मंगलवार, 21 जून 2022

अध्याय - २२

 

 

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।  


अध्याय २२

गुरुदत्त भट्ट की कथा – ज्योतिष शास्त्र के अनुसार

भक्त की कुण्डली में शुभफल देने वाले एकमेव श्रीपाद प्रभु

 

गुरुचरण, कृष्णदास और मैं (शंकर भट्ट) श्रीपाद प्रभु के सम्मुख आनंद के सागर में विहार कर रहे थे. गुरुदत्त नामक एक ज्योतिषी श्री गुरुदेव के दर्शन हेतु आया था. श्रीपाद प्रभु ने उसका यथोचित सम्मान किया. उन्होंने आदेश दिया कि एकांत स्थल में बैठकर हम सत्संग करें. हमारा वार्तालाप ज्योतिष शास्त्र की ओर मुड़ा. मैंने दत्त महाशय से पूछा, “महाराज, क्या ज्योतिष शास्त्र में वर्णित फल सत्य होता है? क्या उस फल में परिवर्तन किया जा सकता है? क्या मानव जन्म में पूर्व कर्म निर्देशित होते हैं?” इस पर गुरुदत्त भट्ट बोले, “ ‘भ चक्र – नक्षत्र कक्षा है. इसका आरम्भ अश्विनी नक्षत्र से होता है. नक्षत्र स्थल का निर्देश करने के लिए चैत्र पक्ष होता है. रैवत पक्ष नामक एक दूसरी पद्धति भी है. रेवती नक्षत्र जहाँ विद्यमान है उस स्थान से आठ कलाएँ कम होने के कारण वह ग्राह्य नहीं है. अश्विनी नक्षत्र गोल पहचानने में कठिन है, परन्तु उससे १८०अंशों पर स्थित चित्रा नक्षत्र का केवल एक ही गोल प्रकाशमान होकर स्फुट होने के कारण उसमें ६ (छः) यह अंक मिलाने से वह अश्विनी होकर चैत्र पक्ष के रूप में ग्राह्य समझी जाती है. अश्विनी नक्षत्र को ‘तुरग मुखाश्विनी श्रेणी – तीन गोलों के रूप में स्पष्ट किया गया है. श्रीपाद श्रीवल्लभ के चित्रा नक्षत्र में जन्म लेने के पीछे एक विशेष कारण है. तीन एकत्रित गोलों वाला अश्विनी नक्षत्र – अर्थात उनका स्वरूप है. यही ‘भ चक्र का आरम्भ है. वही उनका दत्तात्रेय स्वरूप है. कलियुग में उनका प्रथम अवतार श्रीपाद श्रीवल्लभ है. इस अश्विनी नक्षत्र की सीध में १८०अंशों पर स्थित चित्रा नक्षत्र उनका जन्म नक्षत्र है. १८०अंश की दूरी पर स्थित कोई भी नक्षत्र अथवा कोई भी ग्रह शक्ति को केन्द्रित करने का कार्य करता है. मनुष्य का जन्म उसके पूर्व जन्म के प्रारब्ध के गणितानुसार यथायोग्य ग्रह संपुट में होता है. ग्रह मानव के प्रति कोई भी द्वेष भावना अथवा प्रेम भावना नहीं रखते. ग्रह विशेष से निर्मित विविध किरणों के द्वारा, विविध स्पंदनों के कारण उस काल विशेष में, उस प्रदेश विशेष में उन जीवों को इष्टानिष्ट फल की प्राप्ति होती है. अनिष्ट फल के परिणामों से दूर जाने के लिए उन किरणों एवँ स्पंदनों को दूर हटाना पड़ता है. यह १. मन्त्र-तंत्र द्वारा २. ध्यान द्वारा ३. प्रार्थना द्वारा अथवा ४. योगशक्ति की सहायता से साध्य किया जा सकता है. यदि पूर्व जन्म का कर्म अत्यंत प्रबल हो तो उपरोक्त विधि-विधान कोई सहायता नहीं कर सकते. ऐसी परिस्थिति में श्रीपाद प्रभु ही हमारी भाग्य रेखा बदल सकते हैं. इसके अनुसार हमारी भाग्य रेखा बदलने के लिए यह आवश्यक है कि हमारे द्वारा दूसरों के हित में कोई अच्छा काम किया जाए. साधारण परिस्थितियों में ऐसा होना कठिन है. श्रीपाद प्रभु सृष्टि के अथवा कर्म देवता के कार्य कलापों में अनावश्यक दखल नहीं देते. मगर भक्तों की आर्तता श्रीपाद प्रभु को झकझोर देती है और उन्हें योग्य उपाय बतलाने के लिए प्रेरित करती है. श्रीपाद प्रभु के ह्रदय से उमड़ते हुए प्रेम एवँ करुणा के सामने कर्म देवता की शक्ति निस्तेज हो जाती है. कर्म का स्वरूप जड़ होता है. श्रीपाद प्रभु चैतन्य स्वरूप हैं. योग्य समय पर प्रकट होकर वे अपनी चैतन्य शक्ति की सामर्थ्य प्रदर्शित करते है. यह उनका अत्यंत सहज स्वभाव है.

मैं (गुरुदत्त भट्ट) अज्ञानवश स्वयँ को ज्योतिष का महापंडित समझता था. मैं कर्नाटक प्रदेश से आया था इसलिए मैं तेलुगु भाषा भली भाँति बोल नहीं सकता था, मगर संस्कृत का मुझे अच्छा ज्ञान था. मुझे पीठिकापुरम् आने की संधि सौभाग्यवश ही प्राप्त हुई थी. श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के बारे में मैंने अनेक बातें सुनी थीं. मेरे कुलदेवता श्री दत्तात्रेय प्रभु ही हैं. मैं पादगया क्षेत्र वाले  पीठिकापुरम् के कुक्कुटेश्वर मंदिर में दर्शनों के लिए आया था. भक्तिपूर्वक अन्तःकरण से, श्रद्धापूर्वक  मैंने देवता के दर्शन किये. जब मैं ध्यान करने बैठा तो मेरी अन्तःवाणी ने मुझसे स्पष्ट रूप से कहा, “अरे मूर्ख! तुझे मरे हुए कितने दिन हो गए? तू ऐसा कहता है कि मेरा भक्त है और मेरी आरती करके मेरे पैरों पर शीशा नवाता है. क्या तू पादगया आकर मेरे चरणों पर शीश नवा कर मन्नत पूरी करने वाला है? या फिर मेरे पैरों पर सिर पटक-पटक कर मेरा खून सुखाने वाला है?” मुझे यही शब्द बार-बार सुनाई दे रहे थे. मैंने ज्योतिष पंडित होने के कारण अपनी कुण्डली बनाई थी. उस कुण्डली के अनुसार मैं जिस दिन इस शरीर का त्याग करूंगा, उस दिन पादगया क्षेत्र में स्थित श्री दत्तात्रेय प्रभु के सम्मुख होऊँगा. मैंने अपनी नाडी की धक्-धक् को जांचा, नाडी चल ही नहीं रही थी. मैंने अपने ह्रदय पर हाथ रखकर देखा, वह भी बंद था. मैंने आईने में अपना चेहरा देखा. मेरे मुख पर से जीवन के लक्षण लुप्त होकर वह प्रेतवत दिखाई दे रहा था. मैंने हँसते हुए स्वयँ को आईने में देखा, तो मेरा मुख और भी भयानक प्रतीत हुआ. अब मेरे पास गर्व करने के लिए बचा ही क्या था? मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, मानो कोई मृत व्यक्ति पिशाच्च युक्त होकर विकृत प्रेत के समान हँस रहा हो. स्वयंभू दत्तात्रेय के मंदिर के पुजारी का सूक्ष्म शरीर मुझे दिखाई दे रहा था. उसके अत्यंत सूक्ष्म विकार भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे. मेरे मन के कोने में छुप कर बैठा हुआ विवेक जागृत हो उठा. मुझे विश्वास हो गया कि श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के दर्शनों के बिना मेरा दुर्भाग्य समाप्त नहीं होने वाला. देवता आनंद स्वरूप होते हैं. वे आनंद की सर्वोच्च स्थिति में होते है. मेरी स्थिति बड़ी दुखदायक थी. मेरा मन बहुत दुखी था. जब आत्मा शरीर को छोड़कर चली जाती है, तो देह की सभी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं. मेरी आत्मा ने अभी तक शरीर को छोड़ा नहीं था. मानो मैं जीवित होते हुए भी बंधन मुक्त स्थिति में था. मुझ निर्बंध के शरीर के भीतर ह्रदय स्पंदनों को भरकर श्री गुरुदेव ने मुझे एक अनामिक अवस्था प्रदान कर दी थी. अत्यंत निकृष्ट तथा पापी लोगों की बातों में आकर मैं कैसे फंस गया था, इसका ज्ञान मुझे हुआ. “पाषाण रूप की स्वयंभू श्री दत्तात्रेय की मूर्ती ने घंडीकोटा वंश में जन्म लिया था. पाषाण की मूर्ति के भीतर कहीं नाडी का एवँ ह्रदय का स्पन्दन होता है? परन्तु श्रीपाद प्रभु के ह्रदय एवँ नाडी तो स्पंदन करते हैं ना? महालय  अमावस्या का दिन पितृ देवताओं का परम पवित्र दिन होता है. उस दिन कोई  अवधूत आकर भिक्षा स्वीकार करके चला जाता है. वही अवधूत दत्तात्रेय प्रभु हैं, ऐसा स्थानीय लोग मानते हैं. श्रीपाद महाप्रभु ने ही मल्लादी वंश के शालक (दामाद) के रूप में जन्म लिया है, यह कैसी आश्चर्य की बात है! कैसी ये वंचना है!”  ऐसे निकृष्ट बोल सुनकर मैं स्तब्ध रह गया. उस नीच व्यक्ति की बातें सुनकर उन्हें मैं सत्य समझ बैठा और मैं रत्नतुल्य श्रीपाद प्रभु से दूर हो गया. मुझे मनःपूर्वक पश्चात्ताप हुआ.

मैं फ़ौरन भागते हुए श्रीपाद प्रभु के घर गया. दस वर्ष की आयु के श्रीपाद प्रभु आँगन में आए. वे गुरुदत्त भट्ट को देखकर बोले, “आ रे आ, मूरख! जीवित होने का नाटक कर रहा है. तेरे जैसे मृतवत, मानव पिशाच्च को सद्गति मेरी कृपा से ही प्राप्त हो सकती है. तेरे द्वारा किये गए दुष्कृत्यों के फलस्वरूप रौरवादी नरक की यातनाएँ भोग रहे तेरे पितरों को सद्गति प्रदान करने के लिए अवधूत का वेष धारण कर महालय  अमावस्या के पवित्र दिन जो भिक्षा माँगने आया था, वह कौन था, क्या यह तू जानता है? वे दत्तात्रेय कौन हैं, क्या यह तुझे मालूम है? वह दत्तात्रेय मैं ही हूँ. उनका केवल नाम लेने से राक्षस- पिशाच्च थरथर कांपते हैं, वे दत्तात्रेय – अर्थात मैं ही हूँ. मैं तुझे पत्थर की शिला में परिवर्तित कर सकता हूँ, तुझे भूखा रख सकता हूँ और तेरे प्राण भी ले सकता हूँ. तू भले ही जीवित मनुष्य जैसा दिखाई दे रहा है, परन्तु तू मृतवत ही है. तू जीवित होने का नाटक कर सकता है. मैं दत्तात्रेय हूँ, अथवा नहीं, इस पर विचार हम बाद में करेंगे. पहले तू अपने बारे में बता.”

यह सुनकर मैं अत्यंत भयभीत हो गया और थरथर कांपने लगा. तभी सुमति महाराणी आँगन में आईं. वे बोली, “कृष्णा, कन्हैया, यह प्रेतवत, अघोरी आदमी कौन है? तू अन्दर आ, तेरी नज़र उतारती हूँ.” इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “माँ, यह अभी तक अघोरी बना नहीं है, परन्तु इसका अगला जन्म शवों को ले जाने वाले का होने वाला है. उस जन्म से पूर्व यह मेरे दर्शन के लिए आया है. अपने घर का बचा हुआ भात इसे खाने के लिए दो. श्रीपाद प्रभु की माता जी ने बचा हुआ भात लाकर दिया. श्रीपाद प्रभु ने वह गुरुदत्त भट्ट को दिया और उसे लेकर निकल जाने को कहा. गुरुदत्त भट्ट ने वह भात कुक्कुटेश्वर के मंदिर के सामने खाली जगह में बैठकर खाया. उसे खाते ही उसकी दुरावस्था दूर हो गई. वह दुबारा श्रीपाद प्रभु के दर्शन के लिए आया. उस समय श्रेष्ठी श्रीपाद प्रभु को दूकान में लेकर गए थे. श्रीपाद प्रभु पैसे गिनकर तिजोरी में रख रहे थे. स्वयं श्रेष्ठी चावल, जवारी आदि तौल-तौल कर ग्राहकों को दे रहे थे. तभी श्रीपाद प्रभु ने श्रेष्ठी से पूछा, “दादा जी, आज दशमी है. बाबा को कितनी दक्षिणा देने वाले हैं?” तब श्रेष्ठी ने उत्तर दिया, “हम दोनों में कोई परदा नहीं है. तुझे जो चाहिए वह तू ले सकता है, और जो मुझे चाहिए वह मुझे दे दे.: वह दृश्य कितना मनोहारी था! उसका वर्णन करना असंभव है. श्रीपाद प्रभु ने गुड का एक टुकड़ा लेकर मुँह में डाला और एक गुड का टुकड़ा प्रसाद के रूप में श्रेष्ठी को दिया. श्रीपाद प्रभु बोले, “आज मुझे गणेश पूजा करनी थी. वह हो गई. गणेश ने गुड का टुकड़ा मुँह में डालकर नैवेद्य स्वीकार कर लिया. यदि विश्वास न हो तो मेरा मुँह देखिये.” इतना कहकर श्रीपाद प्रभु ने अपना मुँह खोलकर श्रेष्ठी को दिखाया. इस मुँह में कौनसा महारूप उन्हें दिखाई दिया, यह तो श्रेष्ठी ही जानें. उसके बारे में उन्होंने किसी को भी नहीं बताया. वे श्रीपाद प्रभु से बोले, “सोनू! श्रीपाद! जब जब भी गणेश को भूख लगे, तब मुझसे पूछे बिना जितना चाहो, उतना गुड नैवेद्य के लिए लेते रहो.” तभी अखंड सौभाग्यवती वेंकट सुब्बमम्बा वहां आई.

“अरे, शंकर भट्ट! नीच लोगों की बातों में आकर मैं, गुरुदत्त भट्ट, अधोगति को प्राप्त होकर अघोरी जन्म के दुर्भाग्य में फंसने वाला था. परन्तु श्रीपाद प्रभु ने उस दुर्भाग्य से मेरी रक्षा की. यदि उन्होंने मुझे यूँ ही छोड़ा दिया होता, मुझ पर अपनी कृपा दृष्टी न डाली होती, तो मेरा पतन हो गया होता. सद्गुरू को अपने भक्तों पर नि:स्वार्थ प्रेम होता है, इसी कारण वे पूर्व जन्म के कर्मफल से उनको पूर्ण रूप से मुक्त करते है. इसके लिए वे अपना अमूल्य समय एवँ शक्ति खर्च करते हैं.

श्रीपाद प्रभु की जन्म पत्रिका सान्ध्र-सिन्धु वेद की दृष्टी से देखी जा सकती है. श्रीपाद प्रभु के घर में तेलुगु भाषा के साथ-साथ संस्कृत भी बोली जाती थी. हिमालय की पवित्र भूमि पर जो भाषा बोली जाती थी, उसी में श्रीपाद प्रभु, अप्पलराजू शर्मा, बापन्नाचार्युलु वार्तालाप करते थे. संबल प्रांत में बोली जाने वाली भाषा संस्कृत से भिन्न थी. उस भाषा का माधुर्य एवँ उसकी सरलता वर्णनातीत थी. इस भाषा में पीठिकापुरम् में केवल श्रीपाद प्रभु, बापन्नाचार्युलु एवँ अप्पलराजू शर्मा ही बातें कर सकते थे. एक बार सत्यऋषिश्वर नामक एक विद्वान व्यक्ति बापन्नाचार्युलु के साथ थे, तब श्रीपाद प्रभु ने कहा, “नाना जी श्रीकृष्ण सत्य अथवा असत्य वचन नहीं कहते थे. वे केवल कर्तव्य बोधक थे.” इस पर बापन्नाचार्युलु ने कहा, “कन्हैया, हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए, दवा के रूप में भी असत्य नहीं बोलना चाहिए.” यह सुनकर श्रीपाद प्रभु मंद-मंद मुस्काए. उस दिन बापन्नाचार्युलु के घर वेंकट सुब्बय्या श्रेष्ठी आए थे. उनकी एक आतंरिक इच्छा थी कि बापन्नाचार्युलु उनके घर भोजन करके दक्षिणा स्वीकार करें. यह दिन परम पवित्र महालय पक्ष का ही कोई दिन हो, जिससे उनके पितृ देवता संतुष्ट हो जाएँ. बापन्नाचार्युलु उनकी इच्छा पूरी करेंगे अथवा नहीं, इस बात के बारे में उन्हें संदेह था. इस कारण श्रेष्ठी ने श्रीपाद प्रभु के सम्मुख नतमस्तक होकर बापन्नाचार्युलु के सामने अपनी इच्छा प्रकट की. बापन्नाचार्युलु ने महालय पक्ष के दिनों में श्रेष्ठी के घर जाकर भोजन करने और उनसे दक्षिणा स्वीकार करने की अनुमति दी, यह सुनकर श्रेष्ठी के आनंद की सीमा न रही.

श्रीपाद प्रभु बहु चमत्कारी थे.

महालय पक्ष में भोजन का निमंत्रण तो बापन्नाचार्युलु ने स्वीकार कर लिया, परन्तु वे इस बारे में भूल गए. श्रेष्ठी को भी इस बारे में कुछ याद न रहा. महालय अमावस्या की दोपहर हो गई. श्रेष्ठी बापन्नाचार्युलु के घर आये. श्रीपाद प्रभु मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले, “नाना जी, पहले तो वाग्दान करना नहीं चाहिए, यदि करें तो उसके अनुसार व्यवहार करना चाहिए. वाग्दान करके उसे भूल जाना महापाप है. आप दोनों को मैं इस बारे में याद दिला रहा हूँ.” तब श्रेष्ठी और बापन्नाचार्युलु को अपनी गलती का अहसास हुआ. प्राणियों को समझाना कैसे चाहिए और उनकी विस्मृति कैसे दूर करनी चाहिए, ये दोनों कलाएँ श्रीपाद प्रभु को उत्तम प्रकार से अवगत थीं. वे सभी बातों में समर्थ थे. वे उन दोनों को सावधान करते हुए बोले, “आपके  मस्तिष्क में विस्मृति उत्पन्न करने के पीछे मेरा एक उद्देश्य है. प्रत्येक मानव के भीतर ‘मैं मैं करने वाला एक चैतन्य रूप है. प्राणी अपने माता-पिता से न केवल शरीर, अपितु यह चैतन्य रूप भी ग्रहण करता है. इस ‘मैं नामक चैतन्य रूप के सामने इस विश्व प्रणाली में कोई न कोई ज़िम्मेदारी का कर्म होता ही है जिसे उसे निभाना पड़ता है. पिता से पुत्र को, पुत्र से उसके पुत्र को ...इस प्रकार यह परम्परागत बंधन हर प्राणी पर होता ही है. गृहस्थाश्रम त्याग कर जब सन्यासाश्रम स्वीकार किया जाता है तभी इस कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है. आज किया हुआ वाग्दान सीमित होकर नाम स्वरूपात्मक इस जन्म के पश्चात आप दोनों के बीच समाप्त हो जाएगा, ऐसा नहीं है. यह बृहदाकार स्वरूप वाले ‘मैं के चैतन्य में परिवर्तित होने के कारण किसी एक देश में, किसी एक काल में बापन्नाचार्युलु के वंश का कोई एक व्यक्ति श्रेष्ठी के वंश के किसी एक व्यक्ति के घर महालय पक्ष का भोजन करके दक्षिणा स्वीकार करेगा. यह कब, कैसे कहाँ होगा, यह मुझसे न पूछें, क्योंकि कर्मस्वरूप बहुत ही संदिग्धमय होता है, सूक्ष्ममय होता है. किन्हीं किन्हीं कर्मों में भौतिक काल एवँ योग काल भिन्न-भिन्न होते हैं. भौतिक काल की दृष्टि से महालय पक्ष का यह कर्म करके ही उसे समाप्त करना होता है. योग्य काल न हो तो वह कर्म विलंबित हो जाता है.”             

इस पर मैंने (शंकर भट्ट ने) पूछा, “अरे, गुरुदत्त भट्ट! भौतिक काल तथा योग काल से क्या तात्पर्य है? मुझे समझाइये.” श्री गुरुदत्त भट्ट ने कहा, “भौतिक काल-भौतिक देश, मानसिक काल- मानसिक देश, एवँ योग काल – योग देश – इनकी आयु छः से दस वर्ष तक की होती है. यह हमेशा सोलह वर्ष के किशोर की भाँति निरंतर विद्याश्रम में रहता है. उसका भौतिक काल साठ वर्षों का निर्धारित किया गया है, जो शरीर से संबंधित है. उसका मानसिक काल बीस वर्षों का निर्धारित किया गया है. बीस वर्षों के युवक का साठ वर्षों के वृद्ध जितना वज़न होता है. यदि जिम्मेदारियां हों तो उसका काल बीस वर्षों का होता है. यह शरीर से संबंधित है. उसका मानसिक काल साठ वर्षों का है. इस प्रकार भौतिक काल और मानसिक काल एक ही समय खण्ड में मिल जाएँ, ऐसा नियम नहीं है. वह अलग-अलग भी हो सकते हैं.”

 

काशी अथवा पीठिकापुरम् में निवास करने से विविध तापों से मुक्ति. काशीवास का फल – पीठिकापुरम् निवास का फल.

 

 श्रीपाद प्रभु बोले, “मैं कालातीत हूँ. जिस भक्त के मन में काशी में निवास करने की इच्छा है और जो इसके लिए तड़प रहा है, उसे काशी निवास की प्राप्ति होती है. भौतिक दृष्टी से वह किसी भी प्रदेश में हो, परन्तु मानसिक दृष्टि से  उसका निवास काशी में ही होता है. भौतिक दृष्टी से काशी में रहते हुए भी जो गोहत्या करता है उसे काशी निवास का फल प्राप्त नहीं होता. जिस प्रकार गंगाजल में मछलियाँ ढूँढने वाले बगुले को गंगास्नान का लाभ नहीं होता. यदि कोई साधक भौतिक रूप से पीठिकापुरम् में रहता हो और श्रीपाद प्रभु के दर्शन भी करता हो, परन्तु उसका मानसिक काल एवँ मानसिक देश के पीठिकापुरम् में न हो तो वह श्रीपाद प्रभु का भक्त नहीं हो सकता. योग काल एवँ योग देश अध्यात्मिक शक्ति से संपन्न व्यक्ति को ही अवगत होता है. श्रीपाद प्रभु का अनुग्रह किसे और कब मिलेगा यह समझ में न आने वाला गूढ़ रहस्य है. मानव का केवल कर्म करने का अधिकार है.

देह एक क्षेत्र है, यदि उसमें मन न हो तो उसे क्षेत्र निवास का फल नहीं मिलेगा.

सत्कर्म करने से सुख और दुष्कर्म करने से दुःख ही प्राप्त होना अनिवार्य है. पूर्व जन्म के बंधन हमारा पीछा करते रहते हैं. सदगुरु की कृपा से ही इनसे मुक्ति मिलती है. यदि समय (काल) ठीक न हो तो हम किसी भी देश में हों, फिर भी इस कर्म के फल से भाग नहीं सकते. यह एक अत्यंत अनाकलनीय विषय है. पीठिकापुरम् में नरसिंह वर्मा के घर में एक सेवक था. उसका नाम था शिवय्या. एक दिन उसने श्रीपाद प्रभु को देखा. तत्काल उसकी मनोदशा परिवर्तित हो गई. उसने निद्रा एवँ आहार त्याग दिए और असंबद्ध बडबडाने लगा, “मैं सृष्टि, स्थिति एवँ लय का कारण हूँ. मैं ही समूची सृष्टि का आदिमूल हूँ. यह सृष्टि मुझसे ही उत्पन्न हुई है. मेरे कारण ही वृद्धिंगत होकर मुझमें ही लय होने वाली है.” नरसिंह वर्मा को शिवय्या पर बड़ी दया आई. उन्होंने श्रीपाद प्रभु से शिवय्या की रक्षा करने की प्रार्थना की. श्रीपाद प्रभु शिवय्या को लेकर श्मशान गए. साथ में नरसिंह वर्मा भी थे. औदुम्बर वृक्ष की सूखी टहनी रखकर शिवय्या के हाथों उसका दहन करवाया. इसके फलस्वरूप शिवय्या की उस विचित्र मनोदशा से मुक्ति हो गई. नरसिंह वर्मा को यह सब बहुत आश्चर्यजनक प्रतीत हुआ. श्रीपाद प्रभु बोले, :दादा जी, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है. वायसपुर ग्राम नें एक पंडित मुझ पर अत्याचार कर रहा था. वह बार-बार कहता कि वेदस्वरूप परमेश्वर कहाँ और यह कम आयु का श्रीपाद कहाँ? इनकी कैसी तुलना? कहता है कि वह सृष्टि, स्थिति एवँ लय का कारण है, कहता है कि वह आदिमूल है, यह सब मिथ्या है. कुछ ही दिनों में उस पंडित की मृत्यु हो गई और अपने कर्मों के कारण वह ब्रह्मराक्षस हो गया. किसी जन्म में यह शिवय्या उस पंडित का अल्प ऋणी था. मैंने योगकाल की कल्पना करके श्मशान में योगदेश का निर्माण किया और अपने कर्म के फलस्वरूप सूख चुकी इस टहनी का दहन करके उस ब्रह्मराक्षस तत्व से पंडित को मुक्त किया. हमारे शिवय्या को उस ब्रह्मराक्षस के चंगुल से मुक्त कर दिया.”

“अरे, शंकर भट्ट! पीठिकापुरम्  क्षेत्र में अवतरित महातेजस्वी एवँ धर्म ज्योति श्रीपाद प्रभु ने कुरुगड्डी आकर इस क्षेत्र को पवित्र कर दिया. श्रीपाद प्रभु के महासंकल्प से ग्रहों के फलित का निर्णय होता है. किसी भी प्रकार के ज्योतिष फल द्वारा निर्धारित भौतिक काल एवँ भौतिक नियमों का अस्तित्व नहीं होता. उसका निर्णय योगकाल एवँ योगदेश देखकर किया जाता है.”

श्रीपाद प्रभु द्वारा अनुगृहीत प्रारब्ध कर्म मृत्यु को दूर भगा सकता है.

 

श्रीपाद प्रभु द्वारा कल्पित ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक हज़ार वर्षों के उपरांत होने वाली घटनाओं को वे वर्तंमान में ही घटित करवा सकते हैं, इसलिए योग-काल का निर्णय वे ही करते हैं. दूर प्रदेश में घटित होने वाली घटना भी वे अपने निकट ही घटित करवा सकते हैं. अतः योग-देश का निर्णय भी वे ही कर सकते हैं. सभी देश-कालों का संघटन वे ही कर सकते हैं.श्रीपाद प्रभु अपनी इच्छानुसार देश काल परिवर्तित कर सकते हैं. एक बार श्रेष्ठी के घर में उनके देवता के सम्मुख नारियल फोड़ते समय स्वयँ श्रीपाद प्रभु ने वह नारियल फोड़ा. उस नारियल के उन्होंने टुकड़े-टुकड़े कर दिए. श्रीपाद प्रभु ने कहा, “दादा जी, आज आपका मृत्यु योग था, परंतु मैंने नारियल के टुकड़े-टुकड़े करके उसे टाल दिया.”

शाम का सायं संध्या का समय हो गया. श्रीपाद प्रभु से आज्ञा लेकर हम कुरुगड्डी से कृष्णकथवल्ली झरने की और चल पड़े.

.   ।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

बुधवार, 15 जून 2022

अध्याय - २१

 ।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।

अध्याय 21

 

श्री दन्डी स्वामी का कुककुटेश्वर में आगमन

 

साधकों की स्थान शुद्धि, भाव शुद्धि आवश्यक है  

मैं महागुरू की आज्ञानुसार गुरुचरण के साथ मान्चाल ग्राम के दर्शनों के लिए निकल पडा. रास्ते में मुझे बार-बार श्रीपाद प्रभु की लीलाओं का स्मरण हो रहा था. अध्यात्म से संबंधित अनेक विषय मैं श्री गुरुचरण से समझ रहा था. मैंने गुरुचरण से पूछा, “वशिष्ठ ऋषि का अंश – एक व्यक्ति मेरे संस्थान में पुजारी बनकर आयेगा, ऐसा श्रीपाद प्रभु ने कहा था. यह व्यक्ति महाभाग्यवान है. वह व्यक्ति है कौन? वह किस समय आयेगा?” इस पर गुरुचरण बोले, “अरे, शंकर भट्ट! अनेक शताब्दियों के उपरांत उनके जन्म स्थल पर महासंस्थान का निर्माण होने वाला है, ऐसा श्रीपाद प्रभु ने कहा था. उस महासंस्थान में कोई एक महातपस्वी आने वाला है, ऐसा प्रभु का संकल्प था. उस महासंकल्प की पूर्ति के लिए वह महातपस्वी निश्चय ही यहाँ आयेगा. दीर्घ काल तक किये गए ध्यान के कारण, आराधना के कारण, पवित्र मंत्रोच्चारणों के कारण एवँ श्रद्धा पूर्वक किये गए पूजा विधानों के कारण यहाँ की भूमि एवँ वायुमंडल अत्यंत शुद्ध हो गया है. विश्व-अंतराल (अंतरिक्ष) की दसों दिशाओं के भाव तरंग यहाँ सदा के लिए प्रस्फुटित हो गए हैं. जिन भक्तों के मन के भाव पवित्र होते हैं, वे यहाँ के पवित्र स्पंदनों को आत्मसात्त् करते हैं. अपवित्र ह्रदय के भक्तों को अपवित्र स्पंदनों का अनुभव होता है. किसी स्थान के वायुमंडल के भाव तरंग प्रबल शक्ति-संपन्न होकर बिना कोई प्रयत्न किये महापुरुषों के मानसिक चैतन्य को स्पर्श करके अनेक विचित्र पद्धतियों द्वारा उस विशिष्ठ स्थान की ओर आकर्षित होते हैं. इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है. इसके परिणाम स्वरूप स्थल-शुद्धि होने के कारण साधक वहाँ निवास कर सकते हैं. ऐसा उन साधकों के लिए संभव है जिनकी भाव शुद्धि हो गई हो. हमें ऐसे ही साधकों की संगत करनी चाहिए. ऐसे ही साधकों से हमें अन्न अथवा धन स्वीकार करना चाहिए जिनका द्रव्य एवँ अन्न शुद्ध हो. वेदों एवँ वेदान्तों के महापंडित कहे जाने वाले जन्मजात ब्राह्मणों को भी श्रीपाद प्रभु के कृपा कटाक्ष का लाभ नहीं प्राप्त हो सका, परन्तु दोष रहित, अल्पज्ञानी भक्त को सहजता से प्राप्त हो जाता है.

मैं पौण्ड्र देश (ओड़िसा) के जगन्नाथ पुरी क्षेत्र में व्यापार हेतु गया था. वहाँ मुझे श्री जगन्नाथ की मूर्ती में श्रीपाद प्रभु के दर्शन हुए. मेरे साथ आये हुए तीन-चार भक्तों को श्रीपाद प्रभु ने उनके इष्ट देवताओं के रूप में दर्शन देकर तुरंत अपने निज स्वरूप में दर्शन दिए. उन्होंने ऐसा मौन-बोध हमें करवाया कि सभी देवी-देवताओं के रूप में मैं ही हूँ.”

 

दंडी स्वामी का गर्व हरण

जिस दिन हम जगन्नाथ पुरी पहंचे, उसी दंडी स्वामी अपने एक सौ आठ शिष्यों सहित वहाँ आये थे. किसी भी महात्मा को देखते ही उनके चरणों पर नतमस्तक हो जाना – यह हमारी रीत ही थी. हमने दंडी स्वामी के चरणों पर माथा टेका और कैसी अचरज की बात हुई कि तत्काल दंडी स्वामी की वाचा खो गई. वह कुछ भी बोलने में असमर्थ थे. हम सबने श्रीपाद प्रभु के चरणों में नम्र प्रार्थना की कि दंडी स्वामी की वाचा लौट आये. इस प्रार्थना के फलस्वरूप उन स्वामी जी की वाचा लौट आई. दंडी स्वामी के शिष्य श्रीपाद प्रभु के शिष्यों को देखकर कुत्सित भाव से बोले, “श्रीपाद तो एक क्षुद्र मान्त्रिक है. उनके शिष्य भी क्षुद्र मान्त्रिक हैं. उन्होंने अपनी क्षुद्र विद्या का प्रयोग करके दंडी स्वामी की वाचा हर ली. परन्तु हमारे स्वामी जी समर्थ हैं, इसीलिये उनकी वाचा वापस लौट आई और वे स्वस्थ्य हो गए. हमारे गुरू श्री दंडी स्वामी श्रीपाद का सच्चा स्वरूप जनता के सामने लाएंगे. वे पीठिकापुरम् जाकर श्रीपाद वल्लभ के साथ शास्त्रार्थ चर्चा करके उन्हें पराभूत करेंगे और विजय-पात्र लेकर लौटेंगे इसमें कोई संदेह नहीं.” पीठिकापुरम् के निवासियों ने दंडी स्वामी के स्वागत के लिए एक महान रथ की व्यवस्था की थी. हम यह सुनकर निरुत्तर हो गए.

जब कोई भक्त अनन्य भाव से श्रीपाद प्रभु की शरण में जाता है तब वे अपने लीला-विधान से भक्तों की संकट से रक्षा करते हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि समस्याओं का निर्माण भी श्रीपाद प्रभु ही करते हैं, और उनका निराकरण भी श्रीपाद प्रभु ही करते हैं. ऐसी अनेक अंतरमय लीलाएँ करके श्रीपाद प्रभु सब दत्त भक्तों को अपने होने का अनुभव देते हैं.

कुछ दिनों के बाद दंडी स्वामी ने पीठिकापुरम् क्षेत्र में प्रवेश किया. सौभाग्य से मैं (शंकर भट्ट) भी पीठिकापुरम् में था. श्री बापन्नाचार्युलु, श्री अप्पल राजू एवँ श्रीपाद प्रभु के विरोधियों की पीठिकापुरम् गाँव में कमी नहीं थी. श्री दंडी स्वामी ने कुक्कुटेश्वर के मंदिर में जाकर सभी देवी-देवताओं के दर्शन किये. स्वयंभू दत्तात्रेय प्रभु के दर्शन के बाद उन्होंने कहा, “यहाँ विराजित स्वयंभू दत्तात्रेय प्रभु की महिमा अपरंपार है.” आगे बोले कि उनका अवतार श्रीपाद प्रभु का गर्व दूर करने के लिए है. उसी दिन से उन्होंने अपनी संकल्प शक्ति से कुंकुम, विभूति आदि जैसे पदार्थों का निर्माण करके अपने भक्तों को बांटना आरम्भ कर दिया. पीठिकापुरम् के ब्राह्मणों ने वेदमंत्रों सहित दंडी स्वामी का स्वागत किया और उन्हें कुक्कुटेश्वर के मंदिर में ले गए. गाँव में मुनादी करवा दी कि दंडी स्वामी आये हैं. स्वयँ दत्तप्रभू के अवतार – श्रीपाद प्रभु ने दंडी स्वामी की तपस्या पहचानकर उन्हें साष्टांग दंडवत किया. श्री बापन्नाचार्युलु ने दंडी स्वामी के दर्शन करके उनकी शरणागति स्वीकार की. श्री अप्पल राजू शर्मा ने भी दंडी स्वामी के दर्शन करके परंपरानुसार पूजित काले पाषाण की एक मूर्ती उन्हें अर्पण की. वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी की अध्यक्षता में आर्य वैश्य समिति का सम्मलेन हुआ. इस सम्मलेन में यह प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किया गया कि किसी भी परिस्थिति में श्री दंडी स्वामी के कुकृत्यों में श्रीपाद प्रभु, अप्पल राजू शर्मा और बापन्नाचार्युलु सहकार्य नहीं करेंगे. नरसिंह वर्मा की अध्यक्षता में आयोजित की गई क्षत्रिय सभा में भी यही प्रस्ताव पारित किया गया.

श्रीपाद प्रभु अपने ननिहाल के आँगन में स्थित औदुम्बर वृक्ष की छाया में विश्राम कर रहे थे. दिव्य कांति बिखेरने वाले श्रीपाद प्रभु की ओर देखकर श्रेष्ठी का ह्रदय गद्गद् हो गया और उनके नेत्रों से अश्रु बह निकले. बापन्नाचार्युलु, श्री अप्पल राजू शर्मा एवँ श्रेष्ठी – ये तीनों श्रीपाद प्रभु के मुखारविंद की और देखते हुए उनके एकदम निकट बैठे. श्रीकृष्ण के समान दिखाई देने वाले श्रीपाद प्रभु को भूख लगी थी. उनकी नानी राजमाम्बा श्रीपाद प्रभु को खिलाने के लिए एक चांदी की कटोरी में दही-भात लाई. श्रीपाद प्रभु ने बड़े प्रेम से उसे खाया. दहीभात खाने के पश्चात उन्होंने अपने नानाजी से वेदघोष आरम्भ करने के लिए कहा. बापन्नाचार्युलु ने वेदघोष आरम्भ किया. उनके साथ अप्पल राजू शर्मा एवँ स्वयँ श्रीपाद प्रभु भी वेदघोष कर रहे थे. नरसिंह वर्मा तथा श्रेष्ठी ने भी अत्यंत आनंदित होकर सुस्वर में वेदपठन आरम्भ किया. उस वेदघोष के कारण वहाँ का वातावरण किसी ऋषि के आश्रम जैसा पवित्र हो गया था. इसी समय कुक्कुटेश्वर के मंदिर में एक आश्चर्यजनक घटना हुई. स्वयंभू दत्तात्रेय के मुँह के पास दहीभात के कण दिखाई देने लगे. पुजारी ने दो-तीन बार उन्हें पोंछा फिर भी वे कण आते ही रहे. इस प्रकार श्रीपाद प्रभु अद्भुत लीला दिखा रहे थे. दंडी स्वामी अपने शिष्यों समेत वेदघोष करते हुए पीठिकापुरम् से बाहर जाने के लिए निकले. वे सब एक के पीछे एक कदम बढ़ाते हुए चल रहे थे, परन्तु जहाँ से चले थे, वहाँ से आगे ही नहीं बढ़ पा रहे थे. इस विचित्र अवस्था में काफी समय बीत गया. सबको यह देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा था, तभी दंडी स्वामी के हाथ का दंड टूट गया. उसके दो टुकड़े हो गए. दंडी स्वामी को ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके शरीर के ही दो टुकड़े हो गए हों. पीठिकापुरम् के ब्राह्मणों को यह घटना भयभीत कर गई. आज तक के अपने अनुभव से दंडी स्वामी को विश्वास हो गया था कि श्रीपाद प्रभु उनसे कई गुना अधिक शक्ति संपन्न हैं. उनका विरोध करने से अनर्थ होगा – ऐसा उनके मन ने ठान लिया. प्रस्तुत परिस्थिति में अपने गाँव कैसे जाएँ, यह चिंता उन्हें सताने लगी.

मोहनाश ही मोक्ष है

पीठिकापुरम् में अब्बन्ना नामक एक व्यक्ति रहता था. वह साँपों को पकड़कर उनका खेल दिखाता और अपना जीविकोपार्जन करता था. वह बापन्नाचार्युलु के घर आया. उस समय श्रीपाद प्रभु ने कुछ देर के लिए वेदघोष रोकने के लिए कहा. अब्बन्ना को भरपेट भोजन दिया. फिर उससे कहा कि “यहाँ से एक बर्तन में पानी लेकर कुक्कुटेश्वर के मंदिर में आओ. श्री दत्त प्रभु के एक अवतार को करचरणद्वय संचार करते हुए भी जिन्होंने उसकी अकारण निंदा की है, ऐसे महापापी लोग कुक्कुटेश्वर के मंदिर में हैं. उन्हें मृत्यु के पश्चात पिशाच्च योनि प्राप्त होगी ऐसा चित्रगुप्त ने घोषित किया है, मैंने चित्रगुप्त से संवाद करके उनके पापों के परिहार के लिए एक उपाय सोचा है. भूमाता ने मुझसे ऐसी ही विनती की है. तू वहाँ जाकर भूमाता को मेरा सन्देश दे कि वह शांत रहे. श्रीपाद प्रभु के दर्शनों के लिए उत्सुक भक्तों को तेरी सम्मति लेनी पड़ेगी. उन पर तू यह जल छिड़कना. मेरे पूर्वआदेशानुसार तू मादिगा सुब्बय्या के घर जाकर सबको दही-भात का महाप्रसाद दे. अब्बय्या, सुब्बन्ना आदि वहीं गए हैं; वे सबको बापन्नाचार्युलु के घर लेकर आयेंगे.” श्रीपाद प्रभू  उग्र स्वर में आगे बोले, “अरे दंडी स्वामी! एक महान तपस्वी होकर भी कितना गर्व करते हो? तुम जिसकी दत्त स्वरूप में आराधना करते हो, वही श्रीपाद श्रीवल्लभ का रूप धारण करके भक्तों के उद्धार के लिए अवतरित हुए हैं. उन्हें न पहचानने वाले तुम, महामूर्ख हो. तुम्हारे शिष्य भी तुम्हारे ही जैसे मूर्ख हैं. पीठापुरम के तुम्हारे नए शिष्य अज्ञानी हैं. तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो? समूची सृष्टि पर शासन करने वाली एकमेव सत्ता के सामने तुम्हारा अस्तित्व है ही कितना! तुम्हारी सामर्थ्य ही कितनी है! दैव दूषण जैसा महापाप करने के कारण तुम्हें अनेक शतकों तक पिशाच्च योनि में रहना पडेगा. मैं वह निर्णय रद्द करता हूँ. मानव जीवन प्राप्त करके तुम सब लोग नीच जाति में जीवन बिताने वाले हो, ऐसा आदेश दिया है. तुम्हारे पापों का परिहार मैं तुम्हें बहुत कम सज़ा देकर कर रहा हूँ. श्रीपाद श्रीवल्लभ स्वरूप महा अग्नि के समान है. अग्नि से खेलोगे तो बड़े प्रमाद की संभावना है. जब मेरी माया को, अथवा मुझे ही अभिन्न स्वरूप में जान लिया हो तो मोक्ष का अर्थ क्या है, ऐसा तुम विचार करते हो. वास्तव में देखा जाए तो मोह का क्षय ही मोक्ष है. किसी भी जीवात्मा को, जो सच्चिदानंद स्वरूप के आनंद का अनुभव करता है, उसकी योग्यतानुसार मैं अनुगृहीत करता हूँ. जो जीवात्मा मेरे आदिस्वरूप ‘दिव्यानंद परवश” में अनंत सुख स्वरूप में रहने की इच्छा करता है, उसे मैं तुरंत वह स्थिति प्राप्त करा देता हूँ. मेरी दृष्टी में निर्गुण-निराकार, सगुण-साकार, मोक्ष-बंधन ऐसा भेद ही नहीं है. मैं प्रत्येक क्षण असंख्य नूतन लोकों की सृष्टि, स्थिति, एवँ लय में व्यस्त रहता हूँ. जीवात्मा की उन्नत स्थिति अथवा उन्नत आनंद अवस्था के लिए कोई सीमा नियत नहीं है. जो साधक मृत्योपरांत मेरे स्वरूप में लीन होने की अच्छा करते हैं, वे मेरे स्थान पर अवश्य आयें मैं उस स्थिति में कितने शतकों तक रहें, किस लोक में पुनर्जन्म को प्राप्त हों, इस सबका निर्णय मैं अपनी इच्छा से करूंगा.  

समूचे विश्व रूपी नाटक का सूत्रधार, मैं, इस समय साकार रूप में तुम्हारे सामने हूँ. तुम मुझे अभी मेरे साकार रूप में देख रहे हो. निर्गुण-निराकार अवस्था में होते हुए भी मैं हमेशा तुम्हारी और देखता रहूँगा, यही कहने के लिए मैंने साकार रूप धारण किया है. उस महान उन्नत स्थिति से मैं तुम्हारे लिए नीचे उतर कर आया हूँ. महायोगी की योग शक्ति का उपयोग लोक कल्याण के एवँ लोक रक्षण के लिए करना चाहिए. लोक से तात्पर्य केवल भूलोक से नहीं है. अपने से कम, अर्थात नीच अवस्था में, निःसहाय स्थिति में पड़े हुए जीवों की सहायता करना मानव धर्म है. मैं धर्ममार्ग, कर्ममार्ग, योगमार्ग, भक्तिमार्ग एवँ ज्ञानमार्ग का बोध कराने के लिए अवतरित हुआ हूँ. मैं सभी धर्मों के मूल में जो स्थित है ऐसा एकमेव धर्म, सभी सत्य का मूल – एकमेव सत्य एवँ सभी कारणों का कारण  - एकमेव कारण हूँ. मेरी इच्छा के बिना इस सृष्टि में कुछ भी घटित नहीं हो सकता. ऐसा कुछ भी इस सृष्टि में नहीं है, जिसमें मैं नहीं हूँ. मैं हूँ – इसलिए तू है, यह सृष्टि है, इससे भिन्न कोई और सत्य मैं तुम्हें क्या समझाऊँ? तू हिमालय पर्वत पर जाकर निःसंग होकर तपाचरण कर. तुझे शिष्यों की कोई आवश्यकता नहीं. तू मोक्ष को प्राप्त हो अथवा तेरा उद्धार हो, इससे इस सृष्टि की अथवा मेरी कोई हानि नहीं होने वाली. सृष्टि के सारे व्यवहार उचित ढंग से चलते रहेंगे. यह समझ लेना तेरे लिए आवश्यक है. यदि तू अपने साथ पीठापुरम् के शिष्य ले जाएगा तो ऐसा प्रतीत होगा  मानो ऊँट की शादी में गधों का संगीत हो रहा है. ऊँट के सौन्दर्य की स्तुति गधा करे और गधे के गान-माधुर्य की प्रशंसा ऊँट करे – ऐसा प्रतीत होगा. एक दूसरे की प्रशंसा करने से यथार्थ स्थिति कभी बदलती नहीं, वह अलग ही होती है.”

 

अरुंधती – वशिष्ठ संबंध

इस पर मैंने पूछा, “अरे, गुरुचरण, अरुंधती माता का जन्म चांडाल वंश में हुआ, ऐसा मैंने सुना है. तो फिर उनका विवाह वशिष्ठ ऋषि के साथ किस प्रकार हुआ?” इस पर गुरुचरण बोले, “प्राचीन काल में वशिष्ठ ऋषि ने एक हज़ार वर्षों तक तप किया था. उस समय अक्षमाला नामक चांडाल कन्या ने उनकी उत्तम प्रकार से सेवा की थी. उसकी सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि ने उसे वर माँगने के लिए कहा. इस पर वह कन्या बोली, “मेरी ऐसी इच्छा है कि वशिष्ठ ऋषि मेरे पति हों.” तब वशिष्ठ ऋषि ने कहा, “अक्षमाला! तू एक चांडाल कन्या है. मैं एक सत्शील ब्राह्मण हूँ. मैं तुझे पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकता हूँ?” यह सुनकर अक्षमाला ने कहा, “पहले तो आपने मुझे वर माँगने के लिए प्रेरित किया. और अब, जब मैंने अपना इच्छित वर माँगा, तो आप अपने वचन से पीछे क्यों हट रहे हैं?” वाक् दोष के भय से वशिष्ठ मुनि बोले, “क्या तुम अपना देह मेरी इच्छानुसार परिवर्तित करने की सम्मति देती हो?” अक्षमाला इस बात के लिए राजी हो गई. वशिष्ठ ऋषि ने उसे भस्म करके फिर जीवित कर दिया. इस प्रकार उन्होंने अक्षमाला को सात बार भस्म करके सात बार पुनर्जीवित किया. सातवें जन्म में अक्षमाला के चांडाल वंश के सारे दोष नष्ट होकर वह अत्यंत पवित्र हो गई. तब वशिष्ठ ऋषि ने उसके साथ विवाह किया. वशिष्ठ ऋषि द्वारा किये गए शुद्धिकरण का विरोध न करने के कारण उसका नाम अरुंधती पडा, और वह इसी नाम से प्रसिद्ध हुई. यह वृत्तांत वशिष्ठ गोत्रोत्पन्न श्री नरसिंह वर्मा को श्रीपाद प्रभु ने बताया था. शूद्र जाति  में जन्म होने पर भी ब्राह्मणोचित कर्म करने वाला सातवें जन्म में उपनयन के उपरांत ब्राह्मण पद को प्राप्त हो जाता है. उस समय समाज के चतुर्वर्ण का विभाजन कर्मों के अनुसार होता था. समाज की दृष्टी से यह योजना हितकर थी, परन्तु कुछ कालावधि के पश्चात यह विभाजन कर्म पर आधारित न होकर जन्म पर आधारित होने लगा. प्राचीन काल में यदि ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति ब्राह्मणोचित कर्म न करके वाणिज्य में लीन रहता था, तो वह वैश्य वर्ण के लिए अनुकूल समझा जाता था. इसी प्रकार यदि कोई क्षत्रिय अत्यंत सात्विक वृत्ति का होता और उसे ब्राह्मणोचित कार्यों में अधिक रूचि होती, तो वह ब्राह्मण पद के लिए योग्य समझा जाता था. श्री दत्त प्रभु पर विश्वास करने वाले साधकों को वे उन्नत स्थिति में रखकर उनकी योग्यतानुसार उन्हें शिष्यत्व प्रदान करते. उनके भक्तों का जन्म चाहे किसी भी कुल में हुआ हो, अथवा वे किसी भी परिस्थिति में हों, श्री दत्त प्रभु अपने भक्तों को सुखी जीवन के लिए आवश्यक आयु, आरोग्य एवँ ऐश्वर्य प्रदान किया करते. भक्तों को जन्म-जन्मान्तरों के कर्मबंधन तोड़कर उन्हें उन्नत स्थिति में रखना – यह श्रीपाद प्रभु की सहज लीला थी.

 

 

दत्त भक्तों को स्वामी का अभय वरदान

हम श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की महिमा को भली भाँति समझने के उद्देश्य से मान्चाल ग्राम आये. मान्चाल की ग्रामदेवता ने दर्शन देकर हमें धन्य किया. उसने अपने दिव्य हस्त से हमें प्रसाद दिया. ग्राम देवता ने कहा, “ प्राचीन काल में प्रहलाद को गुरूबोध देने वाले श्री दत्तात्रेय प्रभु ही श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में अवतरित हुए हैं. श्रीपाद प्रभु की इच्छा (संकल्प) अनाकलनीय होती है. आगामी शताब्दी में प्रहलाद के सार्वभौम गुरू अवतरित होंगे. यह प्रदेश मंत्रालय के नाम से प्रसिद्ध होगा. ऐसा श्रीपाद प्रभु ने स्वयँ मुझसे कहा था. तुम्हारा सब शुभ मंगल हो,” ऐसा कहते हुए वह अपने पूर्व रूप में लौट गईं. हम वहाँ से निकल ही रहे थे कि वहाँ कृष्णदास नामक व्यापारी आया. मान्चाल ग्राम देवता ने उसे भी प्रसाद दिया और फूलों की एक माला भी दी.

हम तीनों (मैं, गुरुचरण और कृष्णदास) कुरुगड्डी के लिए निकल पड़े. सभी दत्त भक्तों का कुल एक ही होता है. उन्हें श्री दत्तात्रेय का प्रसाद किसी भी कुल का भक्त दे, तो भी वे बड़े प्रेम से उसे स्वीकार करते हैं. हमारे साथ कृष्णदास के आ जाने से हम बड़े उत्साहित हो गए थे: बातें करते-करते कृष्णदास प्रसंगवश बोले, “यज्ञादि कर्म के लिए दी जाने वाली दक्षिणा सोलह, एक सौ सोलह अथवा एक हज़ार सोलह होनी चाहिए. यह संख्या श्रीपाद प्रभु द्वारा उल्लेखित २४९८ इस संख्या के ही सामान है. जिस प्रकार परमात्मा से संसार का निर्माण होता है, उसी प्रकार पिता द्वारा पुत्रों का निर्माण होता है. विवाह के समय दूल्हा होमकुण्ड के अग्नि देवता से प्रार्थना करता है कि, “हे अग्निदेव, मुझे इस वधु से दस पुत्रों की प्राप्ति हो.” दस कन्या-पुत्रों की प्राप्ति होने के पश्चात वह पत्नी को माता के स्वरूप में देखे ऐसा शास्त्रों का वचन है.”

कृष्णदास आगे बोले, “ ‘पूर्ण इस शब्द का अर्थ – ‘निर्गुण’ यह समझना चाहिए. इसलिए उसे रूद्र रूप समझा जाता है. समस्त विश्व का लय होने के पश्चात जो शेष बचता है, वह ‘शून्य ही है. इस महाशून्य में ही सबका लय होता है. विष्णुस्वरूप का तात्पर्य है ‘अनंत धर्मतत्व से. सृष्टि के ‘स्थिति स्वभाव के लिए अनंत तत्व अत्यंत आवश्यक है.”

श्रीपाद प्रभु का षोडश कला पूर्णत्व

गुरुचरण बोले, “अरे, शंकर भट्ट, किसी भी वस्तु के यदि अनगिनत टुकड़े किये जाएँ, तो उनमें से प्रत्येक टुकड़ा शून्य के समान ही होता है. इस प्रकार के अनेक शून्य जब एकत्रित हो जाते हैं, तो उन्हें एक विशेष, मर्यादित आकार प्राप्त हो जाता है. इसी कारण से शिव एवँ केशव अभिन्न हैं. पंचभूतात्मक सृष्टि विष्णुस्वरूप ही है. दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाले वीरभद्र से श्री विष्णु ने कहा, “मूल प्रकृति तथा ईश्वर के निमित्त से देखा जाए तो पार्वती माता, राक्षसों से युद्ध करने वाली दुर्गामाता तथा कोपावस्था में स्थित कालिका माता – ये सभी मेरे ही रूप हैं. श्रीपाद प्रभु को षोडश  कला सम्पन्न कहने का आशय यही है। सोलह वर्ष की आयु में ही श्रीपाद प्रभ पीठिकापुर छोड़कर चले गए। वे स्वयँ ब्रह्मा, विष्णु एवँ रुद्र स्वरूप होने के कारण उन्हें षोडश कला परिपूर्ण माना जाता है।

श्रीपाद प्रभु का अवतार सावित्री काठक यज्ञ का फल है.

सभी प्राणियों की बुद्धि को प्रेरित करने वाली और सभी मंडलों के केंद्र में स्थित दिव्य तेज ही गायत्री माता है. गायत्री माता के चौबीस प्रतीक हैं : नौ (९) यह संख्या ब्रह्मा के स्वरूप का प्रतीक है. आठ (८) महास्वरूप की द्योतक है. त्रेतायुग में भारद्वाज ऋषि ने पीठिकापुरम् क्षेत्र में सावित्री काठक यज्ञ का आयोजन किया था. उस समय ऋषियों द्वारा की गई भविष्यवाणी के अनुसार आज पीठिकापुरम् में श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का अवतार हुआ है. वे शक्तिस्वरूप हैं, अर्धनारी नटेश्वर हैं, अपने इस स्वरूप में वे साधकों की बुद्धि तथा सत्प्रवृत्ति की उन्नति करते हैं, उन्हें धर्ममार्ग से जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करते हैं. यह उनके इस महाअवतार की विशेषता है. उनके क्रोधपूर्ण वाक्यों का तथा लीलाओं का व्याकरण अनाकलनीय है. इस नए व्याकरण के रचयिता वे स्वयँ ही होने के कारण केवल वे ही इसे समझ सकते हैं. मुझे (शंकर भट्ट को) कृष्णदास से अनेक नई-नई बातों का ज्ञान प्राप्त हुआ. पांडित्यपूर्ण, परन्तु अहंकारी साधकों को श्रीपाद प्रभु का कृपा कटाक्ष प्राप्त नहीं होता था.  

कृष्णदास आगे बोले,श्रीपाद प्रभु पिपीलिका से ब्रह्मा तक सर्वत्र व्याप्त हैं. एक बार नरसिंह वर्मा के खेत में श्रीपाद श्रीवल्लभ एवँ वर्मा विश्राम कर रहे थे. तभी वहाँ दो नाग आये. श्रीपाद प्रभु ने बड़ी कुशलता से उन्हें मार कर दूर फेंक दिया. नरसिंह वर्मा गहरी नींद में थे. उनके निकट अत्यंत बड़े आकार की लाल-लाल चीटियाँ आ गईं. इतनी बड़ी चींटियों को पहले कभी किसीने नहीं देखा था. उनके काटने से वर्मा की नींद न टूटे इसलिए श्रीपाद प्रभु ने उन सभी चीटियों को मार डाला. मारी हुई चीटियों का एक छोटा-सा ढेर बन गया था. थोड़ी देर में वर्मा जाग गए. उन्हें मरी हुई चीटियों पर दया आई. उस समय श्रीपाद प्रभु ने मंद मुस्कान से कहा, “राजा को अपने सेवकों की रक्षा करनी ही पड़ती है. यह प्रकृति का नियम ही है. इन अद्भुत चीटियों को बनाने वाला एक अद्भुत जादूगर है.” तभी वहाँ एक सफ़ेद रंग की चींटी आई. वह आकार में अन्य चीटियों से बड़ी थी एवँ कांतिवान थी. वह रानी चींटी थी. उसने मरी हुई चीटियों के चारों और एक प्रदक्षिणा की और आश्चर्य की बात यह हुई कि सभी मरी हुई चींटियाँ जीवित हो उठीं और वहाँ से चली गईं. श्रीपाद प्रभु मंद मंद मुस्कान से बोले, “इन चीटियों की रानी को संजीवनी शक्ति प्राप्त है, इसलिए उसने सब चीटियों की रक्षा की. इस प्रकार की अनेक विस्मयकारी बातें इस सृष्टि में हैं.” वे आगे बोले, “यदि आपकी इच्छा हो तो मैं हर पल आपको अनेक लीलाएँ दिखा सकता हूँ.” तभी नरसिंह वर्मा का ध्यान उन मरे हुए नागों की और गया. उन्हें देखकर वे चकित हो गए. वे जान गए कि यह भी श्रीपाद प्रभु की ही लीला है. श्रीपाद प्रभु ने एक नाग को सहलाया और दूसरे को अपने दिव्य चरण से स्पर्श किया. वे दोनों नाग जीवित होकर श्रीपाद प्रभु की एक प्रदक्षिणा करके निकल गए.

वे नाग क्यों आये थे? श्रीपाद प्रभु ने उनके साथ ऐसा क्यों किया? इस बारे में पूछने पर उन्होंने उत्तर दिया, “राहु ग्रह का बल प्राप्त न होने से प्राणियों को अनेक संकटों से जूझना पड़ता है, और उन्हें बंधनों में जकडे होने का अनुभव होता है. इसीको कुछ लोग काल-सर्प योग कहते हैं. राहू सभी देवताओं की आदि देवता है, इस प्रकार से आये हुए संकटों का निवारण किस प्रकार किया जाए यह कोई भी नहीं जानता. परन्तु मैं उन सबके दोष दूर करके उन्हें सुख संतोष प्राप्त हो ऐसी योजना बनाता हूँ.”

हम कुशलता पूर्वक कुरुगड्डी पहुँच गए. श्रीपाद प्रभु के मंगलमय दर्शन किये. उन्होंने हँस कर हमें आशीर्वाद दिए.

            ।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

Complete Charitramrut

                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...