रविवार, 24 जुलाई 2022

अध्याय - ३९

  

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय – ३९

नागेन्द्र शास्त्री के साथ

 मैंने कालनाग मणि स्वीकार किया और अपनी यात्रा पर चल पडा. श्री पीठिकापुरम् क्षेत्र पहुँचने की तीव्र इच्छा थी. शीघ्रातिशीघ्र पहुँचना चाहता था.

 

काल नाग का स्वरूप

रास्ते में हमने एक ब्राह्मण का आदरातिथ्य स्वीकार किया. ब्राह्मण का नाम नागेन्द्र शास्त्री था. वह मन्त्र शास्त्र विद्या में अति निपुण था. उसके घर में अनेक नाग और सर्प निर्भयता से घूम रहे थे. वे किसी को काटते नहीं थे. नागेन्द्र शास्त्री इन नागों तथा सर्पों की देखभाल अपनी संतान की भाँति करता था. वे उसके शरीर पर खेलते रहते.

दिव्य नागों के पास मणि होती है. अनेक वर्षों से नागेन्द्र शास्त्री नागोपासना कर रहा था. उसने पूजा हेतु “कालनाग मणि” प्राप्त करने के लिए नाग देवता की अखंड आराधना की थी.

 

 

नागमणि का प्रभाव

नागेन्द्र शास्त्री ने हमसे कहा, “बंधुओं! आज का दिन अत्यंत शुभ है. आप जैसे थोर व्यक्तियों के  चरण कमल मेरी कुटिया में पधारे. पंद्रह वर्ष की आयु में मैं श्रीपाद प्रभु के दर्शन के लिए गया था. पीठिकापुरम् क्षेत्र के कुक्कुटेश्वर मंदिर एवँ पादगया क्षेत्र के दर्शन किये. मंदिर में स्वयंभू दत्तात्रेय की मूर्ति के निकट एक काल नाग को देखा. उसके फन पर एक मणि थी. काल पर शासन करने वाले नाग को कालनाग कहते हैं. कालनाग के फन पर मणि होती है और वह किसी महर्षि के समान योग ध्यान में मग्न रहता है. मानवों के ही समान नागों की भी विभिन्न स्थितियाँ होती हैं. साधारणतः कालनाग मनुष्य को दिखाई नहीं देता. कालनाग के फन पर स्थित मणि में मंगल गृह से आते हुए अशुभ स्पंदनों का निवारण करने की शक्ति होती है. इस नागमणि के कारण अशुभ स्पंदन लुप्त होकर शुभ स्पंदन उत्पन्न होते हैं. इन मंगलदायी स्पंदनों से मंगल ग्रह से पीड़ित व्यक्तियों की पीड़ा नष्ट होकर उन्हें शुभ फल की प्राप्ति होती है. यदि जन्म कुण्डली में मंगल ग्रह उचित स्थान पर न हो तो जीवन में अनेक कठिनाइयाँ आती हैं, जैसे कि घर वालो का विरोध, बांधवों का, मित्रों का विरोध, ऋण-बाधा, कन्या के विवाह में अकारण विलंब, किसी भी काम को करने की सामर्थ्य होते हुए भी उसमें यश प्राप्ति न होना इत्यादि. स्वयंभू दत्तात्रेय के दर्शन के पश्चात मेरे मन में नागमणि को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई. ऐसा प्रतीत हुआ मानो उस मणि को प्राप्त करके जीवन में सब कुछ प्राप्त हो जाएगा.

 

श्रीपाद प्रभु की चरण पादुकाओं की महिमा;

 नाग दोष निवारणार्थ नियम

मैं नरसिंह वर्मा के घर के निकट से जा रहा था. श्रीपाद प्रभु उनके घर के सामने के आँगन में लीला विनोद कर रहे थे. साथ में पेड़ों को पानी भी डाल रहे थे. श्री नरसिंह वर्मा पेड़ों के चारों और क्यारियाँ बना रहे थे. उनके आँगन में एक औदुम्बर वृक्ष था. उसे पानी भली प्रकार से प्राप्त हो, इसलिए नरसिंह वर्मा जब उसके चारों और क्यारी बना रहे थे, तभी उनके हाथों में श्रीपाद प्रभु की ताम्र पादुकाएं आईं. उस बारह वर्ष के बालक की वे चरण पादुकाएं सामुद्रिक शुभ लक्षणों से युक्त थीं. तभी मेरे कानों में “नागेन्द्र शास्त्री” ऐसी पुकार आई. मैं आश्चर्य से उनके निकट गया. नरसिंह वर्मा उन चरण पादुकाओं को शुद्ध जल से, एवँ उसके पश्चात नारियल के जल से धो रहे थे. उन्हें धोकर नरसिंह वर्मा ने श्रीपाद प्रभु के चरण कमलों के पास रखा. वर्मा उन चरण पादुकाओं की पूजा करने के लिए अत्यंत उत्सुक प्रतीत हो रहे थे, परन्तु श्रीपाद प्रभु की इच्छा कुछ और ही थी. उन्होंने उन चरण पादुकाओं को बड़े प्रेम से सहलाया और नागेन्द्र शास्त्री से बोले कि वे एक पीठ की स्थापना करके इन चरण पादुकाओं की पूजा करें. प्रभु बोले, “नागेन्द्र शास्त्री, तू ‘कालनाग मणि की प्राप्ति के लिए बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था. मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, कालनाग जिन दिव्य पादुकाओं की आराधना करके अपनी दिव्य मणि से जिस स्वामी की पूजा करता है, वह महास्वामी मैं ही हूँ. ये दिव्य पादुकाएं मेरी ही हैं. इन्हींकी तुम नित्य नियम पूर्वक पूजा करते रहो. आधि-व्याधि से पीड़ित जन तुम्हारे पास आयेंगे. उन्हें इन चरण पादुकाओं का तीर्थ देना. इसे प्राशन करते ही उन्हें व्याधियों से मुक्ति प्राप्त होकर शान्ति मिलेगी.” इसके पश्चात श्रीपाद प्रभु ने नागदोष परिहारार्थ दी जाने वाली दक्षिणा के बारे में विस्तार से बताया और बोले, “अरे नागेन्द्र शास्त्री! मेरे इन वचनों का तुम पालन करना. लोक कल्याण के लिए ही नागशास्त्र विद्या का उपयोग करना.”

दत्त प्रभु की आराधना करने वाले भक्तों को प्राप्त विशेष फल

 

श्रीपाद प्रभु बोले, “हे नागेन्द्र शास्त्री! कालान्तर से शंकर भट्ट एवँ धर्मगुप्त तुम्हारे पास अवश्य आयेंगे. मेरी दिव्य चरण पादुकाओं के कारण तुझे दिव्य कालनाग मणि अवश्य प्राप्त होगी, तब तक तू नित्य नियम से मेरी दिव्य पादुकाओं की आराधना करना. जिस प्रकार शरीर धर्म का भी एक काल होता है, उसी प्रकार मन का, प्राण का भी एक काल होता है, परन्तु आत्मा कालातीत है. प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र के अनुसार वह एक विशेष काल होता है. वृद्धि अथवा क्षय कालानुसार होते रहते हैं. अनेक ब्रह्मांडों का जन्म होकर उनकी वृद्धि होती है. कुछ काल तक वे एक स्थिति में रहते हैं, तत्पश्चात वे सब विलीन हो जाते हैं. यह अंत ही काल-महिमा है. इस प्रकार का काल-स्वरूप भी मेरे ही आधीन है. मेरी आराधना करने वालों के काल पुरुष को मैं सदा अनुकूल रखता हूँ. दत्त आराधना करने वाले साधकों का भूत-प्रेत पिशाच्चादि शक्तियां भी कुछ भी बिगाड़ नहीं सकतीं; उनका बुरा नहीं कर सकतीं. इस सृष्टि में विद्यमान सभी प्राणियों से अधिक बलवान मैं ही हूँ. मुझसे ही बल प्राप्त करके जीवराशियाँ वृद्धिंगत होती हैं. गर्व से मदोन्मत्त हुए मानव से मैं अपना बल वापस ले लेता हूँ. गर्व के लिए, अहंकार के लिए तथा अन्य सभी अनिष्ट स्वरूप की घटनाओं के लिए मैं ही कारणीभूत हूँ. मेरी आराधना करते हुए, सदा शांत चित्त होकर रहने वालों को मैं नित्य संतुष्ट रखता हूँ, उन्हें आनंद प्रदान करता हूँ.

उन महापुरुषों ने श्री वर्मा के घर मेरे भोजन की व्यवस्था की थी. श्री वर्मा स्वयँ भी अन्नदाता हैं. दत्तात्रेय प्रभु को अन्नदान बहुत प्रिय था. कोई भी प्राणी यदि भूखा रहता, तो उन्हें बड़ी दया आती थी. वे उसके भोजन की व्यवस्था करते. वे सर्वभूत हितकारी थे. मैं महास्वामी की आज्ञा लेकर निकल पडा. इस स्थान पर मैंने आश्रम बनाया. जो भी कोई मेरे पास आता उसे मैं वर्णाश्रम धर्म के बारे में समझाता. श्रीपाद प्रभु ने मुझसे कहा, “अपनी मन्त्र शास्त्र विद्या का प्रयोग अच्छे कामों के लिए करना. पंडितों की निरपेक्ष भाव से सेवा करना. लोगों द्वारा केवल स्वेच्छा से दिए गए धन का ही  स्वीकार करना. अधिक धन की अपेक्षा न करना.”

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

शनिवार, 23 जुलाई 2022

अध्याय - ३८

 

 

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय – ३८


बगुलामुखी देवी की आराधना

पीठिकापुरम् के रास्ते पर हमें एक बैरागी मिला. वह एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा था. उसकी आंखें बड़ी तेजस्वी थीं. हमें देखते ही बैरागी ने पूछा, ‘क्या आप लोग शंकर भट्ट और धर्मगुप्त हैं? हमने “हाँ” कह दिया. वह बोला, “इस पीपल के पेड़ की छाया में कुछ देर विश्राम कर लो. आपके पास श्रीपाद प्रभू की चर्म पादुकाएं हैं न, वे मुझे दे दो और मुझसे कालनाग मणि स्वीकार करो.” हमने उसकी बात मान ली और उसे चर्म पादुकाएं देकर उससे वह दिव्य मणि ले लिया.

मैंने उस बैरागी से कहा, “महाराज! मैंने श्रीपाद प्रभु के दिव्य चरित्र के लेखन का संकल्प किया है. उनके जीवन में घटित प्रत्येक वर्ष की घटनाओं का मैं श्रीपाद प्रभु के भक्तों के सम्मुख वर्णन करता हूँ. इन लीलाओं का श्रवण करके वे आसानी से भव सागर पार कर जाते हैं. इस सब के लिए मैं तो केवल निमित्त मात्र हूँ.”

इस पर बैरागी बोला, “श्रीपाद श्रीवल्लभ आदिभैरव एवँ आदिभैरवी का संयुक्त रूप हैं. काल के ऊपर शासन करने वाले कालभैरव भी वे ही हैं, वे कालस्वरूप हैं, कालपुरुष उनसे भिन्न नहीं है, महाकाल स्वरूप भी वे ही हैं. किस समय कौनसी घटना घटित होगी इसका सम्पूर्ण ज्ञान उन्हें ही होता है. इसलिए अव्यक्त रूप में स्थित श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु के संकल्प स्वरूप को समझना देश तथा काल की परिधि में कैद प्राणी के लिए संभव नहीं है. देश एवँ काल के साथ क्रीडा, प्राणियों का विकास, धर्म, कर्म – उनका फल तथा उनका प्रभाव पूरी तरह से श्रीपाद प्रभु के आधीन होता है. ज्ञान का अभाव होते हुए भी स्वयँ को महापंडित समझने वाले लोगों का गर्व वे तत्काल हरण करते हैं एवँ उन्हें अहंकार रहित करते हैं. इसी प्रकार विनयशील, नम्र परन्तु ज्ञान रहित साधकों को वे अपनी कृपा दृष्टी से पंडित बना सकते हैं. उनका यह अवतार योग संपन्न अवतार है. वे अवतारी पुरुष हैं; प्रत्यक्ष श्री दत्तात्रेय के अवतार हैं, यह समझने के लिए प्राणी की पाप राशियों को पहले दग्ध होना पड़ता है  , और पुण्य राशियों को संचित होना पड़ता है. यह सर्व साधारण नियम है. उनका कृपा कटाक्ष प्राप्त होने पर इस साधारण नियम को दूर करके वे भक्तों की रक्षा करते हैं. श्रीपाद प्रभु के चरित्र का पठन करने वाले भक्तों का एक क्रमबद्ध पद्धति से विकास होता है. उनके जीवन के प्रत्येक वर्ष में घटित एक या दो दिव्य लीलाएँ साधक समझ सकता है. वे क्रमानुसार ही समझ में आयें, यह भी उन दिव्य लीलाओं का अंतर्भाव है. श्रीपाद प्रभु ने केवल एक देश अथवा एक ही प्रांत के लोगों के उद्धार के लिए अवतार नहीं लिया है.

प्रतिक्षण अनंत कोटि ब्रह्मांडों का निर्माण, स्थिति एवँ लय होता रहता है. उनका परिणाम क्रम भी श्रीपाद प्रभु के अधिकार में होता है. उनके दिव्य नेत्र गोलकों में कोटि-कोटि ब्रह्मांडों की वृद्धि तथा क्षय होता रहता है. यही उनका निज तत्व स्वरूप है. उनका निराकार स्वरूप ही परतत्व है. अव्यक्त स्वरूप में विद्यमान उनके स्वरूप को कोई भी जान नहीं सकता है. उनके महातत्व का साकार रूप में पीठिकापुरम् में अवतरित होना उनकी एक दिव्य लीला ही है. श्रीपाद प्रभु की लीलाएँ अत्यंत अद्भुत और अनाकलनीय हैं. उनकी लीलाओं का कोई अंत नहीं. वेद भी उनका वर्णन करते हुए मौन हो गए. श्रीपाद प्रभु का जन्म अनंत है. वेदों में सिमटा हुआ ज्ञान सीमित है, परन्तु श्रीपाद प्रभु का ज्ञान, उनकी दिव्य शक्ति, उनकी करुणा अनंत है. वे सभी देशों में, सभी काल में विद्यमान रहते हैं. सत्य का सत्य, ज्ञान का ज्ञान एवँ अनंत को भी अवगत न होने वाला ऐसा उनका महामंगल स्वरूप है.

बगुलामुखी देवी की उपासना

बैरागी ने कहा, “वास्तव में मैं बंगाल देश का निवासी हूँ. मैं बगुलामुखी देवी की आराधना करता हूँ. यह देवी दशमहाविद्याओं में से एक है. शत्रु नाश की इच्छा करने वालों को बगुलामुखी देवी की आराधना करनी चाइये. सभी रूपों के परमेश्वर की संहार शक्ति बगुलादेवी ही हैं. इस देवी की आराधना करने से वाक् सिद्धि प्राप्त होती है. मनोवाक्य तथा कर्ममूल के ऐक्य भाव से धर्मबद्ध जीवन बिताने वाले लोगों द्वारा कहा गया प्रत्येक वाक्य सत्य समझा जाता है. वाक्य में भी परा, पश्यन्ति, मध्यमा – ये भेद होते हैं.”

“सत्य युग में संपूर्ण जगत का नाश करने वाला एक भयानक बादल उठा था. पृथ्वी पर आये हुए इस संकट से विष्णु भगवान चिंतित हो गए थे. तब उन्होंने तपस्या आरंभ की. उस समय विद्या महादेवी बगुलामुखी के रूप में अवतरित हुईं. श्रीमन्नारायण को दर्शन देकर उसने सृष्टि का विनाश करने वाले उस बादल को रोका. इस देवी को कुछ लोग वैष्णवी देवी भी मानते हैं. मंगलवार को चतुर्दशी की अर्धरात्रि को यह देवी प्रकट हुईं. बगुलामुखी देवी स्तम्भन शक्ति रूपिणी है. इसी देवी के कारण सूर्यमंडल का अस्तित्व है, स्वर्ग का अस्तित्व भी बगुलामुखी माता के कारण ही है. यह देवी अपनी कृपा से इहलोक एवँ परलोक के सभी सुख अपने भक्तों को प्रदान करती है. साधकों के जीवन में खलबली मचाने वाली दुष्ट शक्तियों तथा अंध शक्तियों का निर्मूलन करके बगुलामुखी माता प्रगति का अभयदान देती है. बगुलामुखी देवी को ‘वडवामुखी, ‘जातवेद्मुखी, ‘उल्कामुखी, ‘ज्वालामुखी, ब्रुहद्भानुमुखी आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है. सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने बगुला महाविद्योपासना की थी. देवी ने ब्रह्मदेव को बाल रूप में दर्शन दिए. ब्रह्माजी ने तिरुपति तिरुमलै क्षेत्र में माता की अर्चना की थी. इस देवी की मूर्ति की वेंकटेश्वर-पद्मावती की मूर्तियों के साथ ही ब्रह्मोत्सव के मंगल पर्व पर अर्चना की जाती है. इस महाविद्या का उपदेश ब्रह्मदेव ने सनकादि ऋषियों को दिया था. ब्रह्माजी के बाद बगुलामुखी देवी की उपासना विष्णुजी ने की थी. भगवान परशुराम ने भी अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए बगुलामुखी देवी की उपासना की थी.

मैं तीर्थयात्रा करते हुए पीठिकापुरम् पहुँचा. श्री कुक्कुटेश्वर देवस्थान में आराधना की. उसके बाद एक सुन्दर बालक को देखा जो अत्यंत मधुर वाणी में बोल रहा था. उस बालक ने मुझसे कहा, “महाशय! आप बंगाल देश से आये हैं, यह मुझे ज्ञात है. मैं लम्बे समय से आज तक इस मंदिर में स्वयंभू दत्तात्रेय के रूप में विद्यमान हूँ. मेरी नित्य पूजा की व्यवस्था करने के लिए शीघ्रातिशीघ्र एक अर्चक की व्यवस्था करो.”

उस बालक के कथनानुसार एक उत्तम ब्राह्मण द्वारा अर्चना करवाकर उनका यथोचित सम्मान किया गया. उस अर्चक का नाम था – कलवर. उसने कुक्कुटेश्वर तथा स्वयंभू दत्तात्रेय, दोनों की अत्यंत मनोभाव से, अपने कष्टों की परवाह किये बिना आराधना की थी. इस कार्य के लिए उसे काफी सारी दक्षिणा दी गई थी. भोजन के लिए भी दक्षिणा दी गई. उसने यह धनराशि घर ले जाकर संदूक में रखी और अचरज की बात यह हुई कि सुबह वह अदृश्य हो गई थी. भोजन के सारे पदार्थ अदृश्य हो गए थे, मगर वहाँ उपस्थित ब्राह्मणों के पेट प्रतिदिन की अपेक्षा दुगुने-तिगुने अधिक भर गए. इस कारण वे सुस्त हो चले थे. सुस्ती आना, धन-दक्षिणा, भोजन का अदृश्य होना – सर्व साधारण व्यक्ति यह सब समझ नहीं पा रहा था. कलवर एक निष्ठावंत, नियम-निष्ठ, वेद-शास्त्रों को जानने वाला तथा उनका प्रचार करने वाला अर्चक था. परन्तु यक्षिणीयों के प्रभाव के कारण वह अत्यंत क्षीण हो चला था. इस कारण उसकी स्थिति लज्जाजनक हो गई थी. परन्तु सारे ब्राह्मण इस बारे में मौन ही रहते. इस विषय पर वे चर्चा नहीं करते थे.

एक बार एक बैरागी साधु कुक्कुटेश्वर के मंदिर में बेहोश हो गया. उसके शरीर में किसी भी प्रकार की हलचल न देखकर लोगों ने सोचा कि वह मर गया है. कुछ ही देर में उसे श्रीपाद प्रभु के नानाजी, बापन्नाचार्युलु के पास ले गए. उन्होंने उस साधु की परिक्षा की एवँ बोले कि साधु न तो मृत है, न ही मूर्छित हुआ है, अपितु यह समाधि अवस्था में है. परन्तु लोगों ने बापन्नाचार्युलु की बात पर विश्वास नहीं किया और वे उस साधू को दहन हेतु ले गए. आश्चर्य की बात यह हुई कि श्रीपाद प्रभु के कृपा प्रसाद से उसे अग्नि जला न सका. वह समाधि से बाहर आया और चिता से उठ कर नीचे आया. आठ ही दिनों में वह साधू पूर्ववत हो गया. परन्तु इस घटना के पश्चात गाँव के ब्राह्मण समाज ने उसे भिक्षा देना बंद कर दिया, इसलिए उसे मजबूर होकर ग्वाले के घर रहना पडा. वहाँ उसकी भिक्षा की व्यवस्था हो गई. कुल, जाति, वर्ण का भेदभाव न मानने वाला वह साधू ग्वाला समाज में अति लोकप्रिय हो गया था.  

ग्वाला-समाज में लक्ष्मी नामक एक युवती थी. वह बचपन में ही विधवा हो गई थी. उसका पति उससे अत्यंत प्रेमपूर्वक व्यवहार करता था. उसे सभी चाहते थे. अपने समाज में उसे श्रेष्ठत्व प्राप्त था. ग्वालों के बीच के वाद विवाद अपनी कुशाग्र बुद्धि से वह तत्काल सुलझा देता एवँ योग्य निर्णय लिया करता था. उसकी अल्पायु की ओर न देखते हुए लोगों ने उसे अपना नेता चुना था. उसकी पत्नी लक्ष्मी बड़ी पतिव्रता स्त्री थी.

उस दौरान श्री वेंकटप्पय्या श्रेष्ठी की गाय गुम हो गई थी. इसलिए लक्ष्मी श्रेष्ठी के घर दूध लाकर दिया करती थी. श्रीपाद प्रभु हमेशा श्रेष्ठी के घर जाया करते थे. जब भी वे दादी से कहते कि भूख लगी है, महालक्ष्मी समान वेंकट सुब्बम्मा तुरंत श्रीपाद प्रभु को गरम दूध दिया करती, इतना ही नहीं, वह बड़े प्रेम से प्रभु को मलाई, मक्खन भी देती. एक बार जब लक्ष्मी दूध लेकर आई, तो श्रीपाद प्रभु वहीं थे. वे कहने लगे, “मुझे खूब भूख लगी है.” तब वेंकट सुब्बम्मा ने लक्ष्मी से और दूध लाने के लिए कहा. उसने अपने घर में खुद के लिए जो दूध रखा था वह भी लाकर दिया और स्वयँ छाछ से काम चलाया. कुक्कुटेश्वर के मंदिर में दस दिनों तक उत्सव चल रहा था. उत्सव में ब्राह्मणों को यथोचित दक्षिणा दी जा रही थी. इस कारण यक्षिणी का प्रभाव कुछ कम हो रहा था, परन्तु अभी भी ब्राह्मण-भोजन के लिए तैयार की गई पाक सामग्री अदृश्य हो जाती थी. इससे ब्राह्मणों को समय पर भोजन नहीं मिलता था और वे क्षीण होते जा रहे थे.

 

पुराण वाचक पंडित की कथा

 

पीठिकापुरम् में एक पुराण वाचक पंडित आया था. कुक्कुटेश्वर मंदिर के बाहर के आँगन में प्रवचन की व्यवस्था की गई थी. पुराण सुनाने के लिए गाँव की सभी जातियों के लोग आया करते. पुराण वाचक पंडित के भोजन की व्यवस्था बापन्नाचार्युलु ने अपने घर में की थी. पुराण कहने से पहले वह पुराणिक लक्ष्मी ग्वालन द्वारा लाया गया दूध पीता था. श्रीपाद प्रभु सभी ह्रदयों के अन्तर्यामी होने के कारण उन्हें पंडित के बारे में सब कुछ ज्ञात था. यह पुराण वाचक महापंडित एक महायोगी था. अपनी योग शक्ति से वह अपनी आत्मा द्वारा पूर्व में धारण किये किये गए रूपों को पहचान सकता था. इन रूपों के चैतन्य को वह आकर्षित कर लेता था. ग्वालन लक्ष्मी की और वह योग दृष्टि से देखा करता. लक्ष्मी के पति के रूप में भी उस पंडित को स्वयँ अपनी आत्मा दिखाई देती थी. लक्ष्मी का पति मृत्योपरांत एक ब्राह्मण ज़मींदार के घर बाल रूप में जन्मा था. उस समय वह चार-पाँच मास का था. पुराण पंडित ने योग शक्ति से यह भी देखा था कि उसका अपना शक्ति रूप कैसा है. उसका मूल रूप स्त्री समान लक्ष्मी से संबद्ध था – यह उसे ज्ञात हुआ. उसने अपने स्वरूप को स्त्री तत्व की लक्ष्मी में विलीन होते हुए देखा. उसका अपना पुरुष तत्व चार मास के बालक में विद्यमान है तथा कुछ ही दिनों में उसका कर्मशेष पूरा हो रहा है, ऐसा उसे प्रतीत हुआ. पीठिकापुरम् में अपने कर्मऋणानुबंध पूर्ण करने के लिए उसने पुराण पंडित का रूप धारण किया था.

लक्ष्मी का अपने पति पर निस्सीम प्रेम था. उसके पति का चैतन्य भूतकाल का शरीर छोड़कर आ नहीं सकता, यह बात उसे मालूम हो गई थी. लक्ष्मी के पति का चैतन्य मूलतत्व पुराण पंडित में विलीन हो चुका था यह बात सर्वज्ञानी श्रीपाद प्रभु को ज्ञात थी. श्रीपाद प्रभु ने उस पुराण पंडित से कहा, “अरे, पंडित! यह लक्ष्मी मासूम है, यह कुछ ही दिनों में अपनी जीवन यात्रा पूरी करने वाली है. मृत्यु के पश्चात इसकी क्या गति होगी? तुम या तो ज्ञान रूपी ब्राह्मण बनोगे अथवा अज्ञानी ग्वाले बनोगे. उस रूप में लक्ष्मी तेरे दुख-सुख में तेरा साथ देगी. अपने प्रेम से उसने अपने पति के चैतन्य को अपनी और आकर्षित किया है. ग्वालन के रूप में उपस्थित चैतन्य कुछ दिनों पश्चात शरीर का पतन होने के बाद ब्राह्मण के चैतन्य में मिल जाएगा ना? यह ग्वालन के रूप में ब्राह्मण स्त्री है. तू ब्राह्मण के रूप में ग्वाला है. तुम दोनों के कर्म संबंध मुझे भली-भाँती ज्ञात हैं. भविष्य में ब्राह्मणी स्वरूप लेने वाली इस लक्ष्मी को पद्मावती स्वरूप मानकर मैं उसे सुवर्ण तिलक लगाकर आशीर्वाद दूँगा और मांगल्य प्रदान करके हिरण्य लोक में सुरक्षित रखूंगा. अगले जन्म में तुम एक आदर्श दंपत्ति होगे, और मेरे भक्त बनकर तुम्हारा उद्धार होगा.”

इतना कहकर श्रीपाद प्रभु मौन हो गए. उनकी लीलाएँ अगम्य, अद्भुत होती हैं.

।।श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

मंगलवार, 19 जुलाई 2022

अध्याय - ३७

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।

अध्याय ३७

छिन्नमस्ता देवी का वर्णन

बंगारय्या और बंगारम्मा से बिदा लेकर, उनकी दी हुई चर्म पादुकाएं लेकर हम आगे चल पड़े. हम एक जंगल में से होकर जा रहे थे. चलते-चलते एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए रुक गए. तभी वहाँ योगिनियों का एक समूह आया. वे हमें देखकर बोलीं, “अब सायं संध्या का समय हो चला है. इस समय आपका इस प्रदेश में आना उचित नहीं है. यहाँ हम छिन्नमस्ता देवी का पूजन करने वाले हैं. वह बड़ी रहस्यमय देवता है. यहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है. इतना ही नहीं, यह देव भूमि है. यहाँ आकर कोई भी जीवित वापस नहीं जा सकता.” यह सुनते ही हमारे पैरों तले की ज़मीन खिसकने लगी. तभी एक तेजोमयी योगिनी माता वहाँ आई. उसके नेत्र अग्नि के समान लाल-लाल थे. उसके साथ आई हुई योगिनियाँ एक टोकरे में छिन्नमस्ता देवी को साथ में लाई थीं. तब वह योगिनी माता बोली, “इन्हें पहनने के लिए साड़ी-चोली दो.” उसकी आज्ञानुसार हमें वस्त्र दिए गए और हमारे वस्त्रों को वहाँ प्रज्वलित अग्निकुण्ड में फेंक दिया गया.

साड़ी-चोली पहनने पर हमें ऐसा प्रतीत हुआ मानो हमारे शरीरों में परिवर्तन हो रहा है. हमारा पुरुषत्व समाप्त होने लगा, उरोज पुष्ट होने लगे. हम पूरी तरह से स्त्री बन गए. हमारा नाम भी नए प्रकार से रखा गया. मेरा नाम रखा गया – शंकरम्मा, और धर्मगुप्त का – धर्मम्मा. हमें भोजन में मांसाहारी पदार्थ दिए गए, पीने के लिए मदिरा दी गई.

हमने ऐसे शेर के बारे में सुना तो था कि वह दिन में मनुष्य की भाँति तथा रात में शेर की भाँति  संचार करता है. परन्तु इस प्रकार की किसी देवता के बारे में अथवा योगीजनों के संकल्प के बारे में नहीं सुना था जो पुरुष को स्त्री के रूप में परिवर्तित करती हो. हमने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था. हमें भयभीत करके नृत्य करने के लिए मजबूर किया गया. तभी योगिनी माता बोलीं, “ कबंध मुनि परिवर्तनशील जगत के अधिपति हैं. परिवर्तन- शक्ति को ही छिन्नमस्ता देवी कहते हैं. इस संसार में निरंतर वृद्धि एवँ क्षय होता रहता है. जब क्षीणत्व कम होता है, उस समय विकास का स्तर अपने आप बढ़ जाता है, उस समय भुवनेश्वरी देवी प्रकट होती है. इसके विपरीत जब क्षीणत्व में वृद्धि होकर विकास का स्तर कम हो जाता है, उस समय छिन्नमस्ता देवी का प्राधान्य होता है.

इस महामाता का स्वरूप अत्यंत रहस्यमय है. एक बार पार्वती देवी अपनी सखियों के साथ मंदाकिनी नदी पर स्नान के लिए गई थीं. स्नान होने के पश्चात दोनों सखियों को खूब भूख लग आई, इससे वे कृष्णवर्णा हो गईं. भोजन की याचना करने पर पार्वती देवी ने उनसे कुछ देर रुकने को कहा. थोड़ी देर के बाद सखियों ने फिर से भोजन की प्रार्थना की. इस बार भी उन्हें रुकने के लिए कहा गया. ऐसा कई बार हुआ. अंत में पार्वती देवी ने अपनी तलवार से अपना सिर तोड दिया. उसके कंठ से खून की तीन धाराएं बह निकलीं. दो धाराएं उसने दोनों सखियों को पीने के लिए दीं और तीसरी धार से स्वयँ रक्त प्राशन किया. मस्तक छेदन करने के कारण देवी को छिन्नमस्ता कहते हैं.

आधी रात को की गई छिन्नमस्ता देवी की उपासना बहुत शुभ फल देती है. शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए, शत्रु के समूह को रोक कर रखने के लिए, राज्य प्राप्ति के लिए, दुर्लभ ऐसे मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस देवी की उपासना अत्यंत फलदायी है. चारों दिशाएं इस महामाया के वस्त्र हैं. इसके नाभिस्थान में योनिचक्र होता है. कृष्णवर्ण अर्थात तामसी गुण और रक्तवर्ण अर्थात् राजसी गुण. इन दोनों गुणों से युक्त सखियाँ माता के साथ रहती हैं. उन्होंने अपने मस्तक का खण्डन कर दिया फिर भी वे सजीव ही रहीं योगभाषा में इसका अर्थ यह हुआ कि वह परिपूर्ण अंतर्मुखत्व का प्रतीक हैं. अग्निस्थान वाले मणिपुर केंद्र में योगीजन छिन्नमस्ता देवी का ध्यान करते हैं. यह हिरण्यकश्यपू की उपास्य देवता हैं.”

यह सारा अनुभव हमारे लिए अत्यंत विचित्र एवँ भयानक था. तभी आधी रात हो गई. चित्र-विचित्र प्राणियों की आवाजें आने लगीं. शेर की दहाड़ सुनकर तो हम भय से थरथराने लगे. शेर की आवाज़ उस शांत वातावरण को दहला रही थी. योगिनी जनों ने सोचा कि दो अच्छी स्त्रियों की बलि मिली है. उनके निकट उपस्थित हम दोनों का वध करना अत्यंत श्रेयस्कर है ऐसा उन्होंने सोचा. उन्होंने हमारे सिरों पर नीम के पत्ते बांधे. ललाट पर बड़ा सा कुंकुम का तिलक लगाया. एक तेज़ धार वाले चाकू से हमारे सिर काट दिए. खून की धाराएं देखकर योगिनियों को बड़ी प्रसन्नता हुई. वे मदोन्मत्त होकर रक्तपान करने लगीं. हमारे सिर एक तरफ तथा धड दूसरी तरफ फेंक दिए. फिर भी ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम सजीव ही हैं. शरीर में असहनीय जलन हो रही थी. हम उन योगिनियों की क्रूर एवँ अत्यंत हीन क्षुद्र विद्या की बलि चढ़ गए थे.

तभी हम गहरी निद्रा में सो गए. निद्रावस्था में हमें अस्पष्ट रूप से आकाश में एक प्रकाश पुंज दिखाई दिया. हमें ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह प्रकाश निकट आते हुए काल के समान योगिनियों के चारों और की हवा में लीन हो गया. हमारे सिर पुनः हमारे धडों से लग गए. हम हमेशा की भाँति नींद से जागे. हमारे शरीरों पर साड़ी-चोली थी. हमारे शरीर के स्त्रियोचित लक्षण धीरे-धीरे लुप्त होने लगे और पुरुषोचित लक्षण स्पष्ट होने लगे. रात की अग्नि में हमारे स्त्री वस्त्र दग्ध हो गए और उनके स्थान पर नए पुरुषोचित वस्त्र प्रकट हो गए. स्नानादि के पश्चात हमने वे वस्त्र धारण कर लिए.

तभी एक पथिक हमारे पास आया और बोला, “मित्रों, कल रात को तुमने जो देखी, वह एक प्रकार की यौगिक-प्रक्रिया है. तुम्हारे शरीर के भीतर के स्त्री तत्व को शुद्ध कर दिया गया है. प्रत्येक प्राणी के शरीर में स्त्री एवँ पुरुष – दोनों तत्व विद्यमान रहते हैं. दोनों तत्वों की शुद्धि के बिना योग शक्ति विश्व चैतन्य से होकर प्रवाहित नहीं होती. आपके भीतर के विश्व चैतन्य से आवश्यक मात्रा में शक्ति प्रवाहित हो रही है. आत्मा के लिए स्त्री-पुरुष भेद नहीं होता. वह इन दोनों तत्वों के आधार से परे है.”

आप लोगों को श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की कृपा से योगिनी गणों की असाधारण प्रक्रिया के द्वारा अनुपम करुणा प्राप्त होगी. अनेक प्रयत्नों के पश्चात भी ज्ञात न होने वाले सुषुम्ना मार्ग का ज्ञान आपको हो गया है. इससे बढकर सौभाग्य और क्या हो सकता है? इस महाभाग्य की प्राप्ति का कारण श्रीपाद प्रभु की वे चर्म पादुकाएं हैं. जो आपके पास हैं. चर्म देह के चैतन्य से निकलकर आप चैतन्य प्रवाह रूप ऐसे दिव्य तत्व के सान्निध्य में हैं. श्रीपाद प्रभु की दिव्य लीलाएँ वे स्वयँ ही जानते हैं. औरों के लिए वे अति अगम्य, अद्भुत् एवँ चमत्कारपूर्ण होती हैं.”

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।


सोमवार, 18 जुलाई 2022

अध्याय - ३६

 

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।

अध्याय – ३६.

वेदान्त शर्मा का वृत्तांत

 

मैं एवँ धर्मगुप्त प्रभु से भेंट स्वरूप प्राप्त हुए पैंजन लेकर आगे की यात्रा पर निकल पड़े. रात भर उन पैंजनों की मधुर ध्वनि हमारे ह्रदय में प्रतिध्वनित होती रही. ह्रदय के अनाहत चक्र से ऊँकार बड़े प्रयत्न से ही सुनाई देता है, ऐसा हमने सुना था. पिछली रात को इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ. उन पैंजनों की मधुर ध्वनि, राग-ताल युक्त संगीत के समान थी. अनाहत चक्र से शक्ति अन्य चक्रों की ओर प्रवाहित होती है. इस शक्ति का प्रसार होते समय शरीर की सभी नसों में नूतन शक्ति का प्रादुर्भाव होता रहता है.

जब तक हम चलते रहते, पैंजनों की ध्वनि आती रहती. हम रुकते तो वह ध्वनि भी रुक जाती. उस भाग में, एक खेत में हमने एक आश्रम देखा. निकट ही छोटा सा गाँव भी दिखाई दिया. गाँव की सीमा पर एक दलित लोगों की बस्ती थी. बस्ती के निकट ही यह आश्रम था.

जैसे ही हम आश्रम के निकट पहुंचे, पैंजनों की ध्वनि रुक गई. हमने सोचा कि यहाँ कोई दिव्य अनुभव प्राप्त होने वाला है, और वह भी प्रभु की केवल एक दिव्य लीला ही होगी. तभी उस आश्रम से लगभग ६० वर्ष के एक तेजस्वी महर्षि बाहर आए. उनके पीछे-पीछे करीब ३० वर्ष की योगिनी माता बाहर आईं. वे दोनों अत्यंत आदरपूर्वक हमें आश्रम के भीतर ले गए. जलपान के पश्चात महर्षि कहने लगे, “ वास्तव में मेरा नाम वेदान्त शर्मा है. मैं पीठिकापुरवासी हूँ. अब मुझे बंगारय्या के नाम से जानते हैं. इसका नाम बंगारम्मा है. मैं जन्म से ब्राह्मण हूँ, और यह स्त्री जन्म से नीच कुल की है. हमारे घर में मातंगी माता का पीठ है. मातंगी माता दशमहाविद्या में से एक हैं, उसीकी हम यहाँ आराधना करते हैं.

इतना सुनते ही मैं रोमांचित हो गया. यह व्यक्ति तो ब्राह्मण है और यह स्त्री नीच कुल की है. तब इनका दाम्पत्य धर्मसम्मत कैसे हुआ, यह प्रश्न मुझे सताने लगा. हमें भोजन में कंद, मूल एवँ फल दिए गए. बंगारय्या ने आगे कहा, “ बेटा! जब अरुंधती ने वशिष्ठ महामुनि से विनती की कि वे उससे विवाह करें, तब वशिष्ठ मुनि ने उसके सामने एक शर्त रखी. वे बोले, “ मैं कुछ भी करूँ, फिर भी तुम विरोध न करना.” अरुंधती ने यह बात स्वीकार कर ली. महर्षि ने उसे सात बार दग्ध किया फिर भी उसने विरोध नहीं किया. इसीलिये उसका नाम अरुंधती पडा. इसके पश्चात महर्षि ने उसे अपनी धर्मपत्नी के रूप में स्वीकार किया.

जब मैं पीठिकापुरम् में था तब तीन बार मेरा विवाह हुआ था. तीनों पत्नियां स्वर्ग सिधार गईं. मैं उनमें से किसी का भी संग प्राप्त न कर सका. अपने नसीब को दोष देते हुए मैं अत्यंत दुखी हो गया था. इस पर श्रीपाद प्रभु मुस्कुरा कर बोले, “नाना जी, मैंने तुम्हारे लिए एक और नई नानी ढूंढी है. विवाह किये बिना यदि आप उसको धर्मपत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे तो आपको उत्तम जन्म का प्रसाद प्राप्त होगा.”

बापन्नाचार्युलु पीठिकापुर की ब्राह्मण परिषद् के अध्यक्ष थे. ब्राह्मण समाज की यह राय थी कि इस संबंध में वेद पंडितों की बैठक बुलाई जाए. धर्म-कर्म के सन्दर्भ में शास्त्रानुसार चर्चा करने के पश्चात ही निर्णय लिया जाए, ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया. दूर दूर के प्रान्तों के पंडितों को निमंत्रण भेजे गए. किस-किस को बुलाया जाए इसका कार्यभार मुझे सौंपा गया.

श्रीपाद प्रभु ने उपनयन संस्कार होने के पश्चात अन्य बालकों के समान वेद पठन नहीं किया. नानाजी के अथवा पिता के सम्मुख उन्होंने कभी भी पाठ नहीं पढ़े और जो किया उसके बारे में कभी बताया नहीं. परन्तु यदि कोई परिक्षा लेने के उद्देश्य से उनसे कुछ पूछे तो श्रीपाद प्रभु तुरंत उसका उत्तर देते थे. बापन्नाचार्युलु का संपूर्ण वेदान्त श्रीपाद प्रभु को ज्ञात था. इतना ही नहीं, वेदान्त एवँ उसका रहस्यमय गूढार्थ तो श्रीपाद प्रभु के लिए मानो हाथों का मेल था. संक्षेप में, श्रीपाद प्रभु विद्वान पंडित ही थे. उन्हें भी परिषद् में आमंत्रित करने का निर्णय मैंने लिया.

ब्राह्मणों का उद्देश्य कुछ और ही था. अप्पल राजू को एवँ बापन्नाचार्युलु को कुल से बहिष्कृत किया जाए, ऐसा निर्णय ब्राह्मण सभा में लिया गया. इस निर्णय की एक प्रति श्री शंकराचार्य को भेजी गई और यह विचार किया गया कि शंकराचार्य की अनुमति प्राप्त होते ही इन दोनों परिवारों को पीठिकापुरम् से बाहर निकाल दिया जाए. जब श्रीपाद प्रभु ने उनकी मंशा के बारे में मुझे बताया तो मैं भी ब्राह्मणों की और हो गया, क्योंकि मेरे मन में ब्राह्मण परिषद् का अध्यक्ष पद प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गई थी.

श्रीपाद प्रभु कुल की, मतभेदों की परवाह किये बिना सभी के घर जाया करते और सब से समान बर्ताव करते थे. पीठिकापुरम् में बंगारय्या और बंगारप्पा दम्पत्ति रहते थे. उन्हें श्रीपाद प्रभु से मिलने की, उनसे बातें करने की उत्कट इच्छा थी.

श्रीपाद प्रभु ने जब यह इच्छा प्रकट की कि उन्हें चर्म पादुकाएं चाहिए, तब उनकी आयु चौदह वर्ष की थी. घर के बड़े लोगों ने उनसे कहा कि ब्राह्मणों को लकड़ी की खडाऊ पहनना चाहिए, न कि चमड़े की. इस बात की भनक उस चमार दंपत्ति तक पहुँची. श्रीपाद प्रभु को चमड़े की पादुकाएं समर्पित करके जीवन को सार्थक किया जाए, ऐसा निश्चय उस दंपत्ति ने किया. तभी उनके घर में श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रकट हुए. उनके दिव्य चरणों की नाप ली गई. बंगारम्मा बोली, “महाप्रभु! मेरी ही चमड़ी निकाल कर उसकी पादुका बना दूं, ऐसी मेरे मन में इच्छा है. इस पर श्रीपाद श्रीवल्लभ मंद मंद मुस्कुराए और अंतर्धान हो गए. हमारे यहाँ एक बढ़िया गाय थी. अचानक वह एक असाध्य रोग से ग्रस्त होकर मर गई. उस गाय का चमडा निकाल कर, उसे शुद्ध करके श्रीपाद प्रभु के लिए चर्म पादुकाएं बनाई गईं.

इधर वेद पंडितों की सभा बैठी. चर्चा आरम्भ हुई. चर्चा का मुख्य विषय था – आदि शंकर का काशी में मंडन मिश्र से हुआ वाद विवाद. वाद विवाद में यदि उभय भारती देवी को भी पराजित किया गया तो परिक्षा पूर्ण होगी, ऐसा भारती देवी ने कहा. उभय भारती ने काम शास्त्र पर प्रश्न पूछा. इस शास्त्र में आदि शंकर को कोई ज्ञान नहीं था. उन्होंने उत्तर देने के लिए छः मास की अवधि मांगी. धर्म के विरुद्ध न जाते हुए काम शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने का निर्णय शंकराचार्य ने किया.

इसी समय उस राज्य के महाराजा का निधन हुआ था. आदि शंकर ने परकाया प्रवेश विद्या का उपयोग किया और उस राजा के शरीर में सूक्ष्म शरीर से प्रवेश किया. उन्होंने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि उनका भौतिक शरीर संभाल कर रखा जाए और यदि कोई महत्त्वपूर्ण सन्देश हो तो राजप्रासाद के निकट आकर सांकेतिक भाषा में उन्हें बताया जाए. महारानी को अपने महाराज में कुछ परिवर्तन, कुछ नयेपन का अनुभव हुआ. उसने जान लिया कि किसी                          महापुरष की आत्मा का प्रवेश उसके पति के शरीर में हुआ है. वह दिव्यात्मा महारानी के पति के मृत शरीर में प्राणमय जगत के चैतन्य को आकर्षित करके प्रविष्ट हुआ है. केवल इसलिए कि दाम्पत्य सुख का अनुभव साक्ष भावना से देखकर उस संबंध में ज्ञान प्राप्त कर सके – इस बात को भी महारानी समझ गई. जब तक इस दिव्यात्मा का वास मेरे पति के शरीर में है, तभी तक उसके प्राण शरीर में रहेंगे, यह बात वह जान गई. उसने आदेश दिया कि नगर में यदि कोई ऐसा मृत शरीर हो, जिसका दाह संस्कार न किया गया हो, तो उसे फ़ौरन जला दिया जाए. शंकराचार्य का शरीर दहन करने के लिए ले जाया गया. तब उनके शिष्यों ने तुरंत सांकेतिक भाषा में राजवेश धारण किये हुए शंकराचार्य को इस बात की सूचना देने का प्रयत्न किया, परन्तु तब तक देर हो चुकी थी. अग्नि में शंकराचार्य के हाथ-पैर जल गए थे जो उन्होंने श्री लक्ष्मी नरसिंह की कृपा से वापस प्राप्त कर लिए.

 

ब्राह्मण परिषद् में श्रीपाद प्रभु का अद्भुत संवाद

श्रीपाद प्रभु ने परिषद् से प्रश्न किया, “आप कहते हैं, कि आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश तभी कर सकती है जब वह अपने पहले अवतार को छोड़ दे. परन्तु मैं आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ, क्या आत्मा एक ही समय में तीन-चार शरीरों में प्रवेश करके तीन-चार जन्मों के कर्मफल प्राप्त कर सकती है?” परिषद् ने उत्तर दिया, “यह बड़ा जटिल विषय है. आज तक इस संबंध में कोई प्रमाण प्राप्त नहीं है.”

श्रीपाद प्रभु ने कहा, “प्राचीन युग में ऐसा हुआ है, परन्तु आपको वह ज्ञात नहीं है. शाप के कारण देवेन्द्र को पञ्च पांडवों का जन्म लेना पडा और शची देवी को द्रौपदी के रूप में जन्म लेना पडा. उसे पांडवों की पत्नी होना पडा. शची-पुरंदर ने यद्यपि पृथ्वी पर जन्म लिया, फिर भी उनका मूलतत्व निश्चय ही स्वर्ग में था. द्रौपदी का शय्या सुख केवल अर्जुन को ही प्राप्त हुआ. मंत्रांग विषयों पर वह धर्मराज से चर्चा करती थी, भीम को माता जैसा रुचिकर भोजन बनाकर देती थी. नकुल को वह लक्ष्मी स्वरूपिणी प्रतीत होती थी, सहदेव को भूत, भविष्य एवँ वर्त्तमान का ज्ञान था, इसलिए आगे घटित होने वाली घटनाएं जल्दी-जल्दी होकर संग्राम शीघ्र समाप्त हो जाए ऐसी इच्छा वह प्रकट करता. इसलिए भूमाता से भी अधिक सहनशील वृत्ति से वह उसके साथ व्यवहार करती थी. देवता धर्म, मनुष्य धर्म एवँ जंतु धर्म एक दूसरे से भिन्न हैं. उन सबको एक साथ मिलाना नहीं चाहिए.”

इस पर मैंने कहा, “पुराण काल में ऐसी आश्चर्यजनक घटनाएं हुई होंगी, परन्तु वर्त्तमान में ऐसा कुछ नहीं होता.”

श्रीपाद प्रभु की तीक्ष्ण दृष्टी मुझ पर पडी. वे बोले, “तुम्हारा तीन स्त्रियों के साथ विवाह हुआ. वे तीनों परलोक सिधार गईं. क्या उन तीनों की तीन अलग-अलग आत्माएं थीं? यदि नहीं, तो क्या उनकी आत्मा एक ही थी? पुरुष तीन स्त्रियों से विवाह करे, यह धर्म सम्मत है. परन्तु क्या एक स्त्री का तीन पुरुषों से विवाह करना धर्म सम्मत है? वास्तव में देखा जाए, तो आत्मा क्या है? दाम्पत्य जीवन का अर्थ क्या है?

तभी मैंने कहा, “पुरुष चाहे जितनी भी स्त्रियों से विवाह कर सकता है, मगर स्त्री को यह अधिकार नहीं है.” श्रीपाद प्रभु बोले, “ओ हो! क्या तू जगन्नियंता से बड़ा है? मंदोदरी अपने पातिव्रत्य के लिए प्रसिद्ध थी. जब वह बाली की पत्नी थी, तब उसके शरीर के अणु भिन्न थे. रावण की पत्नी के रूप में उसके शरीराणु भिन्न थे और विभीषण की पत्नी के रूप में भी उसके शरीराणु भिन्न थे. आत्मा निर्विकार होता है, अतः किन्ही भी गुणों से उसका मेल नहीं होता. इसीलिये आत्मा नित्य निर्विकार, सत्ययुक्त, शुद्ध एवँ अत्यंत पवित्र है. मंदोदरी ने तमोगुणी रावण के साथ उसके उपयुक्त ही व्यवहार किया. विभीषण के साथ उसने सत्वगुण प्रधान होकर उत्तरदायित्व निभाया.”

मैं निरुत्तर हो गया. परन्तु थोड़ी देर विचार करने के बाद बोला, “यदि आपकी बात को सत्य मान  लिया जाए, तो बहुपतीत्व को स्वीकारना होगा.” इस पर श्रीपाद प्रभु बोले, “यह कलियुग है. यहाँ कितनी ही भिन्न-भिन्न अवांतर जातियों का आविर्भाव होता रहता है. पशु-पक्षी, वृक्ष, कृमि-कीटक, मानव जन्म ले रहे हैं. उनके अपने स्वभाव के कारण विभिन्न प्रकार के संबंध स्थापित हो रहे हैं. धर्म विरुद्ध संबंध स्थापित होने पर अवांतर कुल का निर्माण होता है. कलियुग के अंत में ऐसे कुलों का नाश होना ही है. ये अवांतर कुल आसुरी शक्ति के कारण निर्माण होते हैं, इसीलिये असुर ध्वंस करना पड़ता है. एक बार असुर का नाश होने पर उसे दुबारा जन्म नहीं मिलता. परन्तु एक असुर के स्थान पर दस-दस असुरों का जन्म होने लगा है. धर्मबद्ध संबंध ही सदा के लिए शाश्वत रहते हैं, इसीलिये सबको कुल गोत्र एवँ वर्णाश्रम धर्म का पालन करना चाहिए.”

“दिव्यात्मा का प्रादुर्भाव बिरले ही होता है. उनकी आत्मा एक ही होती है. यदि इस आत्मा का पुरुष-रूप में प्रादुर्भाव होता है, तो उस आत्मा की शक्ति का प्रादुर्भाव स्त्री-रूप में होता है. इन्हीं को दिव्य-दाम्पत्य कहते हैं. ऐसे दिव्यात्मा सृष्टि के आदि से अंत तक होते हैं. पराशक्ति एवँ परब्रह्म ही अद्वितीय स्वरूप में सायुज्य स्थिति में रहते हैं.” श्रीपाद प्रभु आगे बोले, “अब देखो, वेदान्त शर्मा नामक ब्राह्मण तू ही था. बंगारय्या के नाम से चमार कुल में जन्मा है. यह सब एक ही समय में हुआ है. तेरी ही पत्नी तेरी तीन पत्नियों के रूपों में चमार पत्नी बंगारम्मा के नाम से जन्मी है. अभी-अभी तेरे घर में जिस गाय की मृत्यु हुई है, वह एक समय में तेरी पत्नी ही थी. तेरी दिवंगत पत्नी का चैतन्य एवँ उस गोमाता का चैतन्य प्रस्तुत बंगारम्मा नामक इस महान स्त्री के चैतन्य में सम्मिलित हो गया है. चैतन्य जहाँ से आता है, वहाँ उसे जाकर मूल चैतन्य में मिल जाना है, यह निश्चित है. सृष्टि का रहस्य अति गहन है. इसे समझने के लिए सप्त ऋषियों की सामर्थ्य भी पर्याप्त नहीं है. बंगारम्मा का शरीर बंगारय्या के लिए ही नियत है, इसलिए यह बिलकुल भी धर्मं विरुद्ध नहीं है, तू इसके साथ संसार कर. उससे तुझे शरीर सौख्य प्राप्त नहीं होगा. यह निर्णय मैंने धर्मस्थान में बैठकर किया है. प्रकृति में जन्म लेने के पश्चात प्रकृति के धर्म का, उसकी मर्यादा का पालन विधिवत करना ही पड़ता है.”

“बंगारम्मा ने मुझसे कहा था कि अपनी चमड़ी से चप्पल बनाकर मुझे देगी. मैंने स्वीकार कर लिया. वह बंगारम्मा जीवित रहते हुए भी उसने अनजाने में गाय का जन्म लिया. उसके अनजाने में ही उसने तेरी तीनों पत्नियों के रूपों में जन्म लिया. जब चैतन्य तीन-चार शरीरों में विभाजित हो गया, तब उस प्रत्येक शरीर के चैतन्य को यह आभास होता है कि केवल वही उपस्थित है. उनके बीच की एकात्मता समझ में नहीं आती. ‘कलौ पञ्चसहस्त्राणि जायते वर्णसंकर:’ ऐसा कहा गया है. इसका अर्थ यह हुआ कि कुल सांकर्य का नहीं, अपितु वर्ण सांकर्य का ही उल्लेख किया गया है. कुल सांकर्य होने पर नीच जन्म प्राप्त होता है. वर्ण सांकर्य होने पर नूतन शक्तियुक्त नवीन जातियों का उद्भव होता है. परिणाम स्वरूप नई मानव जाति को दैवत्व की प्राप्ति होती है. इस भूमि पर दैवत्व का लाभ प्राप्त करने योग्य जातियों को उत्पन्न करना है.”

“इस ब्राह्मण परिषद् का असली उद्देश्य मुझे ज्ञात है. मेरे नाना जी एवँ पिता जी को कुल से बहिष्कृत करने का उद्देश्य उनके मन में खदखदा रहा है. इसीलिये मैं वेदान्त शर्मा को कुल बहिष्कृत करता हूँ. आज से तेरा नाम बंगारय्या होगा.”

पूरी ब्राह्मण परिषद् चकरा गई. सबकी नज़रों के सामने ही एक ज्योति स्वरूप मुझमें विलीन हो गया. तब श्रीपाद प्रभु बोले, “आपकी आंखों के सामने ही बंगारप्पा की आत्मज्योति वेदान्त शर्मा में विलीन हो गई. यह ब्राह्मण है, अथवा चांडाल है यह निर्णय आप स्वयँ ही कर लीजिए. हमें कुल से बहिष्कृत करने के लिए शंकराचार्य की अनुमति प्राप्त करने का प्रयत्न भी आपने कर लिया. शंकराचार्य मेरा क्या कर लेंगे? आप सबके देखते-देखते ही मैं अपने नाना जी अथवा पिता जी से वेदाभ्यास ग्रहण न करते हुए भी, वेदोच्चारण कर सकता हूँ. एक ही समय में अनेक स्थानों पर दर्शन दे सकता हूँ. शंकराचार्य मेरे सामने भी आ जाएँ, तो भी मुझे किस बात का डर है? उन्हें उनके नित्य आराधित शारदा चंद्रमौलीश्वर के रूप में दर्शन देकर उन पर अनुग्रह करूंगा, तब कोई अन्य उपाय न होने के कारण उन्हें मुझे ईश्वर के रूप में स्वीकार करना होगा. तब उनका निर्णय आप सबके लिए दुर्भाग्यशाली होगा. क्षत्रिय परिषद्, वैश्य परिषद् आपके निर्णय को सम्मति नहीं देगी. यदि वे पौरोहित्य, कर्मकाण्ड, दान, दक्षिणा, सीधा आदि देना बंद कर दें, तब बाल बच्चों समेत आप सबकी दीन हीन अवस्था हो जायेगी. यदि मुझसे लड़ाई मोल लोगे तो सर्वनाश का मूल कारण तुम ही बनोगे. मैं कह रहा हूँ कि चतुराश्रम का धर्म पालन करो. यह कह रहा हूँ कि अष्टादश वर्णों के लोग सुख-संतोष से रहें. आप लोग अपने-अपने धर्म के नियमों का अचूक पालन करके धर्म संस्थापन में सहयोग दें. वैसा न करने पर अनेक आपत्तियां टूट पड़ेंगी. मैं तो शांत ही रहूँगा, परन्तु आपकी स्थिति दुखमय हो जायेगी. प्रकृति दो प्रकार से परिणाम देती है, पहला – एकदम सुधार करना और दूसरा – धीरे-धीरे सुधार करना. दूसरी विधि के अनुसार पर्याप्त समयावधि दी जायेगी. यदि आप लोग अपने आपको नहीं सुधारेंगे तो विनाश को आमंत्रित करेंगे. मैं तो विनाश करके भी धर्म की स्थापना करूंगा.”

इतना कहने के पश्चात श्रीपाद प्रभु ने मौन धारण कर लिया. बंगारय्या आगे बोले, “मुझे कहीं भी कोई आधार न था, ऐसी स्थिति में मैं बंगारम्मा को लेकर गाँव-गाँव घूमते हुए यहाँ आ पहुँचा. हमारे इस आश्रम में मातंगी देवी की प्रतिष्ठा करके जीवन काट रहा हूँ.”

श्रीपाद प्रभु इस मार्ग से गुज़रते हुए यहाँ आये. उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया और बोले, “इस शरीर के पतन के पश्चात तू फिर से अपने ऋणानुबंध से ब्राह्मण कुल में जन्म लेगा और बंगारम्मा शूद्र जाति में जन्म लेगी, तब तुम दोनों पति पत्नी बनोगे, तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी. उस संतान को कुरुगड्डी में मेरी सेवा करने की संधि प्राप्त होगी, सुखी भव!”

“बेटा, यही हमारा वृत्तांत है. आप इस प्रदेश में आयेंगे, आपके पास उनके पैंजन हैं. वे पैंजन आपसे लेकर आपको उनकी चर्म पादुकाएं दे दूं, ऐसा उनका आदेश है.”

“हम मातंग मुनि की कन्या मातंगी देवी के उपासक हैं. इस मातंगी माँ की आराधना करने से उत्तम दाम्पत्य सुख की प्राप्ति होती है. इसे राज मातंगी, कर्ण मातंगी आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है. एक बार श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु ने भौतिक स्वरूप में इस आश्रम में दर्शन दिए. उस समय बंगारम्मा दूध गरम कर रही थी. जिस गोमाता के चर्म से ये पादुकाएं बनाई हैं, वह गोमाता भी सामने से गर्दन हिलाती हुई गई, ऐसा प्रतीत हुआ. श्रीपाद प्रभु ने हमारे दूध को स्वीकार किया. हमारे द्वारा पूजित मातंगी देवी की मूर्ती उनके नाम से संस्थापित संस्थान के औदुम्बर वृक्ष के नीचे अनेक गज नीचे चली जायेगी और वहाँ अनेक सिद्ध पुरुषों द्वारा उसकी सेवा की जायेगी. वे बंगारम्मा को बुलाकर बोले, “अम्मा! तेरा पति खूब अनुकूल है. अगले जन्म में तुझे इससे सारे सुख प्राप्त होंगे. तेरे लिए सोने की बिंदी तैयार करके रखी है. एक शुभप्रद मंगलसूत्र भी बना लिया है. ये दोनों चीज़ें हिरण्यलोक में सुरक्षित रखी हैं. अगले अवतार में मैं स्वयँ ही तुम पर कृपा करके अपने हाथों से तुम्हारा विवाह करूंगा.” इतना कहकर श्रीपाद प्रभु अंतर्धान हो गए. “

:बेटा! तुमने हमारी कथा सुनी. हमेशा “सिद्ध मंगल स्तोत्र” का पठन करना चाहिए, तुमको अवश्य ही महापुरुषों का अनुग्रह प्राप्त होगा. सिद्ध, महासिद्ध, महायोगी पुरुष श्रीपाद प्रभु के कर-चरण आदि अवयवों के समान हैं. उनके माध्यम से ही श्रीपाद प्रभु अपने संकल्प की पूर्ति करते हैं. एक बार उन्होंने राजमाता मातंगी देवी के रूप में दर्शन देकर हमें अनुगृहीत किया. समस्त सृष्टि एवँ सृष्टि का रहस्य उनके आधीन है. तुम हमेशा, हर पल उनका स्मरण करना, ध्यान करना, उनकी अर्चना करना. वे ही सर्वसिद्ध हैं. माता के समान वे तुम्हारी रक्षा करेंगे. कोटि-कोटि माताओं के प्रेम की तुलना में श्रीपाद प्रभु का अपने भक्तों पर प्रेम कितनी उच्च कोटि का होता है!”

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

Complete Charitramrut

                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...