गुरुवार, 7 जुलाई 2022

अध्याय - ३१

 

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये ।।


अध्याय – ३१

दशमहाविद्याओं का वर्णन

 

हम रोज़ शाम को श्रीपाद प्रभु की आज्ञानुसार कृष्णा के दूसरे किनारे पर जाकर रात भर वहीं रहते थे. प्रातःकाल स्नान-संध्या समाप्त करके पुनः श्रीगुरु के सान्निध्य में जाते. इस अलभ्य सत्संग में श्री प्रभु के प्रसाद रूपी दर्शन, नित्य नूतन योगानुभव एवँ अनेक दिव्य रहस्यों के भेद ज्ञात होते थे. देवी तत्व की उपासना दशमहाविद्या रूप से ही होती है. ऐसा हमने सूना था, अतः हमने “श्री” के चरणों में नम्र प्रार्थना की कि इन दशमहाविद्या रूपों की संपूर्ण जानकारी हमें बताएँ.

श्रीपाद प्रभु ने कहा, “अरे, शंकर भट्ट, श्री विद्या की उपासना अत्यंत श्रेष्ठ है. प्राचीन काल में हयग्रीव के कृपा प्रसाद से ही अगस्त्य महामुनि को श्री विद्या के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ. उन्होंने यह विद्या अपनी पत्नी लोपामुद्रा को दी. लोपामुद्रा देवी ने इस महाविद्या का गहन अध्ययन करके उसका गूढार्थ अगस्त्य ऋषि को समझाया. इस प्रकार वे दोनों एक दूसरे के गुरु हुए.”

 

लोपामुद्रा एवँ अगस्त्य ऋषि के चरित्र.

 

“विदर्भ देश के राजा को कई वर्षों तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी. अगस्त्य महामुनि के तपोबल से राजा को एक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई. उस कन्या का नाम रखा गया लोपामुद्रा. जब लोपामुद्रा समयानुसार युवावस्था को प्राप्त हुई तो अगस्त्य मुनि ने उससे विवाह करने की इच्छा दर्शाई. दोनों की आयु के अंतर को देखकर राजा विचार मग्न हो गया. इतनी छोटी कन्या का विवाह वृद्ध महामुनि से किस प्रकार करूँ, यही चिंता उसे सता रही थी. अंत में उसने अपनी कन्या से ही इस विवाह के विषय में अपने विचार प्रकट करने को कहा, तब क्षण भर का भी विलम्ब किये बिना वह बोली, “पिताश्री, मेरा जन्म अगस्त्य मुनि के लिए ही हुआ है. मैं उन्हींसे विवाह करूंगी.” राजा ने दोनों का विवाह कर दिया. राजकन्या लोपामुद्रा राजमहल छोड़कर वल्कल परिधान करके अगस्त्य मुनि के साथ तपोभूमि को चली गई. कालान्तर में अगस्त्य ऋषि ने उससे शास्त्रयुक्त संग करने की इच्छा व्यक्त की. इस पर लोपामुद्रा ने मुनि से कहा, “नाथ, मैं ललिता स्वरूप की उपासना करके ललिता स्वरूप ही हो चुकी हूँ. आप भी शिवोपासना करके जब शिवरूप हो जायेंगे, तब मैं आपकी इच्छा पूरी करूंगी. अगस्त्य मुनि ने घोर तपस्या करके शिवरूप प्राप्त कर लिया. फिर उन्होंने अपनी इच्छा लोपामुद्रा के सम्मुख व्यक्त की. इस पर वह बोली, “नाथ, मैंने एक राजकुल में जन्म लिया है. क्षत्रियोचित धन, आभूषण, रेशमी वस्त्र, सुगन्धित द्रव्य, उपभोग की समस्त वस्तुओं के बिना मुझसे संग करना योग्य नहीं है. अतः आप इन सब वस्तुओं का संग्रह करें, साथ ही स्वयँ के लिए भी ज़री के वस्त्र लाएं. यह सब भोग सामग्री लाने के पश्चात ही आपकी इच्छा पूर्ण होगी. अगस्त्य मुनि धन संपादन करने के इरादे से इलवल नामक एक राक्षस के पास गए. अपनी माया से उसे अपना बनाकर उससे धन, आभूषण, वस्त्र आदि लेकर लोपामुद्रा के पास आए और उन्होंने पत्नी की इच्छा पूरी की. यथावकाश उन्हें उत्तम संतान की प्राप्ति हुई. एक बार अगस्त्य ऋषि ने अपने तपोबल से समूचे सागर को ही अपने कमण्डलु में भर लिया था, और उसे पी गए थे. अगस्त्य महर्षि ने विन्ध्याचल पर्वत का गर्व हरण किया था. आज भी दक्षिण भारत में अगस्त्य मुनि को एक महान सिद्ध पुरुष माना जाता है. अनेक स्थानों पर उनके मंदिर हैं.” श्रीपाद प्रभु ने आगे कहा, “जब मैं कल्कि अवतार धारण करूंगा तब अगस्त्य ऋषि को परशुराम जैसा गुरुस्थान प्रदान करूंगा.”

 

देवी की दशमहाविद्या

श्रीपाद प्रभु ने आगे कहा, “ ‘काली’ दशमहाविद्याओं में प्रथम रूप है. ‘महाकाली समस्त विद्याओं की आदि देवता है. उसकी विद्यामय विभूति को ही महाविद्या कहते हैं. किसी समय हिमालय पर मातंग ऋषि के आश्रम में सब देवताओं ने महामाया की स्तुति की. उस समय अम्बिका ने ‘मतंग वनिता के रूप में उन्हें दर्शन दिए. वह काजल के समान काले रंग की होने के कारण उसका नाम कालिका देवी पडा. उसने शुंभ-निशुंभ राक्षसों का वध किया. उसका रूप काला-नीला होने के कारण उसे तारा देवी के नाम से भी जाना जाता है. कोई भी संकल्प अथवा फलीभूत न हुई योगसाधना अल्पकाल में ही गंतव्य स्थल तक पहुंचे इसलिए काली माता की उपासना की जाती है. इस साधना काल में काली माता के साधक के शरीर में भयंकर दाह होता है, जिसे साधक को सहन करना पड़ता है.

दशमहाविद्या में दूसरा रूप तारा देवी का है. यह माता मोक्ष दायिनी, सब दुःखों से तारने वाली है, इसलिए वह ‘तारा’ नाम से प्रख्यात हुई. इस देवी को ‘नील सरस्वती भी कहते हैं. भयानक विपत्ती में भक्त की रक्षा करने वाली होने के कारण योगीजन ‘उग्रतारा रूप में इसकी आराधना करते हैं. वशिष्ठ महामुनि ने भी तारा देवी की आराधना की थी. चैत्र शुद्ध नवमी की रात को ‘तारा रात्रि कहते हैं.

दशमहाविद्या का तीसरा रूप है ‘छिन्नमस्ता देवी. छिन्नमस्ता देवी का यह रूप अत्यंत गोपनीय है. एक बार देवी अपनी दो सखियों सहित मंदाकिनी नदी पर स्नान के लिए गई थी. जब द्वारपालों ने उससे भोजन के विषय में पूछा, तब उसने अपनी तलवार से अपना ही शिरच्छेद कर दिया. उसका सिर वाम हस्त पर आकर गिरा. उसके धड़ से निकली रक्त की दो धाराओं का सखियों ने प्राशन किया और तीसरी धार देवी ने स्वयँ ही प्राशन की. तब से उसका नाम ‘छिन्नमस्ता देवी पडा. हिरण्यकश्यपु आदि दानव इसी देवी के उपासक थे.

दशमहाविद्या में चौथा रूप ‘षोडशीमहेश्वरी’ का है. इस देवी का स्वरूप मक्खन की भाँति मुलायम है और वह अत्यंत दयावती है. इनके आश्रय में आये हुए साधकों को त्वरित ज्ञान प्राप्ति होती है. विश्व के सभी मन्त्र तंत्रों के निर्माता इस देवी के उपासक हैं. इस ‘षोडशीमहेश्वरी देवी का वर्णन वेद तथा श्रुति भी नहीं कर सके, वे ‘नेति नेति कहकर शांत हो गए. यह प्रसन्नवदना माता भक्तों के सकल मनोरथ पूर्ण करती है. इस भगवती की उपासना से भोग एवँ मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है.

दशमहाविद्या में पाँचवां रूप ‘भुवनेश्वरी देवी का है. सप्त कोटि महामंत्र इस देवी के उपासक हैं. इस देवी की काली तत्व से लेकर कमला तत्व तक दस अवस्थाएं होती हैं. इनमें से अव्यक्त भुवनेश्वरी व्यक्त होकर ब्रह्माण्ड का रूप धारण कर सकती है. प्रलय काल में कमल से, अर्थात् व्यक्त जगत से क्रमशः लय होते हुए काली के मूल स्वरूप में परिवर्तित होती है. इसलिए इस देवी को काल की जन्मदात्री भी कहते हैं.

दशमहाविद्या में छठा रूप ‘त्रिपुर भैरवी का है. महाकाल को शांत करने में समर्थ इस शक्ति रूप को ही त्रिपुर भैरवी कहते हैं. शास्त्रों में कहा गया है कि त्रिपुर भैरवी नरसिंह भगवान की अभिन्न शक्ति हैं. सृष्टि में परिवर्तन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. इस प्रक्रिया के मूल कारण स्वरूप हैं आकर्षण और विकर्षण. यह प्रतिक्षण होती रहने वाली क्रिया है. इस त्रिपुर भैरवी का रात्रि का नाम काल-रात्रि तथा भैरव का नाम काल-भैरव है. इन दोनों के संयुक्त स्वरूप से ही मेरा आगामी नृसिंह सरस्वती का अवतार होने वाला है. यह अवतार महायोगियों के लिए त्रिपुर भैरवी एवँ काल भैरवनाथ अवतार माना जाएगा.

दशमहाविद्या का सातवाँ अवतार धूमावती है. यह धूमावती उग्रतारा ही है. इस देवी की शरण में जाने वाले साधकों के सारे संकट नष्ट होकर उसकी कृपा से सकल संपदा प्राप्त होगी.

दशमहाविद्या का आठवां रूप ‘बगुलामुखी देवी का है. ऐहिक, पारलौकिक, देश, समाज का अरिष्ट निवारण करने के लिए, साथ ही शत्रु के शमन के लिए इस देवी की आराधना की जाती है. विष्णु भगवान, परशुराम इस देवी के भक्त थे. श्री तिरुमला क्षेत्र के श्री वेंकटेश्वर स्वामी ने इस देवी की माता स्वरूप में आराधना की थी.

दशमहाविद्या का नवम् रूप ‘मातंगी माता’ का है. मानव के गृहस्थ जीवन को सुखी बनाकर पुरुषार्थ को सिद्ध करने की शक्ति मातंगी माता में ही है. इस देवी को मातंग ऋषि की कन्या भी मानते हैं.

दशमहाविद्या का दसवां रूप ‘कमलालया माता का है. यह सुख एवँ समृद्धि प्रदान करने वाली देवता है. भार्गव मुनि ने इस देवी की आराधना की थी इसलिए इसे भार्गवी भी कहते हैं. इस देवी की कृपा से पृथ्वी के पतित्व एवँ पुरुषोत्तमत्व का लाभ होता है. यही देवी तिरुमला क्षेत्र में श्री वेंकटेश्वर स्वामी के साथ पद्मावती के रूप में निवास करती है.”

श्रीपाद प्रभु आगे बोले, “दशमहाविद्या स्वरूपिणी अनघा देवी तथा उनके प्रभु अनघ (अर्थात् साक्षात श्री दत्त प्रभु) की अर्चना करने से अष्टसिद्धि की प्राप्ति होती है. प्रत्येक मास की कृष्ण अष्टमी को अनघाष्टमी मानकर अनघा माता की पूजा-अर्चना करें. इस आराधना से तुम्हारी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी.”

प्रभु ने आगे कहा, “अरे, शंकर भट्ट! तेरे द्वारा रचित इस श्रीपाद श्रीवल्लभामृत का पारायण करके, इसके पश्चात आने वाली शुक्ल अथवा कृष्ण अष्टमी को “अनघाष्टमी” का व्रत करके ग्यारह गृहस्थों को भोजन करावें, अथवा इस हेतु आवश्यक शिधा-सामग्री का दान करें. इस प्रकार के पारायण से तथा अन्नदान से इच्छित फल की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है.”

 

चरित्रामृत के पारायण की महिमा

श्रीपाद प्रभु आगे बोले, “श्री चरित्रामृत को केवल एक ग्रन्थ ही न समझें. यह एक सजीव महाचैतन्य का प्रवाह है. जब तुम इसका पठन करते हो, तब इसके प्रत्येक अक्षर की शक्ति मेरे चैतन्य में प्रवाहित होती है. अनजाने ही तुम्हारा मुझसे संबंध स्थापित हो जाता है. इससे तुम्हारी सभी धर्मबद्ध इच्छाएँ मेरी कृपा से पूर्ण होती हैं. इस ग्रंथराज को तुम्हारे पूजा घर में सिर्फ रखने मात्र से इसमें से शुभप्रद स्पंदन निकलते हैं. ये स्पंदन दुष्ट शक्तियों को, दुर्दैवी शक्तियों को भगा देते हैं.”

“श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत की जानबूझ कर अथवा अनजाने में निंदा करने से निंदक का पूर्व पुण्यफल धर्म देवता ले लेती है, और किसी योग्य प्राणी को बांट देती है. इस प्रकार श्रद्धावान गरीब भक्त भाग्यवंत हो जाता है और अश्रद्धावान व्यक्ति गरीब हो जाता है. यह अक्षरसत्य ग्रन्थ है. यह ग्रन्थ स्वयं ही अपना प्रमाण है. जिज्ञासू व्यक्ति इसकी परिक्षा ले सकते हैं. मन में कोई इच्छा धारण करके भी ग्रन्थ का पारायण कर सकते हैं. अपना जीवन शुद्ध करने के लिए अत्यंत श्रद्धा एवँ भक्ति पूर्वक इस ग्रन्थ का पठान करना चाहिए.”

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

अध्याय - ३०

 

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये ।।


अध्याय – ३०

श्रीपाद श्रीवल्लभ महासंस्थान का निर्माण होगा ऐसा श्रीपाद प्रभु ने ही बताया

नाथ सम्प्रदाय के अनुसार जीवात्मा चौंसठ शाबर तंत्र का उपयोग करके परमेश्वर से तादात्म्य प्राप्त करता है. नाथ सम्प्रदाय के आदिगुरू श्री दत्तात्रेय भगवान ही हैं. हमारे सम्मुख विराजमान श्रीपाद श्रीवल्लभ साक्षात श्री दत्तात्रेय ही हैं. शतरंज की बिसात पर चौंसठ खाने होते हैं. श्री महाविष्णु श्री महालक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ लोक में शतरंज की बाज़ी खेलते हैं, इसका गूढार्थ यह हुआ कि चौंसठ योनियों में स्थित विभिन्न जीवात्माओं के जीवन कलापों के कर्मफल तथा उनकी परिणामी क्रियाओं का अवलोकन करते हुए, उनके कर्मफलों के आधार पर वे उन पर अनुग्रह करते हैं.

 

दिव्य मानव होने के लिए आवश्यक योग्यता

 

“मानव के आध्यात्मिक अधिकार पर उनकी उन्नति की गति निर्भर करती है. प्रत्येक जीवात्मा दिव्यात्मा होने की अभिलाषा रखता है. इस मार्ग से चलने के लिए योगपद्धति, मन्त्र, जप, याज्ञयागादी कर्म, धर्मं कार्यों को संपन्न करना इत्यादि विधियों का अवलंबन करके शरीर की आत्म ज्योति को प्रकाशमय करें. इस प्रकाश पर नाडी-शुद्धि अवलंबित रहती है. नाडी-शुद्धि के स्तर के अनुरूप मानव को विभिन्न स्तर की शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है. शक्ति विशेष का विकास होने पर साधकों द्वारा किये गए धार्मिक कर्मों के अनुसार उन्हें दैवानुग्रह की प्राप्ति होती है.” श्रीपाद प्रभु आगे बोले, “शंकर भट्ट, भविष्य में मेरे महासंस्थान का श्री पीठिकापुरम् में मेरे जन्मस्थल पर ही निर्माण होगा. श्री पीठिकापुरम्, श्यामालाम्बापुर एवँ वायसपुर अग्रहार ये तीनों स्थान मिलकर एक महानगर बनायेंगे. मेरे दर्शनों के लिए मेरे देवस्थान पर भक्तों की लम्बी-लम्बी, चीटियों के समान कतारें लगेंगी. कलियुग में अनेक आश्चर्यजनक घटनाएं होंगी. वशिष्ठ महामुनि का अंश लेकर जन्मा हुआ एक साधक श्रीपाद श्रीवल्लभ संस्थान का पुजारी नियुक्त होगा. उसके साथ मैं कितनी दिव्य लीलाएँ करूंगा, उनका कोई अंत ही नहीं. प्रतिक्षण दिव्य लीला एवँ दिव्य विनोद चलते ही रहेंगे.”

इतना कहकर श्रीपाद प्रभु मंद-मंद मुस्कुराए. उसे देखने के लिए सहस्त्रावधि जन्म भी कम ही हैं.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

अध्याय - २९

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये ।।

 

अध्याय - २९

श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु का दिव्य उपदेश

हमने कुरुगड्डी में श्रीपाद प्रभु के दर्शन किए और उनकी आज्ञा से उनके समीप बैठ गए। तब प्रभु बोले, “जो साधक अनन्य भाव से मेरी शरण में आते हैं उनकी मैं सदैव रक्षा करता हूँ. यह देश काल मेरे हाथ में एक गेंद के समान है. कहीं भी घटित हो रही, भूतकाल में घटित हो चुकी तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को मैं बदल सकता हूँ. मैं देश और काल का शासक ही हूँ. तुम्हारे चैतन्य के संस्कारों की श्रेणी के अनुरूप ही तुम्हें मेरे बारे में ज्ञान प्राप्त होगा. सभी धर्मों का परित्याग करके तुम्हारे अंतर्मन में अन्तर्यामी रूप में स्थित, ऐसे मेरी शरण में अनन्य भाव से आने पर मेरे आदेशानुसार कर्म का पालन करने पर मैं तुम्हारा सब भार वहां करके तुम्हें जीवन्मुक्त करूंगा. केवल अपने शब्दों से ही मैं सृष्टि पर शासन करता हूँ. इसलिए मैं ही सरस्वती रूप में प्रसिद्ध होऊँगा. कलियुग का मानव हिरण्यकश्यपू के समान होगा. उनकी समस्याएँ, भाव एवँ आचार-विचार अत्यंत कठोर स्वरूप के होंगे. उन्हें प्रकृति-विज्ञान से संबंधित अनेक संशोधनों में यश प्राप्त होगा. परन्तु मुझे प्रहलाद जैसे निष्पाप, निरपराध भक्तों के संरक्षण के लिए नरसिंह का अवतार धारण करना होगा. इस कारण से मैं “नृसिंह सरस्वती” इस नाम-रूप से एक और दिव्य अवतार धारण करके गंधर्वपुर नगर में प्रसिद्धी को प्राप्त करूंगा.” इतना कहकर श्रीपाद प्रभु ध्यानस्थ हो गए और उन्होंने हमें भी ध्यान मुद्रा में बैठने को कहा.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।


सोमवार, 4 जुलाई 2022

अध्याय - २८

 

।। श्रीपाद राजन शरणं प्रपद्ये।।


अध्याय – २८

श्रीपाद प्रभु श्री वेंकटेश्वर स्वामी हैं.

विष्णु-महाविष्णु, लक्ष्मी- महालक्ष्मी, सरस्वती- महासरस्वती, काली- महाकाली

इनके स्वरूप का वर्णन

 

वह शुक्रवार का शुभ दिन था और वासवी कन्यका देवी के जयन्ती उत्सव का मंगलमय पर्व था. प्रातःकाल की बेला में श्रीपाद प्रभु कृष्णा के जल पर चलकर दूसरे किनारे पर पहुंचे, हम नाव में बैठकर दूसरे किनारे पर गए. उस समय सुबह के सात बजे थे. तिरुमला क्षेत्र में श्री वेंकटेश्वर स्वामी की श्री लक्ष्मी स्थान पर पूजा अर्चना स्वीकार करने की मंगल बेला थी.

श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु उस खेत के मालिक द्वारा कल बनाई गई गौशाला में आकर ध्यानस्थ हो गए. तभी हम भी गौशाला पहुंचे. पंचदेव पहाड़ के परिसर में श्रीपाद प्रभु के सत्संग आरंभ करने का यह मंगल समय था. अचानक एक आश्चर्यजनक बात हुई! श्रीपाद प्रभु की देह अकस्मात् तेजःपुंज होने लगी. वह महातेज धीरे-धीरे चारों दिशाओं में व्याप्त होने लगा. उस समय श्रीपाद प्रभु एक अत्यंत तेजस्वी मूर्ती की भाँति प्रतीत हो रहे थे. थोड़ी देर में प्रभु गौशाला से बाहर आये. आम तौर से साधारण मानव की भाँति उनके शरीर की छाया भूमि पर पड़ती थी, परन्तु आज आश्चर्य की बात यह हुई कि उनकी छाया भूमि पर नहीं पड़ रही थी. चलते समय उनके पद चिह्न मिट्टी में दिखाई देते थे, परन्तु आज एक भी पद चिह्न नहीं दिखाई दे रहा था. उन्होंने तीक्ष्ण दृष्टि से सूर्य की और देखा. उनका शरीर दिव्य तेज से भरकर प्रतिक्षण वृद्धिंगत हो रहा था. थोड़ी ही देर में हमारी आंखों के सामने ही श्रीपाद प्रभु का विशाल तेजोमय रूप सूर्य में विलीन हो गया. उस सूर्य बिंब में हमें एक दिव्य शिशु के दर्शन हुए. वह शिशु तेज़ी से पृथ्वी पर आ रहा था. उस शिशु के चरण जैसे ही भूमि पर पड़े, हमारी आंखों के सामने से सब कुछ ओझल हो गया. श्रीपाद प्रभु मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. उन्होंने फिर एक बार तीक्ष्ण दृष्टि से सूर्य की और देखा और हमें दुबारा सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगा. उन्होंने हमें भी सूर्य की ओर देखने का आदेश दिया. हमें उस लाल-लाल सूर्य बिंब में एक अत्यंत सुन्दर, दिव्य तेजमूर्ती बालिका के दर्शन हुए. वह बालिका हास्य वदन से भूमि की और आ रही थी. उसके चरणों के भूमि पर पडते ही हमारी आँखों को पुनः कुछ भी दिखाई न दिया. हम आश्चर्य चकित होकर चारों और देखने लगे. उस प्यारी बालिका ने हमारी ओर देखा और मंद-मंद मुस्कुराई. तब हमें दुबारा सब कुछ दिखाई देने लगा. श्रीपाद प्रभु ने उस बालिका को अत्यंत प्रेम से, आदरपूर्वक उठा लिया. उस समय श्रीपाद प्रभु की आयु सोलह वर्ष की थी, और उनके समान दिखाई देने वाली उस कन्या की आयु तीन वर्ष की प्रतीत हो रही थी. उसने शरीर पर जरी के वस्त्र परिधान किये थे. वह दिव्य आभूषण भी पहने थी. श्रीपाद प्रभु उस बालिका के साथ उस गौशाला में गए.

 

मैं और धर्मगुप्त इस अद्भुत् दृष्य को अत्यंत भय, आश्चर्य एवँ संभ्रम से देखा रहे थे, मेरे मन में शंका उठी कि कहीं यह सब इंद्रजाल तो नहीं?

मेरे ह्रदय की भावनाएँ जानकर श्रीपाद प्रभु बोले, “अरे, शंकर भट्ट! यह कोई इंद्रजाल नहीं, यह मेरा स्वभाव ही है, यह मेरी दिव्य प्रकृति ही है. मेरे संकल्प से ही “पृथ्वी” एवँ “आकाश” बनते हैं. मेरे संकल्पानुसार ही ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण करते हैं. इस समय भिन्न-भिन्न व्यक्तित्वों का निर्माण होता है, अदृष्य रूप वाली प्राकृतिक शक्ति साकार हो जाती है. सगुण रूपी सृष्टि व्यक्ति रूप में साकार हो जाती है. मैं ब्रह्म स्वरूप ही हूँ, अर्थात् ब्रह्म की प्रेरणा ही हूँ. इस सृष्टि में प्राणियों का पालन-पोषण करना विष्णु स्वरूप का कार्य है. उस विष्णु को प्रेरणा देने वाला महाविष्णु मैं ही हूँ. सरस्वती तथा महासरस्वती दोनों अलग-अलग हैं. सरस्वती इस सृष्टि की ज्ञान देवता है. इस ज्ञान देवता स्वरूप सरस्वती को प्रेरणा देने वाली देवता है “महासरस्वती” जो अनघा स्वरूप ही है. सृष्टि की स्थिति, कारण, वस्तुओं की समृद्धि, धन समृद्धि – यह सब लक्ष्मी माता का ही स्वरूप है. महालक्ष्मी देवता अनघा स्वरूप ही है, जो लक्ष्मी स्वरूप को प्रेरणा एवँ शक्ति देती है. सृष्टि का शक्ति स्वरूप कालिका देवी ही है, “महाकाली” काली स्वरूप की प्रेरणा है. यह शक्ति स्वरूप करने वाला अनघा स्वरूप ही है.

 

अनघालक्ष्मी का स्वरूप

अनघा लक्ष्मी का अनघ – अर्थात् मेरा दत्त स्वरूप है. महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली इन तीनों का एक संयुक्त – एक विशेष दिव्य मातृत्व स्वरूप ही अनघा लक्ष्मी का आविर्भाव है. इसी कारण से अनघा लक्ष्मी महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती, तीनों के संयुक्त रूप की तादात्म्य स्थिति का स्वरूप है. अनघा लक्ष्मी एक अलौकिक दिव्य शक्ति है जो इन तीनों देवताओं का आधार है. मेरे अनघ स्वरूप से तात्पर्य है ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र के एकत्र होकर तादात्म्य स्थिति को धारण करके, इन तीनों का आधार – अर्थात् त्रिशक्ति रूपिणी अनघा देवी को मेरे वाम भाग में स्थापित किया हुआ मेरा शक्ति-स्वरूप. यह ध्यान में रखना.

त्रेता युग में किये गए “सवित्र काठ चयन” यज्ञ के फलस्वरूप ही मेरे भव्य, दिव्य, “अर्धनारीश्वर” स्वरूप को आधार बनाकर ही पीठिकापुरम् में मेरा श्रीपाद श्रीवल्लभ के रूप में आविर्भाव हुआ. इस समय जो तुम देख रहे हो, वह स्वरूप वास्तव में महालक्ष्मी - महाविष्णु का ही स्वरूप है. महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती – इन तीनों का चैतन्य पद्मावती देवी में समाया हुआ है. मगर उसका स्वरूप महालक्ष्मी का ही है, जबकि उसमें तीनों की शक्ति सम्मिलित है. इस प्रकार पद्मावती देवी तीनों शक्तियों का आधार, अतीत ऐसा पराशक्ति स्वरूप ही है. श्री वेंकटेश्वर के रूप से तात्पर्य है – बृहदाकार ब्रह्मा को, विराट रूपी विष्णु को, प्रलय काल रूद्र को अर्थात् महाकाल को अपने दिव्य चैतन्य में धारण करके, उनका आधार एवँ उनके लिए अतीत ऐसा परब्रह्म का स्वरूप. श्रीपाद श्रीवल्लभ – अर्थात् मायारूपी श्री पद्मावती वेंकटेश्वर ही अर्धनारी स्वरूप में हैं, यह जान लो.”

श्रीपाद प्रभु की ये बातें सुनकर मैंने कहा, “ गुरु सार्वभौम की जय जयकार हो. आप कभी कहते हैं कि मैं पद्मावती वेंकटेश हूँ. थोड़ी देर बाद कहते हैं कि मैं अनघालक्ष्मी सहित अनघ हूँ. मेरी मंद बुद्धि को इसका बोध नहीं हो रहा है. कृपया मेरा उद्धार करें.”

तब दीनों के नाथ सदगुरु श्रीपाद प्रभु बोले, “महालक्ष्मी तथा पद्मावती ये दोनों मूलतः एक ही तत्व की हैं. वह जब महालक्ष्मी तत्व को स्वीकारती हैं, तब मेरे विष्णु तत्व का प्रादुर्भाव होता है, जब वह पद्मावती तत्व का स्वीकार करती हैं, तब मेरे भीतर से उसके प्रभु वेंकटेश्वर तत्व का आविर्भाव होता है. जब-जब जिस सगुण साकार तत्व का आविर्भाव होता है, तब-तब उस तत्व की मर्यादा का, उसके आचार आदि का अचूक पालन करना होता है. मेरी यह दिव्य भगिनी, यह महाशक्ति कृष्णावतार के समय योगमाया के रूप में अवतरित हुई थी. फिर वह अपना कार्य समाप्त करके अंतरिक्ष में लुप्त हो गई. आज वही श्रेष्ठ, तपः संपन्न योगी, मुनि, महर्षि आदि की घोर तपस्या के परिणाम स्वरूप ही वासवी कन्यका के रूप में प्रकट हुई है. किसी विशेष कारण से ही मुझे पीठिकापुरम् में अवतार लेना पड़ा है. जो दृष्टी के सामने दिखाई देता है, उसे देखते रहो. तुम्हें समझ में आ ही गया होगा कि मेरा अवतार तत्व दिव्य, विनोदी लीलाएँ करने के लिए ही हुआ है.”

श्रीपाद प्रभु ने आगे कहा, “अरे, शंकर भट्ट, इस पंचदेव पहाड़ पर घटित लीलाओं का, यहाँ देखे गए दृश्यों का वर्णन बिल्कुल वैसे ही करना, जैसे देखा है. यह वर्णन भविष्य के भक्तजनों के लिए स्फूर्तिदायक होगा. उनकी नाना शंका-कुशंकाओं को इससे समाधान हो जाएगा. साधकों के लिए इस ग्रन्थ एवँ लीला प्रसंगों से भक्तिमार्ग सुलभ हो जाएगा.”

इतना कहकर श्रीपाद प्रभु की दिव्य वाणी ने विश्राम किया. हम आश्चर्य चकित देख ही रहे थे, तभी श्रीपाद प्रभु का स्वरूप दिव्य तेज से दमकने लगा और उसमें से श्री पद्मावती देवी का तथा श्री वेंकटेश्वर स्वामी का आविर्भाव हुआ.

 

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

रविवार, 3 जुलाई 2022

अध्याय - २७

 

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।  

अध्याय – २७

पंचदेव पहाड़ पर विरूपाक्ष से भेंट


श्री धर्मगुप्त और मैं कृष्णा के दूसरे तीर पर पहुंचे. मध्याह्न का समय था. गुरूवार के दिन श्रीपाद प्रभु एक ही समय में विविध स्थलों पर भिक्षा स्वीकार करते थे. तो, ऐसे परम पवित्र गुरूवार के मध्याह्न का समय था. पंचदेव पहाड़ नामक स्थल पर घास की एक कुटी बनाई जाए ऐसी श्रीपाद प्रभु की आज्ञा थी. यह कुटी एक ही दिन में बनाई जाए, ऐसा भी उन्होंने कहा था. परन्तु पंचदेव पहाड़ का वह परिसर हमारे लिए नया था. कुटी का निर्माण करने के लिए योग्य स्थान की आवश्यकता थी. उसे बनाने के लिए आवश्यक सामग्री – घास, बांस, डोरी, पत्ते आदि – हमारे पास नहीं थी. कुटी बनाने वाले मज़दूर भी वहाँ नहीं थे.

 

पंचदेव पहाड़ का महत्त्व

कहाँ जाएँ, इसके बारे में कोई निश्चय नहीं था. इस परिसर में हम पथिकों के समान इधर-उधर घूम रहे थे. घूमते-घूमते हम एक किसान के खेत में गए. वहाँ वह किसान अपने जानवरों के लिए गौशाला का निर्माण कर रहा था. खेत में एक साफ-सुथरी जगह पर एक ऊँची चौकी बनाई गई थी और उस पर एक गद्दी बिछी थी – खेत के मालिक के लिए. उस गद्दे पर बैठे हुए मालिक ने हमें बुलाकर हमारा स्वागत किया और हमें भोजन दिया. हम भूखे ही थे, परन्तु क्षण भर के लिए मन में यह विचार कौंध गया कि शूद्र के घर का भोजन किया जाए अथवा नहीं. तब उस खेत का मालिक गुस्से से बोला, “हमारे जानवर चुराकर दूसरे प्रांत में बेचने वाले तुमको शूद्र के घर का भोजन करना चाहिए अथवा नहीं ऐसा संदेह हुआ है क्या?” उस मालिक की नज़रों में हम चोर बन गए थे. परन्तु भूख के मारे हमने वहाँ भोजन कर लिया. खेत के मालिक का नाम था विरूपाक्ष. भोजन के पश्चात हम दोनों को एक-एक पेड़ से बाँध दिया गया. “मैं एक गरीब ब्राह्मण हूँ, भिक्षा मांगकर अपना उदर निर्वाह करता हूँ ,” ऐसा मैंने अत्यंत दीनतापूर्वक कहा. मेरे पास बिलकुल भी धन नहीं है., यह भी पुनः पुनः कहा. इसके बाद खेत के मालिक के सेवक धर्मगुप्त के निकट धन की आशा में गए, और वे उसका सारा धन छीन लेने का विचार करने लगे.

 

श्रीपाद प्रभु की कल्पनातीत दिव्य लीला

  

हमने वास्तविक स्थिति बार-बार उसे समझाई परन्तु खेत के मालिक पर उसका कोई प्रभाव नहीं पडा. उसकी  आज्ञानुसार हमें बंदी बनाया गया था. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. तभी वहां मुसाफिरों की एक टोली आई. इनमें “शिव कावडी” नामक भक्त थे. ये मुसाफिर वासवी कन्यका परमेश्वरी के लिए कावडी ले जाते हैं. ये भक्तजन त्रिपुण्ड लगाते हैं. घंटानाद करते हुए श्री कन्यका परमेश्वरी की स्तुति में गीत गाते हुए मार्गक्रमण करते हैं. ये भक्त गण किसी शुभ कार्य के लिए अथवा वासवी माता के जयन्ती उत्सव के लिए गंगा के पवित्र जल की कावड ढोकर लाते हैं. इनके बीच एक अन्य प्रकार के साधक भी होते हैं, उनकी कमर में एक पट्टा बंधा होता है. इस पट्टे में तलवार, ढाल एवँ विविध प्रकार के युद्धोपयोगी शस्त्र होते हैं. इन्हें “वीर मुष्टि” कहते हैं. ये लोग नामघोष करते हुए घंटानाद के साथ चलते हैं.

उस खेत के मालिक ने आये हुए साधकों तथा वीरमुष्टि लोगों को भोजन देकर उनका सत्कार किया. तत्पश्चात हमें बंधनमुक्त करके गोशाला के निर्माण में सहायता करने का आदेश दिया. हम काम करने लगे. शाम को काम समाप्त होने के बाद विरूपाक्ष ने हमसे पूछा, “मुष्टि में मुष्टि वीरमुष्टि – इसका क्या अर्थ है?” हमें इसका उत्तर ज्ञात नहीं था, हमने यह बात उस खेत के मालिक से कह दी. उस दिन शाम को भी उसने हमें भोजन दिया. हमें गायों की रखवाली करते हुए उस रात वहीं सोने का आदेश दिया. तत्पश्चात वह अपने सेवकों सहित हँसते-खेलते हुए वहाँ से चला गया. हम आधी रात तक श्रीपाद प्रभु का नाम स्मरण एवँ उनकी दिव्य लीलाओं का स्मरण कर रहे थे. फिर हमें नींद आ गई. प्रातःकाल सूर्य की किरणें शरीर पर पड़ते ही हम उठ गए. चारों और देखा – वहाँ कोई भी गाय नहीं थी. आसपास के किसान आकर पूछने लगे कि वह जगह हमने कितने में खरीदी है. हमने कल की घटना उन्हें पूरी तरह सुना दी, परन्तु वे हमें पागल समझने लगे. हमारे मन में एक ही प्रश्न उठ रहा था – क्या कल का दृश्य वास्तविक था या आज का?

इसी संभ्रमावस्था में एक अपरिचित वहाँ आया. उसने हमसे पूछा, “श्री वासवी कन्यका देवी का जन्म वैशाख शुद्ध दशमी के दिन हुआ अथवा सप्तमी के दिन?

श्री धर्मगुप्त ने उत्तर दिया, “श्री वासवी कन्यका का जन्म वैशाख शुद्ध दशमी के दिन मध्याह्न समय में हुआ. उस दिन शुक्रवार था.” यह सुनकर अपरिचित बोला, “तुम दोनों मूर्ख हो.” उस व्यक्ति द्वारा श्रीपाद प्रभु के बारे में कहे गए उदगार हमें अच्छे नहीं लगे. परन्तु तुरंत कुरुगड्डी की ओर जाने का विचार करके हम चल पड़े. हम दोनों के पास नाविक को देने के लिए पैसे नहीं थे, यह बात नाव में चढने से पहले ही हमने उसे बता दी थी. नाविक ने दया करके हमें नाव में बैठने दिया. नाव चल पडी. तभी मल्लाह की नज़र धर्मगुप्त की अंगूठी पर पडी, उसने उसे निकाल कर कृष्णा के जल में फेंक दिया. हम नदी पार करके कुरुगड्डी पहुंचे तब श्रीपाद प्रभु कृष्णा नदी में स्नानादि से निवृत्त होकर तपश्चर्या के लिए बैठ गए थे.

 

। श्रीपाद श्रीवल्लभ की जय जयकार हो।।

शनिवार, 2 जुलाई 2022

अध्याय - २६

 

।। श्रीपाद राजं शरणं प्रपद्ये।।

 

अध्याय – २६

 

कलियुग के लक्षण

 

हम सुबह-सुबह नदी पार करके श्रीपाद प्रभु के दर्शन हेतु कुरुगड्डी पहुँचे. धर्मगुप्त को श्रीपाद प्रभु के मुख से कलियुग के प्रादुर्भाव की विशेषताएं जानने की तीव्र इच्छा थी. आज श्रीपाद प्रभु अत्यंत प्रसन्न थे. उनकी कारुण्य वर्षा करने वाली अमृत दृष्टी सभी साधकों को एक विशेष आध्यात्मिक आनंद प्रदान कर रही थी. प्रभु के चरण कमलों का स्पर्श करके हम धन्य हो गए. धर्मगुप्त ने श्रीपाद प्रभु से नम्र निवेदन किया कि कलियुग के प्रादुर्भाव की विशेषता का वर्णन करें. श्रीपाद प्रभु बोले, “साधकों, काल परमात्मा का विराट स्वरूप है. सूर्य को ‘कालात्मक’ भी कहते हैं. धनिष्ठा नक्षत्र से आरम्भ की हुई श्रवण नक्षत्र की सूर्य के चारों ओर की परिक्रमा के वापस धनिष्ठा नक्षत्र तक पहुँचने की समयावधि को ब्रह्म कल्प कहते हैं. ब्रह्म कल्प के एक भाग को सृष्टि कल्प कहते हैं एवँ शेष भाग को प्रलय कल्प कहते हैं. पितृ देवताओं से संबंधित काल गणना में आधा भाग शुक्ल पक्ष तथा आधा भाग कृष्ण पक्ष कहलाता है. संवत्सर पुरुष के छः महीने उत्तरायण तथा शेष छः महीने दक्षिणायन कहलाते हैं. योगी जन संपूर्ण काल चक्र के दर्शन अपने शरीर में करते हैं. इस रहस्य विद्या को तारक राज विद्या कहते हैं. तारक राज योग में शरीर को ही ब्रह्माण्ड माना जाता है. सभी लोग इसी में समाविष्ट हैं. मनुष्य के शिरस्थान को ब्रह्म लोक कहते हैं. इस शिरस्थान में आचार-विचार रहते हैं. नाभि में विष्णु लोक होता है. ह्रदय में रूद्र लोक होता है. पितृ जन अपने वीर्य कणों में जन्यु देवता स्वरूप में वास करते हैं. जन्यु देवताओं का कार्य यह है कि मानव के विगत जन्म में किये गए कर्म का फल अगले जन्म में प्रदान करें. परन्तु विगत जन्म के फल को एक क्रम पद्धति से प्रदान करने के लिए काल की अत्यंत आवश्यकता होती है.

 

 

कलियुग का लक्षण

पितृ देवता से तात्पर्य दिवंगत पूर्वजों से नहीं है. स्वर्गवासी हो चुके अपने माता-पिता, दादा-दादी के नाम से किये गए श्राद्ध का फल स्वीकार करके उन्हें उत्तम गति प्रदान करने वाले जन्यु देवता ही हैं. ये जन्यु देवता जन्म मृत्यु से परे हैं. योगीजन अपने शरीर में ही छः ऋतुओं के दर्शन करते हैं. एक वर्ष में बारह पूर्णिमा तथा बारह अमावस्या होती हैं. ये चौबीस पर्व गायत्री के चतुर्विंशति छंद हैं. कुछ लोग काल स्वरूपी श्री विष्णु भगवान को संवत्सर पुरुष मानकर उनकी उपासना करते हैं. इस विद्या को द्वादशाक्षरी विद्या कहते हैं. प्रत्येक मास के एक अक्षर के हिसाब से बारह महीनों के बारह अक्षर मिलकर एक मन्त्र बनाते हैं.

नदियों में भयानक बाढ़ से  मनुष्यों की, पशुओं की, संपत्ति की अपार हानि होना, भूमि का प्रकम्पित होना अर्थात् भूकंप आना, सूर्य चन्द्र की गति बदलना, दिन में अन्धेरा होकर सूरज का दिखाई न देना, आकाश में ‘धूमकेतु का प्रकट होना – ये सभी कलियुग के लक्षण हैं. द्वापर युग के अंतिम खंड में पश्चिमी सागर के एक द्वीप पर कलियुग के अधिपति, कलिपुरुष, ने घोर तपस्या की थी. ये सारे विषय वेदव्यास ऋषि द्वारा रचित भविष्य पुराण में प्राप्त होते हैं.

 

म्लेच्छ जाति का आविर्भाव

 

जिधर देखो उधर वेदमंत्रों के उच्चार, यज्ञ-यागादी, तपस्या आदि का जोर था. इस कारण कलिपुरुष अत्यंत दुखी था. उसने ईश्वर से प्रार्थना की, “हे प्रभो, पृथ्वी पर चारों और यज्ञ, याग, धार्मिक आचरण, नीतिमत्ता का ही प्राबल्य है. ऐसी स्थिति में मैं अपने कलियुग का प्रभाव लोगों के बीच कैसे फैलाऊँ? आपकी आज्ञानुसार मुझे अपने युग-धर्म को चारों और व्याप्त करना है, परन्तु वर्त्तमान परिस्थिति में मुझे यह असंभव प्रतीत होता है.”

कलिपुरुष के वचन सुनकर जगत्प्रभु ने उसे पश्चिमी सागर में स्थित एक द्वीप दिखाया. म्लेच्छ जाति के मूल पुरुष आदम तथा स्त्री हव्यावती को जगत्प्रभु ने कलिपुरुष को दिखाया. उन स्त्री-पुरुष के विहार के लिए एक अत्यंत रमणीय उद्यान का निर्माण किया. वास्तव में वे स्त्री-पुरुष बहन-भाई थे. परन्तु कलिपुरुष ने सर्प रूप में उनके भीतर प्रवेश करके काम भावना उत्पन्न कर दी, तथा अधर्मी संतान उत्पन्न करने के लिए उन्हें प्रेरित किया. उन दोनों के इस प्रकार से पतित हो जाने पर उनके भीतर की दिव्य शक्ति अदृश्य हो गई. कालान्तर में इस युगल से कलि धर्म की मूल म्लेच्छ जाति का आविर्भाव हुआ.

द्वापर युग के अंत में अर्थात दो हज़ार आठ सौ वर्षों के बाद म्लेच्छ देश में म्लेच्छ जाति की संतति की अभिवृद्धि होगी. ऐसा वर्णन भविष्य-पुराण के प्रत्येक सर्ग-पर्व में किया गया है. नीलांचल पर्वत के निकट आदम और हव्यावती ने अपने पाप के फल का अनुभव करके आर्य धर्म को दूषित करने वाली, अभक्ष्य भक्षण करने वाली, दुराचारी संतति की वृद्धि की.

श्रीपाद प्रभु ने आगे कहा, “मैं कल्कि अवतार धारण करके करोड़ों अधर्मियों तथा दुराचारियों का नाश करके पुनः सत् युग की स्थापना करने वाला हूँ. यह काफी दूर के भविष्य में मेरा कार्यक्रम है.”

।। श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु की जय जयकार हो।।

Complete Charitramrut

                     दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा                श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत लेखक   शंकर भ ट्ट   ह...