बुधवार, 13 जुलाई 2022

अध्याय - ३४

 


।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय – ३४


शरभेश्वर का वृत्तांत

             

              

हम दोनों कई दिनों तक चलकर एक गाँव में पहुंचे. रास्ते में हम श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का नामस्मरण करते, उनकी अलौकिक लीलाओं को याद करते हुए जा रहे थे. मार्ग में हमारा आदरातिथ्य भी होता था. कभी बैलगाड़ी मिल जाती, कभी कोई घोड़ा गाडी तो कभी-कभी पैदल चलना पड़ता था. हमारी यात्रा के मार्ग में श्रीपाद प्रभु के भक्तों द्वारा आदरातिथ्य किया जा रहा था, यह सब परोक्ष रूप से श्रीपाद प्रभु की लीला ही थी.

उस गाँव में पहुँचते ही हमने देखा कि एक ब्राह्मण के घर उसका सारा सामान बाहर फेंका जा रहा है. ब्राह्मण की पत्नी एवँ बच्चे घर में ही थे. इस ब्राह्मण ने साहूकार से थोड़ा क़र्ज़ लिया था, जिसे वह वापस नहीं कर पाया. एक दिन साहूकार ने ब्राह्मण को रास्ते में ही रोक लिया और उसके चारों और कोयले से एक गोल घेरा बनाकर ब्राह्मण को धमकाया कि वह उस घेरे से बाहर न आये. साहूकार ने क्रोध में ब्राह्मण से कहा कि अपने पवित्र यज्ञोपवीत की शपथ लेकर बताए कि कितने दिनों में उसके पैसे वापस करेगा. मैं आपके पैसे दो सप्ताह में वापस कर दूँगा, ऐसा ब्राह्मण ने आश्वासन दिया, परन्तु पंद्रह दिनों में वह धन की व्यवस्था न कर सका, और वह अपने वचन का पालन न कर सका. समयावधि समाप्त हो जाने पर भी अपना पैसा प्राप्त न होने के कारण वह साहूकार ब्राह्मण के घर का सामान रास्ते पर फेंक रहा था. ब्राह्मण, उसकी पत्नी तथा बच्चे सभी उदास होकर देख रहे थे. गाँव के लोग बस तमाशा देख रहे थे. किसी ने भी साहस जुटाकर साहूकार से यह नहीं कहा कि ब्राह्मण को कुछ और दिनों का समय दे दे.

श्रीपाद प्रभु की भक्ति परिक्षा

 एवँ

भक्तों को तारना

श्री धर्मगुप्त को ब्राह्मण की यह अवस्था देखकर बड़ी दया आई, परन्तु सहायता करने के लिए उनके पास धन नहीं था, और मैं तो निर्धन ही था. परन्तु मैंने धैर्य करके कहा, “बाबा! इस दुर्बल ब्राह्मण को दया करके और दो महीने का समय दे दो. इस अवधि में श्रीपाद श्रीवल्लभ की कृपा से उसके कष्ट दूर हो जायेंगे. थोड़ी शान्ति से विचार करो. इसका कर्जा चुकाने की ज़िम्मेदारी मेरी है, ऐसा ही समझा लो.” कहने को तो मैंने ऐसा कह दिया, पर मन में अत्यंत भयभीत था. साहूकार ने कहा, “ठीक है! तुम्हारी बात पर विश्वास करके मैं इसे और दो महीने की अवधि देता हूँ. मेरा धन वसूल होने तक तुम दोनों यहाँ से कहीं मत जाना. मान लो, यदि निश्चित अवधि में इसने मेरा धन वापस नहीं किया, तो इसके घर पर तो कब्ज़ा कर ही लूँगा, साथ ही बिचौलियापन करने के लिए तुम दोनों को भी अदालत में घसीटूँगा. तब न्यायाधीश जो भी सज़ा सुनाएँगे, वही तुम दोनों को भी भुगतनी पड़ेगी.”  

मुझे और धर्मगुप्त को तो यह असंभव ही प्रतीत हो रहा था कि ब्राह्मण इस अवधि में क़र्ज़ चुका पायेगा. बिना सोचे-समझे, अविवेक से, मैंने वचन दे दिया था. इस अविचारपूर्ण बर्ताव के लिए मैं स्वयँ को ही कोस रहा था. इस मामले में श्रीपाद प्रभु को दोष देना उचित नहीं था. मैंने अपने साथ-साथ धर्मगुप्त को भी संकट में डाल दिया था. यह भी एक प्रकार से पाप कर्म ही मुझसे हो गया था. जुबान को लगाम न देने से कितना अनर्थ हो जाता है, यह इसीका उदाहरण था. परन्तु प्रभु की लीला अपरंपार है, उसका कोई अंत ही नहीं है. ऐसी परिस्थिति में मानव की प्रभु के ऊपर भक्ति दृढ़ हो जाती है, अथवा वह भक्तिहीन हो जाता है.        

मैं अति चिंतित था, मगर धर्मगुप्त निश्चिन्त थे. वे बोले, “शंकर भट्ट! बीती हुई घटना पर विचार नहीं करना चाहिए. जो हो चुका है, जो हो रहा है, तथा आगे होने वाला है, अर्थात् भूत, भविष्य एवँ वर्त्तमान सब प्रभु की लीला है. जो ब्रह्मलिखित है, वही होगा, उसे तो टाला नहीं जा सकता.”

ब्राह्मण पूरी तरह निर्धन एवँ दरिद्री हो चुका था. वह और उसके परिवार के सब लोग भूखे ही रहते थे. हम उनके घर में अतिथि थे, अतः हमें भी भूखा रहना पड़ता था. परिस्थिति बड़ी दयनीय थी. श्रीपाद प्रभु के अनुग्रह से रहने को स्थान तो मिल गया था, हम उनके आभारी थे. भूख, प्यास, थकान होने पर, लेनदारों के आने पर श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का नाम ही एकमेव तरणोपाय है, ऐसा दृढ़ विश्वास मन में अवश्य था. हमने स्नान संध्या करने के उपरांत श्रीपाद प्रभु का नाम स्मरण करने का निश्चय किया. उस ब्राह्मण के घर में भगवान के सम्मुख दिया जलाने के लिए बाती भी नहीं थी. हम जोर जोर से, ऊंचे सुर में “श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये” गाते जा रहे थे. घर के सभी सदस्य हमारे साथ इसी मन्त्र का जाप कर रहे थे. पड़ोस के आबाल वृद्ध लोग जमा हो गए और भक्ति भाव से नाम स्मरण करने लगे.

ब्राह्मण के घर एक किसान आया है, ब्राह्मण का क़र्ज़ चुकाने की ज़िम्मेदारी उसने अपने ऊपर ले ली है, तभी यह बात भी चारों और फ़ैल गई कि मैं किसी महापुरुष का शिष्य हूँ और अपनी दैवी शक्ति के बल पर ही ब्राह्मण का ऋण चुकाने को सिद्ध हुआ हूँ, ऐसा गाँव के लोग समझ बैठे. उन्होंने गाँव में यह भी प्रचार किया कि मैं बहुत बड़ा ज्योतिषी हूँ.

उस गाँव में किसानों को शर्त लगाने की लत थी. मैं उस ब्राह्मण का ऋण चुका पाऊंगा या नहीं इस प्रश्न पर किसान शर्त लगा रहे थे. यदि मैंने ब्राह्मण का ऋण न चुकाया तो हमें न्यायालय में घसीटा जाने वाला था. मेरे साथ-साथ धर्मगुप्त भी संकट में पड़ गए थे. मेरे केवल वाग्दान पर लोग शर्तें लगा रहे थे. यह एक तरह से सट्टा ही खेला जा रहा था. इसका कारण था मेरे द्वारा दिया गया वचन. क्या किया जाए कुछ समझ में नहीं आ रहा था. ऐसी परिस्थिति में हमने केवल श्रीपाद प्रभु के नाम स्मरण का ही सहारा लिया. मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं इसके लिए भी योग्य नहीं हूँ.

‘मैं एक बड़ा ज्योतिषी हूँ, देवी शक्ति से संपन्न हूँ, ऐसा प्रचार चल ही रहा था. परन्तु दिव्य, क्षण-क्षण लीलाविहारी श्रीपाद प्रभु के चरण कमल ही मुझे इस संकट से उबारेंगे इस दृढ़ विश्वास के भरोसे मैं बैठा था. मुझे ‘सत्यं विधातुं निज भृत्यु भाषितं’ इस नारद मुनि द्वारा श्री महाविष्णु को कहे गए वाक्य का स्मरण हो आया. नारायण के भक्त जिन शब्दों का उच्चार करते हैं, उन शब्दों को सत्य सिद्ध करने की ज़िम्मेदारी नारायण प्रभु की ही होती है.

उस गाँव में शरभेश्वर शास्त्री नामक एक पंडित रहता था. वह बड़ा भारी मन्त्र शास्त्रवेत्ता था. उस पर एक प्रेतात्मा का अनुग्रह था. इस बल पर वह भूत, भविष्य एवँ वर्त्तमान का अचूक वर्णन करता था. जिन किसानों ने मुझ पर शर्त लगाई थी, वे शरभेश्वर शास्त्री के पास यह पूछने के लिए गए कि शर्त का क्या होगा? उस प्रेतात्मा ने बताया कि ब्राह्मण साहूकार का क़र्ज़ लौटा नहीं पायेगा. इसके बाद तो शर्तों ने और जोर पकड़ लिया और सौ-सौ वराहों की शर्त लगी. शर्त लगाने वाले इस बात को जानने के लिए अति उत्सुक थे कि शरभेश्वर शास्त्री बड़ा है या शंकर भट्ट बड़ा है.

आखिरकार हमें पुरानी हवेली में ले जाकर न्यायालय ले जाने के लिए तैयार किया गया. उस ब्राह्मण के मन में आशा जगाकर मैंने उसे निराश किया था, धर्मगुप्त को भी अपने साथ संकट में डाला था. श्रीपाद प्रभु की दिव्य लीला का गूढार्थ क्या होगा, यह मैं समझ नहीं पा रहा था. मैंने थोड़ी बहुत शिक्षा पाई थी, परन्तु मेरे पास किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक शक्ति नहीं थी, ज्योतिष विद्या तो मुझे लेशमात्र भी नहीं आती थी. जप-तप, योगाभ्यास, नियम-निष्ठा आदि का तो बिलकुल भी ज्ञान नहीं था. श्रीपाद प्रभु के चरित्र लेखन का संकल्प मैंने कुतूहलवश किया था, परन्तु इसके लिए आवश्यक योग्यता मेरे पास नहीं थी. “मेरी इस आपदा से रक्षा करके मेरा उद्धार करें, बाकी सब आपकी इच्छा पर निर्भर है” ऐसी आर्त-प्रार्थना मैंने श्रीपाद प्रभु के चरणों में की. अचानक न जाने कैसे मुझमें विलक्षण धैर्य आ गया. जो होने वाला है, वह तो होगा ही, परन्तु श्रीपाद श्रीवल्लभ इस विपत्ती से मेरी रक्षा करेंगे ऐसा दृढ़ विश्वास मन में उत्पन्न हो गया.

शरभेश्वर शास्त्री की एक बहिन थी. वह भी उसी गाँव में रहती थी. उसने एक दिन प्रात:काल सपने में देखा कि उसे तेज़ बुखार चढ़ा है, उसके पति की मृत्यु हो गई है और वह विधवा हो गई है. उसने अपने भाई से इस सपने का फल पूछा. शरभेश्वर ने अपने भीतर उपस्थित प्रेतात्मा से उस सपने के बारे में पूछा. उस प्रेतात्मा ने कहा, कि इसके पति को परदेस में जाते समय मार्ग में चोरों ने घेर लिया और उसका सारा धन लेकर उसे मार दिया.

यह सुनते ही वह जोर से विलाप करने लगी, अपने भाग्य को दोष देने लगी. तभी कुछ लोग उसके घर आये, उसे धीरज देने लगे और बोले कि अपने गाँव में शंकर भट्ट नामक महापंडित आये हैं. उन्हें भूत एवँ भविष्य का ज्ञान है. श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु उनके आराध्य देव हैं. उनसे सत्यासत्य की जांच पड़ताल कर लो. यह सलाह उसे लोगों ने दी. उसे ज्ञात न था कि उसके भाई से बड़ा कोई और पंडित भी है. उसके मन में इच्छा हुई कि शंकर भट्ट से आशिर्वाद लिया जाए.

उसने हमारे घर आकर दीन वाणी से प्रार्थना की, “भैया! मेरे सुहाग की रक्षा करो!” यह सुनकर मेरा   कलेजा पानी पानी हो गया. मुझे याद आया कि श्रीपाद प्रभु के पास से पंचदेव पहाड़ ग्राम के किसान को विवाह समारंभ में अक्षता प्राप्त हुई थी. उनमें से थोड़ी सी मेरे पास बची है. मुझमें एक दिव्य स्फूर्ति का प्रादुर्भाव हुआ. ये मंत्राक्षता साक्षात श्रीपाद प्रभु के कर कमलों से प्राप्त हुई हैं, इनसे इसके सुहाग की रक्षा निश्चित ही होगी, ऐसा दृढ़ विश्वास मन में जागा. मैंने उस स्त्री को बुलाकर कहा, :बहन! ये मंत्राक्षता लो और अपने पूजा घर में संभाल कर रखो. तुम्हारा पति कुछ ही दिनों में वापस आयेगा. यही सत्य है! त्रिवार सत्य है!”

इस घटना की सूचना कुछ किसानों ने शरभेश्वर शास्त्री को दी. शरभेश्वर शास्त्री को अपनी बहन पर बड़ा क्रोध आया.

“मेरा पति जब सकुशल वापस लौट आयेगा, तब मैं उस गरीब ब्राह्मण का कर्जा तो चुकाऊंगी ही, साथ ही शंकर भट्ट को गुरु मानकर श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का नाम स्मरण तथा आराधना करूंगी,” ऐसा संकल्प उस स्त्री ने किया.

तीन दिन बीत गए. इन तीन दिनों में किसानों ने हमें सीधा-सामग्री लाकर दी. इन किसानों ने ही मुझ पर शर्त लगाई थी, यदि मैं विजयी हुआ तो उनकी भी जीत होगी और शर्त के पैसे उन्हें मिलने वाले थे.

चौथे दिन शरभेश्वर शास्त्री की बहन का पति देशाटन करके सकुशल घर वापस लौट आया. उस ब्राह्मण स्त्री के आनंद की कोई सीमा ही नहीं थी. उस मंत्राक्षता के बल पर ही उसके सुहाग की रक्षा हुई है, इसका उसे पूरा विश्वास हो गया. उसके पति को मार्ग में चोरों ने मार डालने का प्रयत्न तो किया था, परन्तु एक यवन मल्ल ने उन चोरों को मार कर उस ब्राह्मण की रक्षा की थी.

अहा! श्रीपाद प्रभु की महिमा अगाध है, अमोघ है. शरभेश्वर शास्त्री का अहंकार नष्ट हो गया. मेरा भविष्य सत्य सिद्ध होने पर जिस घर में हम रुके थे, उसके मालिक का क़र्ज़ शरभेश्वर शास्त्री ने चुकाया और उन्होंने हमसे प्रार्थना की कि हम उनके घर आदरातिथ्य स्वीकार करें. हम मान गए.

शरभेश्वर शास्त्री बोले, “बेटा! धूमावती देवी दशमहाविद्या में से एक है. मैं उनका उपासक हूँ. वह बड़ी उग्र देवता है, परन्तु यदि प्रसन्न हो जाए तो रोग, शोक आदि का नाश करती हैं. कुपित होने पर सब सुखों का, सब कामनाओं का नाश कर देती हैं. इन देवी की शरण में जाने से सभी विपत्तियों का नाश होकर सभी संपदाओं की प्राप्ति होती है. यदि देवी क्रोधित हो जाए तो घर में उपवास, कलह, दारिद्र्य इत्यादि का आगमन होता है. मुझ पर धूमावती माता का अनुग्रह है. टोना-टोटका आदि से               त्रस्त जनों का उद्धार करने के लिए इस देवी की उपासना अनिवार्य है. लोक कल्याण हेतु मैंने कुछ दिनों तक बिनामूल्य सेवा की. परन्तु थोड़े दिनों में मेरे भीतर धन के प्रति आसक्ति उत्पन्न हो गई और मैं अधिक धन स्वीकार करने लगा. माता को यह बात अच्छी नहीं लगी. इसी समय मेरा एक बलशाली प्रेतात्मा से संबंध स्थापित हो गया. उसकी सहायता से भूत, भविष्य, वर्त्तमान काल के बारे में कथन करने की शक्ति मुझे प्राप्त हुई.

प्रेतात्मा की, पहले तो, उपासना करनी ही नहीं चाहिए, और यदि करो तो उसकी शक्ति के कारण प्राप्त धन का उपयोग प्रजा की सेवा के लिए, गरीबों को दान देने के लिए करना चाहिए. ऐसा करने से प्रेतात्मा हमेशा हमारे वश में रहती है. ऐसा न करने से वह प्रेतात्मा गलत भविष्य बताती है और ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करती है, कि उसके साधक का अपमान हो और वह निर्धन हो जाए. इतना ही नहीं, उसके प्राण भी संकट में पड़ जाते हैं. स्वार्थपूर्ण व्यवहार करने से अपनी संचित पुण्य राशि नष्ट हो जाती है. तब वह प्रेतात्मा साधक के सामने कष्टों के पहाड़ खड़े करती है. इससे बाहर निकलना आसान नहीं होता.

मैंने अविवेकवश धनार्जन किया और हमेशा अपने ही स्वार्थ के बारे में सोचता रहा. इसीलिये इस प्रेतात्मा ने गलत भविष्य बताकर मुझे संकट में डाल दिया और मेरा अपमान भी हुआ. आज से आप ही मेरे गुरु हैं. कृपया मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करे, यह नम्र प्रार्थना है.” इस पर मैंने कहा, “बाबा! इस सृष्टि का, इस प्रपंच का गुरुत्व करने का अधिकार केवल श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु को ही है. उनके सिवा कोई अन्य गुरु है ही नहीं. यदि मैंने अहंकारवश गुरुत्व स्वीकार कर लिया तो तुम्हारे अपमान से भी ज़्यादा कुछ और मुझे भोगना पडेगा. हम जब कुरुगड्डी से निकल रहे थे, उस समय श्रीपाद प्रभु ने दशमहाविद्याओं का संक्षिप्त वर्णन किया था. शेष भाग वह योग्य समय आने पर बताएंगे. दशमहाविद्याओं में से काली के बारे में, धूमावती के बारे में उन्होंने हमें बताया ही है.”  “ बाबा! तुम मुझे गुरु न बनाओ! श्रीपाद प्रभु के लिए भक्तों को संकट में डालना और फिर उनसे मुक्त कराना एक चमत्कार के समान ही है. सदा सर्वदा श्रीपाद प्रभु का नाम स्मरण करना ही इह तथा परलोक का साधन है.”

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

रविवार, 10 जुलाई 2022

अध्याय - ३३

 

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय 33

 

रमणी एवँ नरसिंह रायुडु का विवाह स्वयँ श्रीपाद प्रभु ने करवाया

 

हम दोनों ने श्रीपाद प्रभु से आज्ञा ली. वे बोले, “बेटा, तुम लोग यहाँ से निकलकर श्री पीठिकापुरम् जाओ. मेरे मंगल आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं. श्री महागुरु की आज्ञा शिरासावंद्य मानकर हम दोनों कृष्णा नदी पार करके दूसरे किनारे पर पहुंचे. वहाँ एक पत्थर पर श्रीपाद प्रभु की चरण मुद्रा देखी. श्रीपाद प्रभु नित्य उसी पत्थर पर खड़े होकर सूर्य नमस्कार किया करते थे. श्री चरणों के चरण कमल वहाँ देखकर हमें आश्चर्य हुआ एवँ अतीव आनंद हुआ.

हम पंचदेवपहाड़ ग्राम पहुंचे. वहाँ अल्पाहार करके आगे की यात्रा पर निकल पड़े. एक ज्वार के खेत से जब हम पगडंडी से गुज़र रहे थे तो उस खेत के मालिक ने हमारा स्वागत किया. खाने के लिए मीठे फल और पीने के लिए मीठी छाछ दी. उस मालिक का नाम था नरसिंह रायुडु. उसने खेत में ही अपना घर बनाया था और वहीं वह रहता था. उसने विनती की कि हम एक दिन उसके यहाँ विश्राम करें, उसका आदरातिथ्य स्वीकार करें और फिर आगे जाएँ. उसकी बात सुनते हुए हम एक दिन वहाँ रुक गए. उसने श्रीचरणों के वैभव के बारे में बताना आरम्भ किया.

वह बोला, “बंधू, मेरा नाम नरसिंह रायुडु है. मैं बचपन में अत्यंत दुर्बल तथा डरपोक था. मेरे माता-पिता की मेरे बचपन में ही मृत्यु हो गई थी. मैं अपने मामा की छत्रछाया में बड़ा हुआ. मेरी मामी बड़े क्रोधी स्वभाव की थीं. मुझे घर में खूब काम करना पड़ता था, साथ ही खेत में भी काम करना पड़ता.”

“मेरे मामा की एक पुत्री थी. उसका नाम था रमणी. पूरे गाँव में, हमारे कुलस्थों में, सभी लड़कियों से बढकर सुन्दर थी रमणी. वह सद्गुण संपन्न थी, ईश्वर के प्रति उसके ह्रदय में भक्ति थी. वह श्रीकृष्ण भगवान को अपना आराध्य देव मानती थी. मेरी मामी मुझे बासा अन्न खाने को देती, यह बात उसे सहन न होती थी. मेरा आहार बहुत कम था. घर में किसी के भी मन में मेरे प्रति आदर की भावना न थी, मगर काम का तो मेरे सामने सदा पहाड़ ही खडा रहता था. रमणी छुपा छुपाकर मुझे ताज़ा अन्न एवँ मीठे फल लाकर दिया करती. कभी कभी मामी की नज़र में यदि यह बात आ जाती, तो मेरे साथ साथ उसे भी दंड मिलता. मेरे मामा स्वभाव से भले थे, परन्तु पत्नी के सामने उनकी एक न चलती थी. वे उसके सम्मुख असमर्थ ही थे. कभी कभी मामी हमारे कुल के मुझसे अधिक बलवान लड़कों को बुलाकर मुझे मारने के लिए कहती थी. मेरी दुर्बलता के कारण मैं उनका विरोध न कर पाता. इससे मेरा डर तथा दुर्बलता और बढ़ती जाती. मुझसे छोटे लड़कों के सामने भी मैं असमर्थ एवँ असहाय प्रतीत होता था. वे मेरा मज़ाक उड़ाते. इस प्रकार का कष्टमय जीवन मैं जी रहा था.

हमारी रमणी बहुत सुन्दर थी, इस कारण गाँव के हमारे कुल के सभी युवकों की उससे शादी करने की इच्छा थी, परन्तु रमणी को मुझसे ही शादी करनी थी. मेरे पास धन तो नाम मात्र को नहीं था, ऊपर से दुर्बल शरीर एवँ डरपोक स्वभाव होने के कारण यह कैसे संभव हो पायेगा यह समस्या थी. हमारे मामा बहुत धनवान थे, स्वभाव से बहुत अच्छे थे, परन्तु उन्हें पैसों की बड़ी लालसा थी. मामी स्वभाव से तो दुष्ट थी, परन्तु यदि उसकी तारीफ की जाती तो वह फंस जाती थी.

हमारी रमणी रोज़ श्रीकृष्ण भगवान से प्रार्थना करती थी कि मैं ही उसका पति बनूँ.  एक बार हमारे गाँव में एक ढोंगी साधू आया. सारे गाँव में यह बात फ़ैल गई कि वह काली माता का भक्त है एवँ उसे भूत, भविष्य एवँ वर्तमान का ज्ञान है. उसे भूत-भविष्य जानने की विद्या अवगत थी. गाँव में उसका बताया हुआ भविष्य शत-प्रतिशत सच हुआ था. हमारी मामी पर उसने अपना माया जाल फेंका और उससे कहा कि घर में काली पूजा का आयोजन करे. पूरी तैयारी कर ली. उसने मामी से कहा कि रमणी की पूजा वाली श्रीकृष्ण की मूर्ती घर से बाहर फेंक दे. मामी मान गई. रमणी तड़पने लगी, विलाप करने लगी, मगर मामी पर कोई असर न हुआ. उस ढोंगी साधू ने पूजा आरम्भ की. अनेक मुर्गियों की बलि दी. उन मुर्गियों के खून से पूजाघर की और देखा नहीं जाता था. घर में मनुष्य का कपाल एवँ श्मशान-साधना की सामग्री भी आ गई. वह पूजा संपूर्ण होने पर इस घर में किसी स्थान पर अपार धन लाभ होगा, परिवार ऐश्वर्य  संपन्न हो जाएगा, ऐसा कहकर उस ढोंगी साधू ने सबका विश्वास प्राप्त कर लिया. उस साधू को वशीकरण विद्या का ज्ञान था. उस विद्या की सहायता से उसने रमणी का शील हरण करने की योजना बनाई. इस उद्देश्य से वह घर में चित्र-विचित्र प्रकार की पूजाएँ कर रहा था, फलस्वरूप रमणी की प्रकृति क्षीण होती गई. उसके बर्ताव में अंतर आ गया. आधी रात को उठकर वह रक्तपान करने लगी. मुर्गियां और बकरे मार-मार कर उसे वह खून पिलाया जा रहा था. उसके शरीर में कालिका माता का संचार हो गया है, इसीलिये वह रक्तपान करती है; खून के बिना माता शांत नहीं होती और माता की कृपा न होने पर अपार संपत्ति का लाभ नहीं होगा. उसके शरीर से कालिका माता निकल जाने पर ही यह कन्या पूर्ववत् होगी ऐसा उस साधू ने कहा.

घर में वीभत्स का तांडव चल रहा था. अचानक रसोई घर से बर्तन बाहर निकल-निकल कर कुएँ में गिरते. आधी रात को मानव कंकालों जैसी आकृतियाँ घर में दिखाई देतीं और डरावनी आवाजें आतीं. हमारा घर श्मशान भूमि जैसा ही दिखाई दे रहा था. उस साधू को निकाल बाहर करने का धैर्य हमारे मामा में नहीं था. थोड़े दिनों तक यह कष्ट सहन करने से अथाह संपत्ति प्राप्त होगी इस आशा में मामी दिन बिता रही थी. परिस्थितियाँ बड़ी असमंजस की एवँ चिंताजनक थीं.

एक बार रात को अचानक वह साधू रमणी के निकट गया, वह वशीकरण के प्रभाव में थी. वह उसकी आज्ञा का पालन करेगी और उसकी इच्छा पूर्ण करेगी इस विचार से वह साधु उसके बिलकुल समीप पहुँचा. रमणी जोर से चिल्लाई और पास ही पडी हुई एक वज़नदार चीज़ उसने उस साधु के सिर पर दे मारी. साधु को उससे ऐसे व्यवहार की बिलकुल आशा न थी. वशीकरण के पश्चात भी व्यक्ति इस प्रकार का व्यवहार कैसे कर सकता है, साधु यह बात समझ न पाया.

 

 

श्रीपाद प्रभु का आर्त परायण तत्व

दूसरे दिन सुबह एक गरीब ब्राह्मण याचक हमारे द्वार पर भिक्षा के लिए आया. रमणी ने उससे कहा कि हमारे घर में भूत प्रेतों का वास्तव्य है, चाहें तो उन्हें ही आप भिक्षा स्वरूप स्वीकार करें ब्राह्मण ने इनकार कर दिया.

उस ब्राह्मण का मुख कमल अत्यंत  शांत एवँ सोज्ज्वल था. हमारे मामा बाहर आये और बोले, “हमारे घर की परिस्थिति अत्यंत चिंताजनक है, इन परिस्थितियों की कारक दुष्ट शक्तियों को आप दान स्वरूप स्वीकार करें,” तभी मामी भी बाहर आई और बोली, “हमारे घर में आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है. हमारे घर का दारिद्र्य भिक्षा स्वरूप स्वीकार करें.” मैं भी तब वहीं था. मैंने कहा, “स्वामी, मेरे पास वंश पारंपरिक एक चांदी का ताबीज़ है. यदि आपकी सम्मति हो तो वह ताबीज़ मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे भिक्षा स्वरूप स्वीकार करें.”  

ब्राह्मण ने ताबीज़ स्वीकार कर लिया. तभी वह ढोंगी साधू श्मशान से मानव कपाल लेकर आया. वह अट्टहास करते हुए बोला, “अरे भिक्षुक ब्राह्मण! तू मना करेगा तब भी मैं इस मानव कपाल को तुझे भिक्षा में दूँगा. इसका तू स्वीकार कर!” उस ब्राह्मण ने इस भिक्षा को अस्वीकार कर दिया.

तभी हमारे घर में एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया और वह भिक्षुक ब्राह्मण अदृश्य हो गया. उस दिव्य प्रकाश के कारण उस ढोंगी साधू के पूरे शरीर में भयानक दाह होने लगा. उस प्रकाश की किरणें रमणी के शरीर पर पडीं और वह एकदम पूर्ववत् हो गई. मामी को लकवा मार गया और वह भूमि पर गिर पडी. मामा भय से थरथर कांपने लगे. मगर मुझमें अपार धैर्य का संचार हो गया. मुझमें शक्ति का प्रवेश होकर मैं अत्यंत बलवान हो गया. उस मान्त्रिक के मुँह से खून की धाराएं बहने लगीं और उसके भीतर की सभी शक्तियां नष्ट हो गईं.

वह दिव्य तेजोमय प्रकाश एक मानव के रूप में परिवर्तित हो गया. वे आर्तत्राण परायण, समस्त देवी-देवता स्वरूपी, आदि, मध्य तथा अंत से रहित दिव्य, भव्य तेजोमय स्वरूप वाले श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु ही थे.

श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु बोले, “वास्तव में देखा जाए तो काली माता मानव के भीतर छिपे हुए काम क्रोधादि राक्षसों का संहार करती है. वह कभी भी मुर्गियां, बकरे आदि नहीं मांगती. इस प्राणमय जगत में राक्षस शक्ति ही कालिका रूप धारण करके विभिन्न प्रकार के प्राणियों की बलि मांगती है. वास्तविक काली माता के लक्षण हैं प्रेम, शान्ति, दया आदि.”

“इस प्राणमय जगत की राक्षसी शक्तियां, आसुरी शक्तियां, भूत-प्रेतादि शक्तियां ऐसा प्रचार करती हैं, कि वे देवता हैं, और क्षुद्र विद्या का प्रदर्शन करती हैं. क्षुद्र मान्त्रिक इनकी उपासना करके लोगों में आतंक फैलाते हैं. याद रखो कि विभिन्न प्रेतात्माएं देवताओं के शरीर तो धारण कर सकती हैं, मगर उन देवताओं की दैवी शक्तियां उनके पास नहीं होतीं.”

श्रीपाद प्रभु आगे बोले, “मैंने यह वचन दिया है कि मेरा अवतार धर्म रक्षणार्थ होता है. उसके अनुसार धर्म संस्थापनार्थ ही श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का अवतार हुआ है. यह अवतार दया, शान्ति, प्रेम, करुणा जैसी अनंत शक्तियों का मिश्रण है.”

हमारे घर की शुद्धि करके उस ढोंगी साधु को भगा दिया गया. श्रीपाद प्रभु के अनुग्रह से मामी भी ठीक हो गई.

श्रीपाद प्रभु ने हमें आशीर्वाद देकर अपने हाथों से मेरा और रमणी का विवाह करवाया. उस समय वे मुश्किल से बारह वर्ष के थे. श्रीपाद प्रभु का वास्तव्य तब पीठिकापुरम् में ही था, मगर मायारूप में वे पंचदेव पहाड़ नामक ग्राम में भी रहते थे. उन्होंने हमें ये अक्षता (चावल) दिए थे और कहा था कि शंकर भट्ट एवँ धर्मगुप्त नाम के दो व्यक्ति आएँगे, उन्हें इसमें से धोडी सी अक्षता दे दूं. अहा! कितना लीलामय स्वरूप है श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का!”

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो ।।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

अध्याय - ३२

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।

 

अध्याय – ३२

 

नवनाथों का वर्णन

नवनाथों का वृत्तांत

 

श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के दिव्य चरणों को स्पर्श करके मैंने उनसे प्रश्न किया, “हे महाप्रभु! मैंने सुना था कि नवनाथों के नाम से प्रसिद्ध सभी सिद्ध योगी श्री दत्त प्रभु के अंशावतार हैं. उनके बारे में कृपया विस्तार से बताएँ, ऐसी श्रीचरणों में नम्र प्रार्थना है.”

श्री नवनाथों का नाम सुनते ही श्रीपाद प्रभु के दोनों नेत्रों से अमृत वृष्टि का प्रवाह बहिर्मुख होकर सृष्टि पर पड़ता हुआ प्रतीत हुआ. उनके नेत्रों से प्रेम चैतन्य प्रवाहित हो रहा था. वे अत्यंत आनंदित होकर बोले, “श्रोता गण! मच्छेन्द्र, गोरक्ष, जालंधर, गहनी, अडभंग, चौरंग, भर्तरी, चर्पट तथा नागनाथ – ये नवनाथ हैं. इनके स्मरण मात्र से ही शुभफल की सिद्धि होती है. नवनाथों का स्मरण करने वालों पर श्री दत्त प्रभु की अपार कृपा रहती है. कलियुग के प्रारम्भ से पूर्व श्रीकृष्ण ने उद्धव जैसे महान भक्त सहित, साथ ही समस्त यादवों के साथ चर्चा करके आज नवनाथों के नाम से प्रसिद्ध नवनारायणों का स्मरण किया था.”

“ऋषभ चक्रवर्ती के सौ पुत्र थे. उनमें से नौ पुत्रों का जन्म नारायण के अंश से हुआ था. इसलिए उन्हें नवनारायण कहते हैं. उनके नाम हैं – १. कवि २. हरी ३. अंतरिक्ष ४. प्रबुद्ध ५. पिप्पलायन ६. अविर्होत्र ७. दृमिल ८. चमस एवँ ९. करभाजन. ये सभी अवधूत स्थिति में रहने वाले सिद्ध पुरुष थे. मेरी आज्ञा के अनुसार इन नवनारायणों ने धर्मं संस्थापनार्थ नवनाथों के नाम से पुनः पृथ्वी पर अवतार धारण किया.

प्रथम पुत्र ‘कवि ने “मच्छेन्द्रनाथ” के नाम से जन्म लिया. अंतरिक्ष ने “जालंदर” के रूप में जन्म लिया. इनके शिष्य के रूप में प्रबुद्ध ने “कानिफा” नाम से जन्म लिया. पिप्पलायन ने “चर्पटनाथ” के नाम से, अविर्होत्र ने “नागेशनाथ” के नाम से जन्म लिया. दृमिल ने “भर्तरिनाथ” के नाम से, चमस ने “रेवणनाथ” के नाम से और करभाजन ने “गहनीनाथ” के नाम से जन्म लिया. सृष्टि पर अनेक स्थानों पर किसी कारण से ब्रह्मा का वीर्य गिरा. इससे अनेक ऋषि जन्म लेंगे ऐसा व्यास मुनि ने अपने ‘भविष्य पुराण में कहा था.

उपरिचर नामक एक वासु था. उसने एक बार ऊर्वशी को देखा और उस पर अत्यंत मोहित हो गया. इस समय उसका वीर्य द्रवित होकर यमुना के जल में गिरा. उसे एक मछली निगल गई. इस मछली से मच्छेन्द्रनाथ का जन्म हुआ. कामदेव को शिव जी ने क्रोधित होकर अपनी ललाटाग्नि से भस्म कर दिया. उस भस्म में मन्मथ का आत्मा सूक्ष्म रूप से विद्यमान था. बृहद्रथ ने जब यज्ञ किया था तो उस यज्ञकुंड से जालंदरनाथ का आविर्भाव हुआ. रेवा नदी अर्थात् आज की नर्मदा नदी. इस नदी में गिरे हुए ब्रह्म वीर्य से रेवणनाथ का जन्म हुआ.

एक बार थोड़ा सा ब्रह्मवीर्य एक नागिन के सिर पर पडा. इसे भक्ष्य समझ कर नागिन ने खा लिया. इस कारण वह नागिन गर्भवती हो गई. इसी समय जनमेजय राजा सब नागों, सर्पों को नष्ट करने के लिए सर्प यज्ञ कर रहा था. ब्राह्मणों के मंत्रोच्चारण के साथ ही सैंकड़ों नाग यज्ञ कुण्ड में आ आकर गिरने लगे. इस महा भयानक नाग यज्ञ से बचाने के लिए तक्षक की पुत्री को एक बड़े वटवृक्ष के बिल में छिपाया गया. इस गर्भपिन्ड से अविर्होत्र का जन्म होने वाला था, इसलिए उस अंडे को उस बिल में रखकर तक्षक की पुत्री स्वस्थान को चली गई. यथावकाश उस अंडे में से वटसिद्ध नागनाथ का जन्म हुआ.

जब मच्छेन्द्रनाथ देश भ्रमण करते समय एक स्थान पर रुके, उनके दर्शनों के लिए अनेक लोग आते थे. एक बाँझ स्त्री ने मच्छेन्द्रनाथ को प्रणाम किया एवँ अपनी व्यथा सुनाई. मच्छेन्द्रनाथ ने भस्म मंत्रित करके उसे दिया परन्तु उस स्त्री ने अविश्वास से उस भस्म को कचरे के ढेर पर फेंक दिया. उस भस्म की अमोघ शक्ति सम्पन्नता से उसमें से गोरक्षनाथ का जन्म हुआ.

पार्वती के विवाह के समय पौरोहित्य कर रहे ब्रह्मदेव उसका अनुपम लावण्य देखकर उस पर मोहित हो गए और उनका वीर्य स्त्रवित हो गया. इससे वह अत्यंत लज्जित हो गए और उन्होंने उस वीर्य को अपनी जंघा पर पोंछ डाला. तत्क्षण उस वीर्य के साठ हज़ार भाग हो गए और उसमें से बालखिल्य नामक साठ हज़ार ऋषियों का जन्म हुआ. जो थोड़ा सा भाग बचा था उसे कचरा समझ कर भागीरथी नदी में फेंक दिया गया. वह कचरा नदी की घास में अटक कर वहीं रह गया. उसमें पिप्पलायन की आत्मा ने प्रवेश किया और उससे चर्पटनाथ का जन्म हुआ.

कोलिक मुनि ने अपनी पर्णकुटी से बाहर जाते समय अपना भिक्षापात्र पर्णकुटी से बाहर रख दिया था. इसी समय सूर्य का तेज उस पात्र में गिरा. महर्षि को जब यह बात ज्ञात हो गयी तो उन्होंने उस पात्र को संभाल कर रखा दिया. भिक्षापात्र का अर्थ “भर्तरी” भी होता है. उस पात्र से एक नवनाथ का जन्म हुआ, अतः उनका नाम भर्तरिनाथ पड़ गया.

हिमालय में एक पर्वत के एक घने जंगल में एक हाथी सो रहा था. एक बार जब ब्रह्मदेव सरस्वती पर मोहित हुए और उनका वीर्य द्रवित होकर नीचे गिरा और उस हाथी के कान में जा गिरा. उस कान में से प्रबुद्ध को जन्म प्राप्त हुआ. कान में से जन्म होने के कारण उनका नाम “कर्ण कानिफा” पडा.

गोरक्षक ने संजीवनी मन्त्र का जाप करते हुए भूमि पर मिट्टी में एक आकृति बनाई. उस आकृति में से करभाजन को उस संजीवनी मन्त्र की सहायता से जीवन प्राप्त हुआ और उन्होंने गहनीनाथ के नाम से अवतार लिया.

श्रीकृष्ण भगवान की आज्ञानुसार इन नवनारायणों ने अपने स्थूल शरीर को मंद पर्वत पर समाधि अवस्था में संभाल कर रखा और अंशावतार से नवनाथों के नाम से पृथ्वी पर जन्म लिया. धर्मं संस्थापना का महान कार्य करने के लिए ही इन नवनाथों का अवतार हुआ था.”

नवनाथों के जन्म के संबंध में श्रीपाद प्रभु के मुख से यह आश्चर्यजनक वर्णन सुनकर हम मंत्रमुग्ध हो गए. हमने प्रभु के चरणों में वंदन करके उनकी जय जयकार की. इसके बाद मैंने पूछा, “प्रभु! नवनाथों के अवतार नव नारायणों के अंशावतार हैं, ऐसा आपने कहा, क्या नवनाथों एवँ नव नारायणों में कोई अंतर है?

अपनी दिव्य, प्रेमपूर्ण दृष्टी से हमारी और देखते हुए प्रभु ने मंद हास्य किया और बोले, “श्रोतागण! समस्त सृष्टि के महासंकल्प का स्वरूप मैं ही हूँ. देवी-देवताओं के कार्य करने के संकल्प भी मेरे महासंकल्प के अंश मात्र होते हैं. इन अंश मात्र संकल्पों को थोड़ी बहुत स्वतंत्रता रहती है. यह स्वतंत्रता वैसी ही होती है, जैसे खेत में पेड़ से बंधी हुई गाय को चरने के लिए दी जाती है. उसी प्रकार कर्मसूत्रों का अनुसरण करते हुए अंशावतारों को स्वेच्छा प्रदान की जाती है. परन्तु संकल्प मूल तत्व से ही निकलते हैं. उनका योग्य प्रकार से नियंत्रण करना अंशावतार का कार्य होता है. किसी भी प्रकार की समस्या के निर्माण होने पर अंशावतार उसके निराकरण हेतु मूलतत्व के पास निवेदन लेकर आते हैं. मूलतत्व से अनुमति प्राप्त कर जीवों का कल्याण करते हैं. इस अंशावतार में क्रोध, लोभ, मद-मत्सर, अहंकार जैसे मानवीय दुर्गुण नहीं होते. इस कारण मूल तत्व की कार्य-सामर्थ्य अंशावतार में भी प्रतिलक्षित होती है. इस कारण से अंशावतार एवँ पूर्णावतार में कोई अंतर नहीं होता.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

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                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...