधव ने श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दिव्य मंगल स्वरूप के दर्शन किये हैं. आप सदा श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के साथ सूक्ष्म रूप में विचरण करते हैं, मगर मुझे तो केवल उनका नाम मात्र ही ज्ञात है. तब मैं ध्यान मग्न किस प्रकार होऊँ?” इस पर श्री पळनीस्वामी मंद हास्य करते हुए बोले, “वत्स! श्रीपाद स्वामी की भक्ति यदि ह्रदय में हो तो सब कुछ सिद्ध होगा. श्रीपाद प्रभु सबसे पहले अपने भक्त का कछुए के पिल्ले के समान पालन करते हैं. कछुआ अपने पिल्ले से चाहे कितना ही दूर रहे फिर भी उसकी विचार तरंगों से ही पिल्लों की रक्षा होती है. थोड़ी उन्नति होने के पश्चात् वे बिल्ली के पिल्ले के समान अपने भक्त का पालन करते हैं. जिस प्रकार बिल्ली अपने पिल्लों को मुख में पकड़कर एक घर से दूसरे घर ले जाती है, जो स्थान नन्हें पिल्लों के लिए सुरक्षित प्रतीत हो, वही उन्हें रखती है. उसके पश्चात् बन्दर के पिल्लों के समान भक्तों का पालन होता है. इस प्रकार के पालन में पिल्ला अति प्रयत्न से अपनी माँ से चिपक कर बैठा रहता है. और अधिक उन्नति होने पर मछली के पिल्लों के समान पालन होता है, जहाँ माँ के साथ स्वेच्छा एवँ आनंद पूर्वक विहार करने वाले मछली के पिल्लों के समान ही भक्त गण भी श्री गुरू के साथ-साथ रहते हैं. जब तुम ध्यानावस्था में जाओगे, तब वे ही दर्शन देंगे. आज दिनांक २५-५-१३३६, शुक्रवार सभी शुभ योगों का संगम हो रहा है. आज का संपूर्ण दिन उत्तम दिन है.

श्रीपाद स्वामी ने अत्यंत महत्वपूर्ण भविष्य निर्णय करने का निश्चय करके मुझे कुरवपुर आने की आज्ञा दी है. ध्यानमग्न अवस्था में जैसे ही उनकी आज्ञा होगी, उसी क्षण मैं कुरवपुर चला जाऊँगा. वहाँ कोई महत्त्वपूर्ण घटना घटने वाली है. श्री दत्त प्रभु की कृपा से उसे अपने नेत्रों से देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त होने वाला है,” ऐसा कहते हुए श्री पळनीस्वामी ध्यानस्थ हो गए. मैं और माधव भी ध्यान मग्न हो गए.

इस प्रकार ध्यानावस्था में दस घंटे बीत गए. ध्यान के पश्चात् श्री पळनीस्वामी अत्यंत उल्हासित प्रतीत हो रहे थे. मैंने और माधव ने उनसे प्रार्थना की कि वे अपनी ध्यानानुभूति के बारे में बताएँ. इस पर स्वामी ने मुस्कुराते हुए कहना आरम्भ किया.               

          

शिव शर्मा की कथा – श्रीपाद श्रीवल्लभ के चिंतन का फल

 

उन्होंने कहा, “इस कलियुग के लोगों का कितना महत् भाग्य है! कुरवपुर गाँव बहुत छोटा था, फिर भी स्वामी की महिमा को जानकर वेद पंडित सद्ब्राह्मण शिवशर्मा अपनी भार्या अंबिका के साथ कुरवपुर में ही रहते थे. कुरवपुर में केवल यही एक ब्राह्मण कुटुंब था. वे प्रतिदिन द्वीप पार करके ब्राह्मणोचित कार्यों से धनार्जन करके कुरवपुर वापस लौटते. वे बड़े भारी विद्वान पंडित थे. वे अनुष्ठानी, काश्यप गोत्र में उत्पन्न यजुर्वेदीय ब्राह्मण थे. शिव शर्मा की सन्तान अल्पकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती थी. जैसे-तैसे एक बालक जीवित रहा, परन्तु दुर्भाग्य से वह मंदबुद्धि था. इस प्रकार की निष्प्रयोजक संतान प्राप्ति से शिव शर्मा दुखी रहते थे.

एक दिन श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के सामने वेदपठन करने के पश्चात् वे मौन खड़े रहे. श्री स्वामी ने उनका मनोगत पहचान कर मंद हास्य करते हुए कहा, “शिव शर्मा! अन्य सभी चिंताएँ छोड़कर निरंतर मेरा ही मनन. -चिंतन करने वालों का मैं दास हूँ . तुम्हारी इच्छा क्या है, कहो.”

इस पर शिव शर्मा बोले, “स्वामी, मेरा पुत्र मुझसे भी बड़ा पंडित वक्ता हो, ऐसी मेरी इच्छा थी. परन्तु वह पूरी तरह मिट्टी में मिल गई. मेरा पुत्र अत्यंत मतिमंद है. सभी चराचरों में, घर-घर में व्याप्त, अत्यंत सामर्थ्यवान आपके लिए उसे पंडित बनाना, निष्ठावान बनाना किंचित भी कठिन नहीं है. मुझ पर इतनी कृपा करें.”   

इस पर श्रीपाद श्रीवल्लभ बोले, “वत्स! कोई चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, पूर्वजन्म के कर्मफल को भोगना उसके लिए अनिवार्य है. समूची सृष्टि भी शासन का उल्लंघन न करते हुए चलती रहती है. स्त्रियों को पूजन के फलस्वरूप पति की प्राप्ति होती है. दान के फलस्वरूप संतान प्राप्ति होती है. दान सदा सत्पात्र को देना चाहिए. यदि दान ग्रहण करने वाला सत्पात्र न हो तो अनिष्ट की आशंका ही संभव है. सद्बुद्धियुक्त व्यक्ति को अन्नदान देने से उसके द्वारा किये गए पूण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले पुण्य का कुछ अंश अन्नदाता को मिलता है. दुर्बुद्ध व्यक्ति को अन्नदान देने से उसके द्वारा किये गए पाप कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त पापों का कुछ अंश अन्नदाता को प्राप्त होता है. दान देते समय अहंकार रहित होकर दान करें, तभी उसका उत्तम फल प्राप्त होगा. पूर्व जन्म के कर्मफलानुसार ही तुम्हें मंदबुद्धि पुत्र की प्राप्ति हुई. तुम दंपत्ति ने अल्पायुषी नहीं, अपितु पूर्णायुषी संतान ही दें, ऐसी विनती की थी. पूर्णायुषी पुत्र तुम्हें दिया गया. उसे पूर्वजन्म के पाप का निवारण करके योग्य पंडित बनाने के लिए, कर्मसूत्र का अनुसरण करते हुए, यदि तुम देह त्याग करने को तैयार हो, तो मैं उसे योग्य पंडित बनाऊँगा.” इस पर शिवशर्मा बोले, “स्वामी, वैसे भी मैं वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुका हूँ. मैं अपना जीवन त्यागने के लिए तैयार हूँ. मेरा बालक यदि बृहस्पति के समान पंडित, वक्ता हो जाए, तो मुझे और क्या चाहिए?” संपूर्ण चराचर में, घटघट में व्याप्त सामर्थ्यवान श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी बोले, “ठीक है, तुम शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होगे. मृत्योपरांत सूक्ष्म देह में धीशिला नगरी (वर्त्तमान शिरडी) में नीम के वृक्ष के नीचे स्थित भूगृह में कुछ काल तक तपश्चर्यारत रहोगे. तत्पश्चात पुण्य भूमि महाराष्ट्र देश में जन्म लोगे. इस विषय की अपनी पत्नी से ज़रा भी चर्चा न करना.”

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के भावी जन्म का निर्धारण

   शीघ्र ही शिव शर्मा की मृत्यु हो गई. अंबिका अपने पुत्र के साथ भिक्षाटन करके काल क्रमण कर रही थी. आसपास के लोग उन पर हँसते, उनका मज़ाक उड़ाते, इस सबका कोई अंत ही नहीं था. जब यह अपमान असह्य हो गया तो वह मतिमंद बालक आत्महत्या करने के लिए नदी की और भागा. उसकी माँ भी असहाय होकर आत्महत्या करने के लिए पुत्र के पीछे भागी. उसके पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से मार्ग में श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दर्शन हुए. उन्होंने इन दोनों को आत्महत्या के प्रयत्न से परावृत्त किया. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने अपने अपार करुणामय कटाक्ष से उस मूर्ख बालक को महापंडित बना दिया. अंबिका को आदेश दिया कि वह अपना शेष जीवन शिव पूजन में व्यतीत करे. शनिप्रदोष व्रत की महिमा बताकर, प्रदोष काल में किये गए शिवपूजन करने से किस प्रकार की फल प्राप्ति होती है, इसकी विस्तृत जानकारी उसे दी. अंबिका को आशीर्वाद दिया कि अगले जन्म में उसे “मेरे जैसा पुत्र प्राप्त होगा.” परन्तु उनके जैसा इन तीनों लोकों में कोई अन्य न होने के कारण श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने अगले जन्म में उसके पुत्र के रूप में जन्म लेने का निश्चय किया.

 

नृसिंह सरस्वति एवं स्वामी समर्थ के जन्म का संकल्प

समस्त कल्याणकारी गुणों से युक्त वासवाम्बिका से श्रीपाद प्रभु ने कहा, “तुम्हारा संकल्प पूर्ण होगा. मैं और चौदह वर्षा तक, अर्थात् जब तक यह शरीर ३० वर्ष की आयु प्राप्त करता है, तब तक श्रीपाद श्रीवल्लभ के ही रूप में रहकर फिर गुप्त हो जाऊंगा. तत्पश्चात् सन्यास धर्म के उद्धार हेतु नृसिंह सरस्वति नाम से अवतार लूंगा. इस अवतार की समाप्ति के पश्चात् कर्दली-वन में ३०० वर्षों तक तपश्चर्यारत रहकर प्रज्ञापुर (अक्कल कोट) में स्वामी समर्थ के नाम से अवतार धारण करूंगा. अवधूत अवस्था में, सिद्ध पुरुषों के रूप में, अपरिमित दिव्य कांति से युक्त होकर, अगाध लीलाएँ दिखाऊँगा. सभी लोगों की धर्मं-कर्म के प्रति आसक्ति बढ़ाऊँगा.

श्री पळनीस्वामी आगे बोले, “जैसे-जैसे युग परिवर्तन होगा, वैसे-वैसे मानव की शक्ति कम होती जायेगी. अतः ऋषीश्वरों की इच्छानुसार मानव कल्याण के लिए परतत्व निचले स्तर पर आयेगा. शरीरधारी प्रभु का अवतार संपूर्ण अनुग्रह का संकेत है, इस प्रकार प्रभु-तत्व निचले स्तर पर आने के फलस्वरूप अल्प श्रम से ही मानव को उत्तम फल प्राप्त होगा. इसीलिये कलियुगीन मानव धन्य है. उसे केवल स्मरण मात्र से ही श्री दत्तप्रभू का अनुग्रह प्राप्त होगा. मानवीय पतन के जितने मार्ग हैं, श्री चरणों का अनुग्रह प्राप्त करने के उससे भी कहीं अधिक, असंख्य मार्ग हैं. यही परम सत्य है. स्मरण, पूजन करने से श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु से संपर्क स्थापित होता है. इसके परिणाम स्वरूप साधक के पापकर्म, दोष, विषय वासना, संस्कार श्रीपाद श्रीवल्लभ के चैतन्य रूप में प्रवेश करते हैं. भक्तों को उनसे शुभस्पन्दनों की प्राप्ति होती है. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी साधकों के चैतन्य में उपस्थित पापों का विनाश पवित्र नदी में स्नान करके करते हैं, अथवा अपनी योगाग्नि से ही उन पापों को भस्म कर देते हैं. वे कर्मसूत्र का अतिक्रमण न करते हुए भक्तों की रक्षा करते हैं. यदि आवश्यकता हो, तो अत्यंत जडस्वरूप कर्मफलों का शोषण करके अपने भक्तों को मुक्ति प्रदान करते हैं. प्रतिक्षण उनके कर्मों का नाश करते हैं. इसीलिये उनके भक्तों की अनजाने में ही कर्म बंधनों से मुक्ति हो जाती है. उन्हें मुक्ति प्राप्त होती है. श्री पळनीस्वामी के इस कथन के बाद भी मेरी शंका का समाधान नहीं हुआ था. मैंने उनसे एक और प्रश्न पूछने का साहस किया, “स्वामी! सुना है कि शनिदेव की साढ़ेसाती के कष्ट से भगवान शंकर भी छूट न पाए. सार्वभौम श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ग्रहों से सम्बंधित कष्टों से किस प्रकार मुक्ति देते हैं, कृपया यह समझाने का कष्ट करें,

इस पर श्री पळनीस्वामी ने कहा, “वत्स! शंकर! खगोल स्थित ग्रहों की जीवमात्र से मित्रता अथवा शत्रुता होती ही नहीं है. अपने जन्म के समय मानव अपने प्रारब्ध कर्म के अनुसार किसी ग्रह की महादशा में जन्म लेता है, उन ग्रहों से संबंधित शुभाशुभ फल की उसे प्राप्ति होती है. यदि ग्रहों से आनेवाले सूक्ष्म किरण अशुभ फल देने वाले हों, और उनके दोष निवारण हेतु मंत्र, तंत्र, यंत्र यदि कोई फल न दें, तो जप, तप, होम का आश्रय लें. इस उपाय से भी यदि शान्ति न हो तो श्री दत्त गुरू की चरण पादुकाओं की शरण में जाए, श्री चरण सर्वशक्ति संपन्न हैं. शक्ति शुभ तथा अशुभ – दोनों प्रकार की होती है. शक्ति के प्रकार के अनुसार, उसमें से विकिरित स्पंदनों के फलस्वरूप शुभ तथा अशुभ घटनाएँ घटित होती है. प्रत्येक ग्रह का मानव शरीर के किसी विशेष अंग पर ही आधिपत्य होता है. ग्रहबाधा होने की स्थिति में, उस ग्रह द्वारा शासित अंग ही पीड़ित होते हैं. विश्व-चैतन्य से प्रवाहित सूक्ष्म स्पंदनों के कारण ही इष्ट अथवा अनिष्ट फल की प्राप्ति होती है. स्पंदनों के बीच आकर्षण अथवा विकर्षण होता है. सज्जनों का सहवास प्राप्त हुआ व्यक्ति यदि दुर्जनों के सहवास में आए, तो अकारण ही कलह, बंधु-वियोग, परिवार के सदस्यों से वाद विवाद होते हैं. यह अनिष्ट आकर्षण शक्ति के कम होने के कारण होता है. विश्व-शक्ति निरंतर स्पंदनों की उत्पत्ति करती रहती है. ये स्पंदन अल्प काल तक मनुष्य पर प्रभाव डालते हैं. काल – शक्ति स्वरूप है. थोड़े समय पश्चात् ये स्पंदन उस मनुष्य को छोड़कर विधि के विधानानुसार प्रभावित होने वाले किसी अन्य मानव के शरीर में प्रवेश करते हैं. काल-चक्र के अनुसार उनका फल प्राप्त होता रहता है. मानव मन में ईश्वर भक्ति जागृत होने पर जब वह जप, तप आदि करता है, तो ग्रहों की तीव्रता कुछ अंशों में कम हो जाती है. महात्माजन लोक एवं विश्व कल्याण की इच्छा से विविध प्रकार के यज्ञ किया करते हैं. अपनी तपस्या का फल भी दान किया करते हैं. इस प्रक्रिया के कारण विश्व में उत्पन्न हुए अनिष्टकारक स्पंदन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को कष्ट न देकर वापस अपने उद्गम स्थान की और चले जाते हैं, इस प्रक्रिया को तिरोधान कहते हैं, थोड़ा-सा ही पुण्य कार्य करने से विशेष शुभ फल की प्राप्ति को अनुग्रह कहते हैं.”

स्वामी आगे बोले, “वत्स! क्रियायोग के सिद्धांत के अनुसार सृष्टि, स्थिति, लय इन तिरोधान अनुग्रहों को मैंने स्पष्ट किया. तुमने ध्यानस्थ अवस्था में यवन प्रतीत हो रहे जिस साधू को देखा, उस साधू के भीतर भविष्य काल में श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की शक्ति विशेष रूप से प्रवाहित होगी. नीम के वृक्ष के पास स्थित भूगृह में प्रज्ज्वलित हो रहे चार नंदादीपों के दर्शन तुम कर सके, यह असाधारण चमत्कार है. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने किसी महान उद्देश्य को दृष्टिगत रखकर ही तुम्हें यह अनुभव प्रदान किया है. उनकी आतंरिक इच्छा को केवल वे ही जानते हैं. उनकी लीलाएं अगम्य हैं, गूढार्थ से परिपूर्ण हैं. उनका अर्थ स्वामी के अतिरिक्त कोई और नहीं जान सकता. इसमें भी कोई दैवी रहस्य छुपा होगा. उनकी अनुमति से ही मैं उसका वर्णन कर सका. समस्त सृष्टि उनकी नज़रों के घेरे में ही रहती है. उनका प्रमाण वे ही हैं. उनमें वे ही श्रेष्ठ हैं. विश्वनियन्ता भी वे ही हैं, योगसिद्ध हैं, अजेय हैं. किन्हीं भी परिमाणों, परिमितियों से परे हैं.”

श्री पळनीस्वामी के इस वर्णन से मेरा ह्रदय आनंद से परिपूर्ण हो गया. मैं उडुपी क्षेत्र से निकला. कुरवपुर की यात्रा करते हुए मार्ग में कितनी चित्र-विचित्र घटनाएं घटती जा रही थीं. इन सब अनुभवों को  ग्रन्थ रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति सर्व व्यापी श्री गुरु से लेने के विचार से मैंने श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दर्शन करने के पश्चात् उनसे इस विषय में विचार विनिमय करने का निश्चय किया.  

श्री पळनीस्वामी मेरे  ह्रदय के भावों को समझ गये और बोले, “तुम्हारे मन के विचार को मैं समझ गया हूँ. भविष्य में भक्तों के कल्याण के लिए तुमने श्री प्रभु के चरित्र को लेखनीबद्ध करने का निश्चय किया है. श्री स्वामी तुम्हारे प्रयत्नों को अवश्य आशीर्वाद देंगे.”

श्री पळनीस्वामी ने माधव से कहा कि वह अपने ध्यानानुभव के बारे में बताए. माधव ने अपने अनुभव सुनाना आरम्भ किया.

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ की जन्म भूमि में श्री की चरण पादुकाओं, श्रीपाद श्री वल्लभ, श्री दत्तात्रेय एवँ श्री नृसिंह सरस्वति की मूर्तियों की स्थापना.     

श्री पळनीस्वामी बोले, “वत्स! माधव, तुमने श्रीपाद श्रीवल्लभ के मातागृह के दर्शन किये, वही श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का जन्म स्थान है, जिसने तुम्हारे भीतर की सभी शक्तियों को आकर्षित किया है. वहाँ स्थापित चरण पादुकाओं के नीचे पाताल लोक में सहस्त्रों वर्षों से तपस्या-रत ऋषि हैं. तुमने श्रीपाद श्रीवल्लभ के जन्म स्थान के दर्शन किये, केवल वहीं श्री की चरण पादुकाओं की स्थापना की जायेगी. चरण पादुकाओं की स्थापना के कुछ वर्षों बाद अति प्रयत्न से श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्र प्रकाशित किया जाएगा. जिस स्थान पर बैठकर तुमने ध्यान किया वहाँ श्रीपाद श्रीवल्लभ उनके पूर्वावतार श्री दत्तात्रेय और उनके भावी अवतार श्री नृसिंह सरस्वति की मूर्तियों की स्थापना की जायेगी. उसके पश्चात् उस क्षेत्र में अनेक लीलाएँ होंगी.”

इसके पश्चात् श्री पळनीस्वामी कुछ देर मौन रहे, फिर उन्होंने हमारी गुफा के निकट से उस नवयुवक का मृत शरीर बाहर निकालने की आज्ञा दी. मृत शरीर को बाहर निकालने के पश्चात् उन्होंने प्रणवोच्चार आरम्भ किया. व्याघ्रेश्वर शर्मा “श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये” का जयघोष कर रहा था. श्री पळनीस्वामी ने नवयुवक के शरीर में प्रवेश किया. शिथिल हो चुके उनके वृद्ध शरीर को व्याघ्रेश्वर शर्मा नदी में प्रवाहित करने के लिए ले गया.

नूतन शरीर में प्रवेश कर चुके श्री पळनीस्वामी ने आज्ञा दी, “तुम दोनों इसी क्षण यहाँ से प्रस्थान करो. वत्स, माधव! तुम अपने विचित्रपुर को जाओ. वत्स, शंकर, तुम तिरुपति महाक्षेत्र की और जाओ. माधव, तुमने अपने सूक्ष्म शरीर से पीठीकापुर के पुण्यवान व्यक्तियों के दर्शन कर लिए हैं, वही तुम्हारे इस जन्म के लिए पर्याप्त है. श्रीपाद श्रीवल्लभ अनुग्रह प्राप्तिरस्तु.”

तभी माधव विचित्रपुर की और चला पड़ा, मैंने तिरुपति की और प्रस्थान किया. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की लीलाओं का कोई अंता नहीं, यही सत्य है.

 

“श्रीपाद श्रीवल्लभ की जय हो.”

शनिवार, 5 मार्च 2022

अध्याय ३

 

“ श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये “

अध्याय ३

 

पळनीस्वामी के दर्शन – कुरवपुर के श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के स्मरण की महिमा.  

 

विचित्रपुर से निकल कर मैं तीन दिन तक चलता रहा. मार्ग में अन्न-जल की व्यवस्था ईश्वर की कृपा से होती रही. चौथे दिन मैं अग्रहारपुर पहुँचा. वहाँ एक ब्राह्मण के घर के सम्मुख खड़े होकर “ऊँ भिक्षां देही” कहकर भिक्षा मांगी. उस घर से एक अति क्रोधित स्त्री बाहर आकर बोली, “भात नहीं, लात नहीं”. मैं थोड़ी देर उसी प्रकार द्वार के सामने खडा रहा. थोड़ी देर में गृह स्वामी बाहर आकर बोले, “मेरी पत्नी ने गुस्से में आकर मेरे सर पर मिट्टी का घडा फोड़ दिया और अब यह कहकर कि ‘इसकी कीमत जितने पैसे लाकर दो, मुझे घर से बाहर निकाल दिया. मैं आपके साथ आता हूँ. दोनों मिलकर भिक्षा मांगेंगे.” मैंने कहा, “समस्त जीवों को अन्न-जल देने वाले सर्वव्यापी श्री दत्त प्रभु ही हैं. चलो, हम सामने वाले पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर उनका नाम-स्मरण करें.” हम दोनों पीपल के उस विशाल वृक्ष के नीचे बैठकर श्री दत्त प्रभु का भजन करने लगे. भूख के कारण मुख से आवाज़ भी मुश्किल से निकल रही थी. तभी वहाँ विचित्रपुर के राजदूत आये. वे बोले, “हमारे युवराज का गूंगापन दूर हो गया है. अब वे बोल सकते हैं. राजासाहेब ने हमें आज्ञा दी है कि आपको उनके पास लाया जाए. आप हमारे साथ घोड़े पर चलिए.”  

मैंने कहा, “मैं अकेला नहीं आऊँगा, यदि मेरे मित्र को भी साथ आने देंगे, तो मैं आऊँगा.” राजदूतों ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर ली. हम दोनों को घोड़े पर बिठाकर वे राजप्रासाद की और चले. उस गाँव के लोग आश्चर्य से देख रहे थे. राजमहल में पंहुचने पर राजा ने हमारा स्वागत किया, और कहा, “आपके जाने के बाद युवराज अचानक बेहोश हो गया. हम घबरा गए. राजवैद्य को बुलावा भेजा, परन्तु उनके आने से पूर्व ही युवराज को होश आ गया. आँखें खोलकर वह “दिगंबरा, दिगंबरा, श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” इस मन्त्र का जाप करने लगा. कुछ देर बाद युवराज ने बताया कि जब वह बेहोश था तो उसके पास सोलह-सत्रह वर्ष का अत्यंत तेजस्वी, दैदीप्यमान, कान्तियुक्त यति आया. उसने युवराज की जिह्वा पर विभूति लगाई और उसी क्षण युवराज को वाचा प्राप्त हुई.” राजा ने पूछा, “वे यति कौन थे? श्री दत्त प्रभु से उनका क्या सम्बन्ध है? कृपया विस्तारपूर्वक बताएँ .”

मैंने कहा कि युवराज ने जिस सोलह-सत्रह वर्ष के दिव्यस्वरूप यति को देखा, वे श्री श्रीपाद श्रीवल्लभ थे. उन्होंने ही युवराज को वाचा प्रदान की है. वे श्री दत्त प्रभु के कलियुगीन अवतार हैं. उनके दर्शनों के लिए ही मैं कुरवपुर क्षेत्र जा रहा हूँ. मार्ग में अनेक पुण्य पुरुषों के, संत-महात्माओं के दर्शनों का लाभ हो रहा है. दरबार में बैठे सभी लोगों ने श्रीपाद श्रीवल्लभ का जयजयकार किया. राजा ने मुझे तथा मेरे साथ आए उस व्यक्ति को सुवर्ण मुद्राएँ दान में दीं. उन्हें लेकर हम चल पड़े. राजा के राजगुरु ने कहा, “आपके कारण हमारा ज्ञानोदय हुआ और हमें श्री दत्त महिमा का ज्ञान हुआ.”

हमारे साथ माधव नम्बूद्री नामक एक ब्राह्मण भी श्री स्वामी के दर्शनों के लिए कुरवपुर के लिए चल पडा. हम तीनों विचित्रपुर से अग्रहारपुर पंहुचे. मेरे साथ अग्रहारपुर से आये हुए उस व्यक्ति ने राजा द्वारा दी गईं सुवर्ण मुद्राएँ अपनी पत्नी को दी. वह बड़ी प्रसन्न हुई. उसने सबको यथेच्छ भोजन दिया. उसके पश्चात् वह श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की भक्त बन गई.

मैं और माधव नम्बूद्री चिदंबरम् की और निकल पड़े. वर्त्तमान गुंटूर (गर्तपुरी) मंडल के नम्बुरू गाँव में अनेक विद्वान ब्राह्मण रहा करते थे. मलियाल देश के राजा ने नम्बुरू के अनेक विद्वान पंडितों को अपने देश में बुलाकर उन्हें राजाश्रय प्रदान किया. यही ब्राह्मण नम्बूद्री ब्राह्मण कहलाये. ये ब्राह्मण आचार सम्पन्न  एवं वेद पारंगत थे. ईश्वर में उनकी दृढ़ श्रद्धा थी. परन्तु मेरे साथ चल रहा माधव नम्बूद्री बचपन में ही अपने माता-पिता को खो चुका था और निरक्षर था. मगर श्री दत्त प्रभु पर उसे प्रगाढ़ विशवास था. उनके प्रति उसके मन में गहरी श्रद्धा थी.

जब हम चिदम्बर पँहुचे तो ज्ञात हुआ कि वहाँ पळनीस्वामी नामक महात्मा का वास है. उनके दर्शनों के लिए पर्वत पर एकांत में स्थित उनकी गुफा की ओर चले. गुफा के द्वार पर ही पळनीस्वामी हमें देखकर बोले, “माधवा! शंकरा! दोनो मिलकर आये हो! हमारे अहोभाग्य!” प्रथम दर्शन में ही हमारे नाम न जानते हुए भी, हमें अपने नाम से पुकारने वाले यह महात्मा अत्यंत सिद्ध हैं, इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं था. स्वामी बोले, “बालकों, श्रीपाद श्रीवल्लभ की आज्ञानुसार मैं इस शरीर का त्याग करके दूसरे युवा शरीर में प्रवेश करने वाला हूँ . वह समय अब निकट आ गया है. इस शरीर में मैं तीन सौ वर्षों से वास कर रहा हूँ. इस देह को त्याग कर नूतन शरीर में और तीन सौ वर्ष रहूँ, ऐसी श्रीपाद स्वामी ने मुझे आज्ञा दी है. जो जीवन्मुक्त हो गए हैं, जो जन्म-मरण रूपी स्रष्टि से परे हैं और समस्त स्रष्टि का चालन करने वाले हैं, वही महासंकल्प हैं श्री श्रीपाद श्रीवल्लभ!” पळनीस्वामी आगे बोले, “बालक, शंकर! तुमने विचित्रपुरी में कणाद महर्षि के कणाद सिद्धांत के विषय में कहा था, उसका वर्णन करो.”

 

कणाद महर्षि का कण-सिद्धांत

 

स्वामी के प्रश्न के उत्तर में मैंने कहा, “स्वामी, मुझे क्षमा करे. कणाद महर्षि और उनके सिद्धांत के बारे में मैं बहुत कम जानता हूँ. जो कुछ मैंने वर्णन किया था वह श्री दत्त प्रभु के आदेशानुसार ही मेरे मुख से फूट रहा था, आपको तो यह ज्ञात ही है,” करुणास्वरूप पळनीस्वामी ने कण-सिद्धांत का वर्णन करना आरम्भ किया. वे बोले:

“समस्त सृष्टि का निर्माण परम-मूल अणुओ (परमाणुओं से) से हुआ है. इन परमाणुओं से भी सूक्ष्म कणों के अस्तित्व से विद्युत् शक्ति उत्पन्न होती है. ये सूक्ष्म कण अत्यंत वेगवान गति से अपनी-अपनी कक्षा में परिभ्रमण करते रहते हैं. जिस प्रकार स्थूल सूर्य के चारों और ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में भ्रमण करते हैं, उसी प्रकार ये सूक्ष्म कण भी अपने केंद्र के चारों और भ्रमण करते हैं. इन सूक्ष्म कणों से भी सूक्ष्म स्थिति में प्राणिमात्र के समस्त भावावेगों का स्पंदन होता रहता है. स्पन्दनशील जगत में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है. चंचलता उसका स्वभाव है. प्रतिक्षण परिवर्तित होना उसकी प्रवृत्ति है. इन स्पंदनों से भी सूक्ष्म स्थिति में स्थित है श्री दत्त प्रभु का चैतन्य. अतः सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी सूक्ष्म रूपों से भी सूक्ष्मतम, ऐसे श्री दत्त प्रभु का अनुग्रह प्राप्त करना. यह जितना सरल है, उतना ही कठिन भी है. यदि प्रत्येक कण के अनंत भाग किये जाएँ, तो एक-एक कण शून्य के समान होगा. अनंत शून्यों के संयोग से बनी है यह सृष्टि. जिस प्रकार पदार्थ की सृष्टि होती है, वैसे ही व्यतिरेकी (विपरीत) पदार्थ की भी होती है. इन दोनों का संयोग होने पर व्यतिरेकी पदार्थों का नाश होता है, स्वयँ पदार्थों के गुणों में भी परिवर्तन होता है. अर्चावतार में प्राणप्रतिष्ठा करने पर वह मूर्ती चैतन्यमय होकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है. कुण्डलिनि शक्ति में सभी मन्त्र होते हैं. गायत्री मन्त्र भी इस शक्ति में समाया हुआ है. साधारण रूप से यह माना जाता है कि गायत्री मन्त्र के तीन चरण हैं, परन्तु इस मन्त्र में चौथा चरण भी है, वह है “परोरजाती सावदोम”.

कुण्डलिनी शक्ति चौबीस तत्वों से इस विश्व का निर्माण करती है. गायत्री मन्त्र में चौबीस अक्षर हैं. चौबीस – इस संख्या को ‘गोकुल’ भी कहते हैं. “गो” अर्थात् दो, “कुल” अर्थात् चार. ब्रह्मस्वरूप में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता. “परिवर्तनातीत” है इसीलिये इसे “नौ” इस अंक से प्रदर्शित किया जाता है. “आठ” का अंक महामाया के स्वरूप को प्रकट करता है. श्रीपाद श्रीवल्लभ के भक्तजन “उन्हें दो चौपाती देवलक्ष्मी” कहा करते थे. परब्रह्म ही सभी जीवों के “लिए पतिस्वरूप है. पतिदेव का तात्पर्य है “नौ” के अंक से, लक्ष्मी का तात्पर्य है “आठ” के अंक से, दो का तात्पर्य “दो” के अंक से है, “चौ” अर्थात् चार का अंक. अत “दो चौ पति लक्ष्मी” का अपभ्रंश होकर वह “ दो चौपाती देवलक्ष्मी” हो गया. यह सभी जीवों को २४९८ इस संख्या का स्मरण कराता है. गोकुल में परब्रह्म पराशक्ति का वास श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में ही है. श्रीकृष्ण परमात्मा श्रीपाद श्रीवल्लभ ही हैं. गायत्री मन्त्र का स्वरूप उनकी निर्गुण पादुकाओं के समान है.”

स्वामी बोले, “वत्स, शंकर! स्थूल मानव शरीर में बारह प्रकार के भेद है. जिस स्थूल शरीर का सबको अनुभव होता है, वह सूर्य के प्रभाव के अंतर्गत है”. श्रीपाद श्रीवल्लभ पीठिकापुरम में मानव रूप में अवतरित होने से लगभग १०८ वर्ष पूर्व इस प्रदेश में आये थे. उन्होंने मुझ पर अनुग्रह किया था. अभी जिस रूप में वे कुरवपुर में वास कर रहे हैं, उसी रूप में वे उस समय यहाँ आये थे. उस समय एक आश्चर्यजनक घटना घटित हुई. हिमालय के कुछ महायोगी बद्रीकेदार तीर्थक्षेत्र स्थित बद्रीनारायण की ब्रह्मकमलों से अर्चना कर रहे थे. बद्रीनारायण के चरणों में अर्पित ब्रह्मकमल श्रीपाद श्रीवल्लभ के चरणों पर आकर गिर रहे थे. यह दृश्य हमने स्वयं अपनी आंखों से देखा था.”

पळनीस्वामी के इस दिव्य वक्तव्य से मैं भाव विभोर हो गया. शरीर में रोमांच उठने लगे.  मैंने उनसे पूछा, “ ब्रह्मकमल क्या है? वे कहाँ मिलते हैं? आपके वक्तव्य से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्मकमलों से पूजा करने पर श्री दत्त प्रभु संतुष्ट होते हैं. कृपया मेरे इस संदेह का निवारण करें.”

 

                       ब्रह्मकमल का स्वरूप

मेरी प्रार्थना स्वीकार करते हुए श्री पळनीस्वामी स्नेह पूरित दृष्टी से मेरी ओर देखते हुए बोले, “श्री महाविष्णु ने श्री सदाशिव की पूजा ब्रह्मकमल से की थी. श्री विष्णु की नाभि से जो कमल निकला है, उसे भी ब्रह्मकमल ही कहते हैं. दिव्य लोक में पाए जाने वाले ब्रह्मकमल के सादृश्य यह कमल हिमालय पर पाया जाता है. लगभग बारह हज़ार फुट की ऊंचाई पर हिमालय पर यह ब्रह्मकमल वर्ष में एक ही बार खिलता है. और इसके खिलते समय चारों और का परिसर अद्भुत सुगंध से परिपूर्ण हो जाता है. हिमालय में साधना करने वाले साधक, महात्मा ऐसे ब्रह्मकमल की खोज में रहते है. शरदऋतु से लेकर बसंतऋतु तक यह बर्फ के नीचे दबा रहता है. चैत्र मास के आरम्भ में यह बर्फ से बाहर निकलता है. ग्रीष्म ऋतु में इसके विकास की प्रक्रिया पूर्ण होती है. अमरनाथ स्थित अमरेश्वर हिमलिंग के दर्शन श्रावण शुक्ल पौर्णिमा को होते हैं और इसी समय अर्धरात्रि के समय पूरी तरह विकसित होकर यह फूल खिलता है. हिमालय पर तपस्यारत सिद्ध तपस्वी पुरुषों तथा साधकों के लिए परमेश्वर की यह अद्भुत लीला होती रहती है. ब्रह्मकमल के दर्शनों से समस्त पातकों का नाश हो जाता है. योगसिद्धि के मार्ग में उत्पन्न विघ्नों का नाश होता है. इस ब्रह्मकमल के दर्शन से योगी, तपस्वी, सिद्ध पुरुष अपने-अपने मार्ग में उच्च स्थिति को प्राप्त करते हैं. जिन भक्तों के प्रारब्ध में ब्रह्मकमल के दर्शन हैं, उन सबके दर्शन कर लेने के पश्चात् यह कमल अंतर्धान हो जाता है.”

श्री पळनीस्वामी आगे बोले, “वत्स शंकर! मैंने दस दिनों तक समाधी में लीन होने का निश्चय किया है. यदि कोई भक्त मेरे दर्शन की आर्त इच्छा लेकर आये तो मेरी समाधी भंग किये बिना उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से दर्शन करने दो. यदि सांप के काटने से मृत हुए किसी व्यक्ति को लाया जाए, तो कहना कि मैं समाधिरत हूँ , और तब उस मृत शरीर को नदी के जल के प्रवाह में अथवा भूमि के भीतर गाड़ कर रखना. कहना कि मेरी ऐसी आज्ञा है.”

श्री पळनीस्वामी जहाँ बैठे थे, उसी आसन पर समाधिस्त हो गए. मैं और माधव, दोनों मिलकर आने वाले भक्तों को दूर से ही अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से उनके दर्शन करवा रहे थे. दर्शनार्थ आये हुए कुछ भक्त स्वामी को अर्पण करने के लिए चावल, दाल, आटा आदि सामग्री लाये थे. यह देखकर माधव ने रसोई बनाने का निश्चय किया. उसे निकट ही पड़ा हुआ नारियल के पेड़ का एक बड़ा सूखा हुआ पत्ता दिखाई दिया. उस पत्ते का ईंधन के रूप में प्रयोग करने की इच्छा से वह उसे उठाने के लिए उसके निकट गया. उसके साथ एक अन्य भक्त भी था. माधव ने उस पत्ते को उठाकर अपने कंधे पर रखा, तभी उस पत्ते के नीचे बैठे एक सर्प ने क्रोधित होकर उसे दंश कर लिया. उस सर्प का विष इतना दाहक था कि माधव तत्काल काला-नीला पड़ गया और मृत होकर भूमि पर गिर पडा. दो-तीन व्यक्ति उसे उठाकर गुफा तक लाये. यह दृश्य देखकर मैं घबरा गया. कुछ सूझ न रहा था कि क्या किया जाए. तब स्वामी के आदेशानुसार उसे ज़मीन में गाड़ कर रखने का निश्चय करके मैंने एक गढ़ा खोदना प्रारम्भ किया. अन्य भक्तों ने मेरी सहायता की. उस गढ़े में मृत देह को रखकर जैसे ही मैं वापस आया, गाँव के कुछ लोग सत्रह-अठारह बरस के सर्पदंश से मृत हुए एक बालक का शव लेकर आये. पहले माधव की दुर्घटना और अब यह दूसरी दुर्घटना देखकर मैं अपने अश्रु न रोक सका. मैंने जैसे तैसे उन्हें स्वामी का आदेश सुनाया. गाँव के लोगों ने गुफा के निकट ही एक गढ़ा खोदकर उस बालक को उसमें लिटा दिया. स्वामी के दर्शनों के लिए रोज़ तीन-चार भक्त आते. उन्हें मैं दर्शन करवा देता. इस प्रकार दस दिन बीत गए, ग्यारहवें दिन ब्रह्म मुहूर्त पर श्री पळनीस्वामी समाधि से बाहर आये और “माधव! माधव!” कहकर पुकारने लगे. मैंने रोते-रोते उन्हें सारी घटना सुनाई. स्वामी ने मुझे समझाया. उन्होंने योग दृष्टी से मेरी और देखा, तब मुझे अपनी रीढ़ की हड्डी में थोड़ी हलचल महसूस हुई और उसमें दर्द होने लगा. तब उन्होंने दुबारा अपनी प्रसन्न दृष्टी से मेरी और देखा, और मेरी सारी वेदना दूर हो गई. स्वामी ने कहा, “ वत्स, शंकर! माधव के प्रारब्ध में श्रीपाद श्रीवल्लभ के दर्शन स्थूल शरीर से प्राप्त होना नहीं लिखा था. अतः उसका सूक्ष्म शरीर पिछले दस दिनों से कुरवपुर में विद्यमान श्री चरणों के सान्निध्य में है. चाहे जो भी हुआ हो, उसकी इच्छा पूर्ण हुई. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की लीला अपरंपार है. उसे कोई नहीं जान सकता, यही सत्य है. उसे केवल स्वामी ही जान सकते हैं. माधव को स्थूल शरीर में वापस लाने का कार्य स्वामी ने मुझे सौंपा है.”

पळनीस्वामी के ऐसा कहने के पश्चात् उनके आदेशानुसार मैं माधव का मृत शरीर गढ़े से बाहर निकाल कर लाया, और दक्षिण की और स्थित ताड़ के घने वृक्ष के निकट जाकर जोर से बोला, “माधव को दंश करने वाले नागराज! श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की आज्ञानुसार तुम पळनीस्वामी के निकट आओ.”   

श्री पळनीस्वामी ने अपने वस्त्रों से चार कौड़ियाँ निकाल कर उन्हें मृत शरीर के चारों और रखा. थोड़ी ही देर में वे कौडियाँ ऊपर को उछलकर आकाश में चारों दिशाओं में चली गईं. पांच-दस मिनटों के अन्दर ही उत्तर की और से एक सर्प आया. स्वामी की चारों कौडियाँ उसके फेन में फंस गई थीं. इस कारण वह त्रस्त होकर फुफकार कर रहा था. स्वामी ने उसे माधव के शरीर का विष खींच लेने की आज्ञा दी. जिस स्थान पर उसने दंश किया था, वहीं से उसने पूरा विष बाहर खींच लिया. श्री पळनीस्वामी ने मन ही मन श्रीपाद स्वामी को प्रणाम किया और उस सर्प पर मंत्रोदक छिडका. वह सर्प स्वामी के चरण कमलों का स्पर्श करके और तीन बार उनकी प्रदक्षिणा करके चला गया.

 

श्री दत्त भक्तों को अन्नदान देने से मिलने वाला फल

श्री पळनीस्वामी बोले, “ हे शंकर, यह सर्प पिछले जन्म में एक स्त्री था. उसने अपने जीवन में थोड़ा पाप, थोड़ा पुण्य किया था. उसने एक दत्त भक्त को भोजन कराया था. यह था उसके पुण्य का अंश. यथासमय देह त्यागने के पश्चात् उसे यमदूत यमराज के पास ले गए. यमराज ने उससे कहा, “तूने एक बार एक दत्त भक्त को अन्नदान दिया था, उसका विशेष पुण्य तुझे प्राप्त हुआ है. तुझे पहले पाप का फल भोगना है, अथवा पुण्य का?” इस पर वह स्त्री बोली, “जो थोड़ा है वह प्रथम भोग लूँगी.” तदनुसार उसे पाप योनी में – सर्प योनी में जन्म प्राप्त हुआ. उसका स्वभाव सबको हानि पहुँचाने का था, अतः उसके मार्ग में जो भी कोई आता उसे वह डस लेती थी. वह स्त्री मानव जन्म में रजोगुणी होने के कारण उसके केवल समीप पहुंचे माधव को उसने दंश कर लिया था, परन्तु माधव अपने पूर्व जन्म के पापों के कारण मरणासन्न अवस्था को प्राप्त हो गया. समयानुसार श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की कृपा से उस स्त्री को सर्प योनी से मुक्ति मिल गई.”

 

योग्य व्यक्ति को दिए गए अन्नदान का फल

 

श्री दत्त प्रभु अल्प से ही संतुष्ट हो जाते हैं (वे अल्प संतोषी हैं). थोड़ी सी सेवा से प्रसन्न होकर अपने भक्तों को अपरिमित फल देते हैं. श्री दत्त प्रभु के नाम से यदि किसी भी व्यक्ति को अन्नदान दिया जाए, और यदि वह व्यक्ति योग्य हो, तो उस अन्नदान का विशेष फल प्राप्त होता है. अन्न के छोटे से अंश से  मन का निर्माण होता है. अन्नदाता का मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, शरीर मंगल स्पंदनों से व्याप्त हो जाता है. अतः उसमें लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है. श्री पळनीस्वामी आगे बोले, “इच्छित वस्तु की समृद्धि से तात्पर्य है श्री लक्ष्मी का कृपा कटाक्ष प्राप्त होना. यह समूची सृष्टि सूक्ष्म स्पंदनों से, सूक्ष्म नियमों से चालित होती है.”

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ के नामस्मरण की महिमा

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी का नामस्मरण करने से लक्ष्मी, धन, ऐश्वर्य, समाधान प्राप्त होता है. जिन पर वे अनुग्रह करते हैं, उनके भाग्य का वर्णन क्या करूँ! श्री चरणों की कृपा से दस दिन तक ज़मीन में गड़े माधव के शरीर को कुछ भी नहीं हुआ था. उसे प्राणदान करने वाले प्रभु श्रीपाद श्रीवल्लभ की करुणा, दया, भक्त-प्रेम को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है.”

माधव के शरीर में चैतन्य लौटने लगा. प्यास लगने के कारण उसने पानी माँगा. श्री पळनीस्वामी ने उसे समझा बुझा कर पहले घी पीने के लिए दिया. उसके पश्चात् फलों का रस और फिर कुछ देर बाद पानी दिया.

 

 

नागलोक का वर्णन

माधव के पुनर्जीवित होने से हमारे आनंद का पारावार न रहा. माधव ने अपने अनुभव का वर्णन इस प्रकार किया, “मैं सूक्ष्म शरीर से कुरवपुर पहुँचा और श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी के दर्शन किये. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी आजानुबाहु हैं. उनके नेत्र विशाल हैं, उन नेत्रों में सभी प्राणियों के प्रति करुणा, दया और प्रेम निरंतर प्रवाहित होता रहता है. मैं स्थूल देहधारी नहीं था, अतः वहाँ उपस्थित स्थूल देहधारी भक्तों को दिखाई नहीं देता था. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी ने मुझे आज्ञा दी, “कुरवपुर स्थित उस द्वीप के मध्य भाग में जाओ.” श्रीपाद श्रीवल्लभ का नाम स्मरण करते हुए मैं उस द्वीप के मध्य भाग से गहराई में गया. मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि पृथ्वी के भीतर गहराई में भूकेंद्र के निकट अनेक प्रासाद, दालान हैं. वहा पाताल लोक ही था, ऐसा मुझे विश्वास हो गया. जो स्थूलता को देखते हैं, उन्हें स्थूलरूपी पदार्थ ही दिखाई देते हैं. सूक्ष्म रूप में होने के कारण मुझे सूक्ष्म रूप धारण किये अनेक लोक दिखाई दिए. वहाँ उपस्थित लोग नाग जाति के थे और उन्होंने काम रूप धारण किया था. उनमें इच्छित रूप धारण करने की शक्ति थी. मगर साधारणत: नागरूप में ही विचरण करना उन्हें अच्छा लगता. वहाँ मैंने अनेक महासर्पों को देखा. कोई-कोई सर्प तो हज़ार फन वाले थे. फनों पर मणि थी जिसमें से दिव्य तेज निकल रहा था. अन्य नाग मानों योगमुद्रा में बैठे अपने फेन निकालकर मौन मुद्रा में थे. आश्चर्य की बात यह थी कि उन्हीं में एक महासर्प था. उसके हज़ार फेन थे. उस महासर्प के ऊपर श्रीपाद श्रीवल्लभ श्री महाविष्णु के समान शयन कर रहे थे. वहाँ उपस्थित सर्प वेदगान कर रहे थे. स्वामी उस गान का चिदानंद स्वरूप में श्रवण कर रहे थे. मेरे निकट बैठे एक सर्प ने श्री दत्त प्रभु की महिमा का गुण-गान करना आरंभ किया.

 

श्री दत्तात्रेय की महामहिमा

उसने कहा, “श्री दत्त प्रभु नेपाल देश में स्थित चित्रकूट के “अनुसूया” पर्वत पर अत्रि-अनुसूया के पुत्र के रूप में पूर्वयुग में अवतरित हुए. अवतार समाप्त किये बिना वे सूक्ष्म रूप में नीलगिरी के शिखर पर, श्री शैल के शिखर पर, शबरगिरी के शिखर पर, सह्याद्री पर्वत पर संचार करते रहते हैं. उन्होंने नाथ सम्प्रदाय के गोरक्षनाथ को योगमार्ग का उपदेश दिया. ज्ञानेश्वर नामक योगी को खेचरी मुद्रा में बैठे निराकार योगी स्वरूप में दर्शन दिए. श्री दत्त-प्रभु देश-काल से परे हैं. श्री दत्त प्रभु के सान्निध्य में हमें भूत, भविष्य और वर्त्तमान पृथक-पृथक नहीं दिखाई देते. बस, सदा वर्त्तमान ही रहता है.”

 

अनघा सहित श्री दत्तात्रेय के दर्शन

 

वह महासर्प आगे बोला, “वत्स माधव! हमें कालनाग ऋषीश्वर कहते हैं. श्री दत्तात्रेय ने हज़ारों वर्षों तक राज्य परिपालन करने के पश्चात् अपने रूप को गुप्त रखने का निश्चय किया. कुछ वर्षों तक वे नदी में अदृश्य रहे. फिर वे पानी के ऊपर आये. हम सेवक, इस आशा में कि वे हमारे साथ वापस आयेंगे, वहीं पर उनकी राह देख रहे थे. परन्तु वे हमसे छुपने का प्रयत्न कर रहे थे. हम भी यह बात जानते थे. वे पुनः जलसमाधि में जाकर कुछ कालांतर के पश्चात् ऊपर आये. इस समय उनके एक हाथ में मधु-पात्र था. दूसरे हाथ में सोलह वर्ष की सुन्दर कन्या थी. मधुपान करते हुए, हमेशा उसके नशे में चूर और स्त्री की दासता में लीन व्यक्ति को हम अज्ञानवश आज तक अपना गुरू मानते रहे, ऐसा सोचकर हम वहाँ से वापस चले गए. तभी वे दोनो भी अदृश्य हो गए. उनके अदृश्य होने के पश्चात् ही हमारा ज्ञानोदय हुआ. उनके हाथ में जो मधुपात्र था, वह योगानंद स्वरूप अमृत का कलश था और वह सुन्दरी त्रिशक्तिरूपिणी अनघालक्ष्मी देवी है, इस बात का हमें स्मरण हुआ. वे फिर से इस भूमि पर अवतार लें इस हेतु से हमने घोर तपस्या की. हमारी तपस्या के फलस्वरूप श्री दत्तात्रेय ने पीठिकापुर में श्रीपाद श्रीवल्लभ नाम से अवतार लिया.

 

श्री कुरवपुर का वर्णन

 

श्री दत्तात्रेय प्रभु उस दिन स्नान करने के लिए जल में उतरे थे, वही क्षेत्र आजकल परम पवित्र कुरवपुर है. जब वे जल-समाधि में थे तब हम भी अपने सूक्ष्म स्पंदनों से इस लोक में योग समाधि में लीन थे. कौरवों तथा पांडवों के मूल पुरुष कुरु महाराज को जहाँ ज्ञानोपदेश हुआ वह कुरवपुर ही यह पवित्र स्थल है. वत्स, माधव! इस कुरवपुर का वर्णन करने की सामर्थ्य आदि शेष (शेष नाग) के पास भी नहीं है.

 

सदाशिव ब्रह्मेन्द्र की पूर्व गाथा

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ के चरणों में मैंने अत्यंत नम्र भाव से शीश नवाया. तब प्रभु अत्यंत करुणापूर्ण अंतःकरण से बोले, “वत्स! यह दिव्य भव्य दर्शन प्राप्त करना एक अलभ्य संयोग है. तुमसे जो महासर्प बातें कर रहा था, वह आगामी शताब्दी में ज्योति रामलिंगेश्वर स्वामी नाम से अवतीर्ण होकर ज्योति रूप में ही अंतर्धान होगा. तुमसे बातें कर रहा दूसरा महासर्प सदाशिव ब्रह्मेन्द्र नाम से आगामी शताब्दी में अवतार लेकर अनेक लीलाएँ दिखाएगा. श्री पीठिकापुर भी मेरा अत्यंत प्रिय स्थान है. पीठिकापुर में मेरी माता के घर में, जहाँ मैंने जन्म लिया है, वहीं मेरी चरण पादुकाओं की प्रतिष्ठापना होगी. मेरा जन्म तथा कर्म अत्यंत दिव्य है, वह एक गोपनीय रहस्य है. तुम श्री पीठिकापुर स्थित मेरी चरण-पादुका प्रतिष्ठा स्थल से पाताल लोक जाकर वहाँ तपस्या कर रहे काल नागों से मिलकर आओ.”

श्री पळनीस्वामी मंद हास्य करते हुए आगे बोले, “वत्स माधव! पीठिकापुर के काल नागों के बारे में चर्चा बाद में करेंगे. हमें तुरंत स्नान करके ध्यान धारणा में बैठना है. यह श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की आज्ञा है.”

 

“श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वामी की जयजयकार”

Complete Charitramrut

                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...